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रामानुजन कंप्यूटर के दम पर अंतरिक्ष में खुद फैसले लेगा भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट विक्रम 1विज्ञान
2 घंटे पहले· 2

रामानुजन कंप्यूटर के दम पर अंतरिक्ष में खुद फैसले लेगा भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट विक्रम 1

भारत की पहली प्राइवेट कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस का ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम 1, मिशन आगमन के तहत 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के बीच श्रीहरिकोटा से लॉन्च होगा. इसमें लगा रामानुजन कंप्यूटर बिना पायलट या जॉयस्टिक के रॉकेट के सारे अहम फैसले खुद लेगा.

दिव्या रेड्डीदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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भारत के स्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ा पल आने वाला है. देश की पहली प्राइवेट कंपनी से बना ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम 1 अपनी पहली उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है. इस मिशन को नाम दिया गया है मिशन आगमन, और इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा. इसके लिए 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के बीच का लॉन्च विंडो तय किया गया है, यानी टीम के पास सही मौसम और हालात चुनने के लिए करीब तीन हफ्तों का समय है.

इस रॉकेट को हैदराबाद की स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने तैयार किया है. कंपनी ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए बताया कि रॉकेट अब लॉन्च पैड पर पूरी तरह असेंबल होकर उड़ान के लिए तैयार खड़ा है. इस पूरे मिशन में भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो और इन-स्पेस दोनों पूरा सहयोग दे रहे हैं. भारत के इस नए स्पेस सफर पर अब पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं.

कंपनी की तरफ से साझा जानकारी के मुताबिक विक्रम 1 को करीब 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर 60 डिग्री के झुकाव वाली लो अर्थ ऑर्बिट में भेजा जाएगा.

रॉकेट की बनावट और ताकत कितनी है?

विक्रम 1 को खासतौर पर छोटे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है. इसका पूरा ढांचा कार्बन कंपोजिट मटीरियल से बना है, जो इसे हल्का और मजबूत दोनों बनाता है. इसमें सॉलिड फ्यूल बूस्टर के साथ 3D प्रिंटेड लिक्विड इंजन लगाया गया है. सबसे खास बात यह है कि यह रॉकेट पूरी तरह भारत में ही डिजाइन और तैयार हुआ है.

क्षमता की बात करें तो यह लो अर्थ ऑर्बिट यानी लियो में 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है, वहीं सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में इसकी क्षमता 260 किलोग्राम तक की है. सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट वह खास कक्षा होती है जहां कोई सैटेलाइट धरती के हर हिस्से के ऊपर से रोजाना ठीक उसी स्थानीय समय पर गुजरता है.

स्काईरूट ने अपनी वेबसाइट पर इस रॉकेट को तेजी से और सटीक तरीके से सैटेलाइट तैनात करने वाला ऑन-डिमांड रॉकेट बताया है. आसान भाषा में कहें तो यह रॉकेट किसी बड़े और साझा लॉन्च व्हीकल में सीट का इंतजार किए बिना, बेहद कम समय में छोटे सैटेलाइट को उनकी तय जगह पर पहुंचाने में सक्षम है.

बिना पायलट, बिना जॉयस्टिक फिर कैसे उड़ेगा यह रॉकेट?

इस रॉकेट की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी टेक्नोलॉजी है. विक्रम 1 में न कोई पायलट बैठा होता है और न ही इसे उड़ाने के लिए कहीं किसी जॉयस्टिक की जरूरत पड़ती है. इसकी जगह रॉकेट में एक बेहद एडवांस ऑनबोर्ड इंटेलिजेंस सिस्टम फिट किया गया है, जो उड़ान के दौरान खुद फैसले लेने की पूरी ताकत रखता है.

इसका गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम एक खास मिशन कंप्यूटर से चलता है, जिसे नाम दिया गया है रामानुजन. यह रामानुजन कंप्यूटर रॉकेट के फ्लाइट सॉफ्टवेयर के साथ मिलकर काम करता है और रॉकेट के ऑर्बिट में पहुंचते ही जमीन से किसी इंसानी दखल के बिना तमाम अहम फैसले खुद ले लेता है.

स्काईरूट का पुराना सफर, मिशन प्रारंभ

हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की वह पहली प्राइवेट कंपनी है जिसने इसरो के साथ एमओयू साइन किया था. इससे पहले नवंबर 2022 में कंपनी ने विक्रम-एस नाम का एक छोटा एक्सपेरिमेंटल रॉकेट लॉन्च किया था, जिस मिशन को नाम दिया गया था मिशन प्रारंभ.

