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वैज्ञानिकों का नया दावा, सूरज के मरने पर भी बच सकती है पृथ्वीविज्ञान
2 घंटे पहले· 3

वैज्ञानिकों का नया दावा, सूरज के मरने पर भी बच सकती है पृथ्वी

एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल में छपी एक नई स्टडी के मुताबिक अरबों साल बाद सूरज के रेड जायंट बनने पर भी पृथ्वी बच सकती है, जबकि अब तक माना जाता था कि यह पूरी तरह निगल ली जाएगी।

दिव्या रेड्डीदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता 5 मिनट पढ़ें AI के लिए
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अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक पुरानी और डरावनी भविष्यवाणी अब बदलती दिख रही है। दशकों से खगोलविदों की सोच यही रही है कि जब सूरज बुढ़ापे में एक विशाल लाल तारे यानी रेड जायंट में बदलेगा, तो पृथ्वी उसकी चपेट में आकर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। लेकिन एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल में छपी एक नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है। नई स्टडी के मुताबिक पृथ्वी के पूरी तरह निगले जाने की बजाय बच निकलने के आसार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं।

सूरज के अंदर अभी क्या हो रहा है

इस पूरे मामले को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि सूरज के भीतर आज इस वक्त क्या चल रहा है। सूरज फिलहाल अपने मेन सीक्वेंस फेज में है, यानी स्थिरता के उस लंबे दौर में जो करीब 4.5 अरब साल से चल रहा है। इस दौरान सूरज की ऊर्जा मुख्य रूप से हाइड्रोजन के हीलियम में बदलने की प्रक्रिया से आती है, जो इसे बिना किसी बड़े उतार चढ़ाव के लगातार जलाए रखती है।

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यह स्थिरता हमेशा नहीं टिकेगी। आने वाले अरबों सालों में सूरज इसी फेज में रहते हुए धीरे धीरे और गर्म और ज्यादा चमकीला होता जाएगा। सूरज की चमक में यह धीमी बढ़ोतरी ही इतनी तेज हो जाएगी कि पृथ्वी की सतह का पूरा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा। नतीजा यह होगा कि अगले दो अरब सालों में ही पृथ्वी रहने लायक नहीं बचेगी, वह भी सूरज के रेड जायंट बनने से बहुत पहले।

करीब 5 अरब साल बाद शुरू होगा रेड जायंट चरण

करीब 5 अरब साल बाद सूरज का यह लंबा स्थिर दौर आखिरकार खत्म होगा। उस समय तक इसके केंद्र यानी कोर की सारी हाइड्रोजन खप चुकी होगी। बचा हुआ हीलियम कोर अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगेगा, इस प्रक्रिया में गर्म होगा और इसके चारों ओर मौजूद परत में हाइड्रोजन फ्यूजन शुरू हो जाएगा। इस वजह से सूरज की बाहरी परतें बेहद ज्यादा फैल जाएंगी, जबकि इसकी सतह का तापमान तेजी से गिर जाएगा। यही वजह है कि इस अवस्था में तारे का रंग गहरा लाल हो जाता है, जिसे रेड जायंट फेज कहा जाता है। असल में पृथ्वी की किस्मत को लेकर सस्पेंस यहीं से शुरू होता है।