वह भारत की पहली सफल प्राइवेट सब-ऑर्बिटल फ्लाइट साबित हुई थी, लेकिन उस रॉकेट ने सिर्फ धरती का एक चक्कर लगाकर वापसी की थी और कोई सैटेलाइट स्थापित नहीं किया था. इस बार मिशन आगमन का कद इससे कहीं ज्यादा बड़ा है.

क्यों खास है मिशन आगमन?

विक्रम 1 भारत का पहला ऐसा प्राइवेट रॉकेट है जो असल में अंतरिक्ष में सैटेलाइट तैनात करेगा, यानी यह एक छोटी सब-ऑर्बिटल टेस्ट उड़ान से आगे बढ़कर पूरी ऑर्बिटल उड़ान की तरफ भारत का कदम है. अगर तय समयसीमा के मुताबिक सबकुछ ठीक रहा तो 4 अगस्त 2026 तक भारत अपने स्पेस सेक्टर में एक नया इतिहास रचने के बेहद करीब पहुंच जाएगा.

इसका आप पर असर

  • भारत में: अगर मिशन आगमन कामयाब रहा तो देश की प्राइवेट स्पेस कंपनियों के लिए सैटेलाइट लॉन्च करने का एक नया, तेज और किफायती जरिया तैयार हो जाएगा, जिसका फायदा आगे चलकर स्टार्टअप्स और रिसर्च संस्थानों को मिल सकता है.
  • श्रीहरिकोटा में: 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के तय लॉन्च विंडो के दौरान सतीश धवन स्पेस सेंटर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा और निगरानी के इंतजाम बढ़े हुए नजर आ सकते हैं.

सवाल-जवाब

विक्रम 1 रॉकेट कब लॉन्च होगा?
इसकी लॉन्चिंग 12 जुलाई से 4 अगस्त 2026 के बीच श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से होगी.
विक्रम 1 रॉकेट किसने बनाया है?
इसे हैदराबाद की स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने तैयार किया है.
विक्रम 1 की सैटेलाइट ले जाने की क्षमता कितनी है?
यह लो अर्थ ऑर्बिट में 350 किलोग्राम तक और सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में 260 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है.
रामानुजन कंप्यूटर क्या है?
यह विक्रम 1 का मिशन कंप्यूटर है जो फ्लाइट सॉफ्टवेयर के साथ मिलकर रॉकेट के ऑर्बिट में पहुंचते ही सारे अहम फैसले खुद लेता है.
मिशन आगमन और मिशन प्रारंभ में क्या फर्क है?
मिशन प्रारंभ नवंबर 2022 में हुई विक्रम-एस की सब-ऑर्बिटल टेस्ट फ्लाइट थी जिसमें कोई सैटेलाइट स्थापित नहीं हुआ था, जबकि मिशन आगमन में विक्रम 1 पहली बार सैटेलाइट को ऑर्बिट में तैनात करेगा.
इस मिशन में इसरो और इन-स्पेस की क्या भूमिका है?
यह दोनों संस्थाएं इस पूरे मिशन में स्काईरूट एयरोस्पेस को पूरा सहयोग दे रही हैं.
विक्रम 1 किस ऑर्बिट और ऊंचाई पर भेजा जाएगा?
कंपनी के मुताबिक इसे करीब 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर 60 डिग्री झुकाव वाली लो अर्थ ऑर्बिट में भेजा जाएगा.
दिव्या रेड्डी
लेखक के बारे मेंदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता आगरा
विशेषज्ञताशिक्षा समाचार, स्कूल, विश्वविद्यालय, शिक्षा नीति, परीक्षा, छात्रवृत्ति, छात्र मामले, शैक्षणिक रुझान, उच्च शिक्षा, कौशल विकास

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक रुझानों और छात्रों से जुड़ी ख़बरों को कवर करती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के अहम घटनाक्रमों पर स्पष्टता व अंतर्दृष्टि के साथ रिपोर्ट करती हैं।

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो शिक्षा पत्रकारिता — स्कूल व विश्वविद्यालय की ख़बरों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक सुधारों, छात्र मामलों और कौशल विकास पहलों — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के ब्रेकिंग घटनाक्रम, परीक्षा अपडेट, संस्थागत बदलाव, सरकारी शिक्षा कार्यक्रम और सीखने में नवाचार पर रिपोर्ट करती हैं। सटीक व सुलभ रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ दिव्या छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे कवर करती हैं। उनका काम पाठ्यक्रम में बदलाव, उच्च शिक्षा रुझानों, छात्रवृत्ति अवसरों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा में तकनीक की बदलती भूमिका को उजागर करता है।

पूरा प्रोफ़ाइल देखें ↗
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