पृथ्वी की कक्षा को लेकर दो ताकतों की खींचतान

जैसे जैसे सूरज फैलेगा, दो अलग अलग ताकतें पृथ्वी की कक्षा के भविष्य को तय करने के लिए एक दूसरे से टकराएंगी। एक तरफ सूरज तेज सौर हवाओं के जरिए अपना काफी द्रव्यमान यानी मास खो देगा। सूरज का मास घटने से उसका गुरुत्वाकर्षण खिंचाव कमजोर पड़ेगा, और इस वजह से पृथ्वी की कक्षा धीरे धीरे बाहर की तरफ खिसकनी चाहिए, यानी खतरे से दूर। दूसरी तरफ, सूरज के फैले हुए गैसीय आवरण के पृथ्वी के इतना करीब आने से एक तरह का घर्षण यानी ड्रैग पैदा होगा, और टाइडल फोर्स, यानी किसी पिंड के नजदीकी और दूर वाले हिस्से पर पड़ने वाले गुरुत्वाकर्षण के फर्क से बनने वाली ताकत, ब्रेक की तरह काम करते हुए पृथ्वी की कक्षीय ऊर्जा को धीरे धीरे चुराती जाएगी और उसे अंदर की तरफ खींचेगी।

अब तक ज्यादातर खगोलविदों का मानना यही था कि यह टाइडल ब्रेकिंग वाला असर मास के घटने से मिलने वाली बाहरी धक्के पर भारी पड़ेगा। इस स्थिति में पृथ्वी लगातार अपनी कक्षीय ऊर्जा गंवाती, सूरज की तरफ करीब सरकती जाती, और आखिरकार फूले हुए सूरज के भीतर समा कर पूरी तरह भाप बन जाती।

नई रिसर्च ने पूरा हिसाब कैसे बदला

नई स्टडी ने इस पूरे कैलकुलेशन को दो चीजों के बेहतर मॉडल के आधार पर दोबारा तैयार किया है, पहला यह कि सूरज रेड जायंट बनते वक्त कितना मास खोता है, और दूसरा यह कि टाइडल डिसिपेशन यानी टाइडल असर से कक्षीय ऊर्जा के रिसाव की प्रक्रिया असल में कितनी असरदार है। शोधकर्ताओं को पता चला कि टाइडल डिसिपेशन, यानी वह मैकेनिज्म जो कक्षीय ऊर्जा को सोखता है और पृथ्वी जैसी अंडाकार कक्षाओं को धीरे धीरे ज्यादा गोल बनाता है, पहले के मॉडलों में मानी गई ताकत से काफी कमजोर निकला। इस एक बदलाव ने पूरे समीकरण का संतुलन ही पलट दिया।

इस नतीजे को सहारा मिलता है पृथ्वी से करीब 209 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद एक असली रेड जायंट तारे एल2 पप्पिस के अवलोकन से। इन अवलोकनों से पता चलता है कि सूरज जैसा तारा रेड जायंट बनने के दौरान इतना ज्यादा मास खो सकता है कि यही मास लॉस टाइडल फोर्स के असर पर भारी पड़ जाए। अगर सूरज के मामले में भी ऐसा ही हुआ, तो पृथ्वी की कक्षा सिकुड़ने की बजाय धीरे धीरे चौड़ी होती जाएगी, जिससे रेड जायंट फेज में बचे रहने की उसकी संभावना काफी बढ़ जाएगी।

अभी भी पूरी तरह तय नहीं है पृथ्वी की किस्मत

इतनी उम्मीद भरी तस्वीर के बावजूद कोई भी वैज्ञानिक यह दावा नहीं कर रहा कि पृथ्वी का बचना पक्का है। सौर हवाओं का व्यवहार अनुमान लगाना मुश्किल है, और किसी तारे के आखिरी और उथल पुथल भरे चरणों में होने वाले थर्मल पल्स में इतने वेरिएबल शामिल होते हैं कि उन्हें पूरी सटीकता से मॉडल कर पाना आसान नहीं। अगर आगे चलकर पता चला कि सूरज नए मॉडल के अनुमान से कम मास खोता है, तो टाइडल फोर्स फिर भी हावी हो सकते हैं, और पृथ्वी को अंदर खींचकर आखिरकार उसका विनाश कर सकते हैं।

बुध, शुक्र और मंगल का क्या होगा

पृथ्वी की किस्मत भले ही अनिश्चित बनी हुई हो, बाकी सौरमंडल को लेकर वैज्ञानिक कहीं ज्यादा आश्वस्त हैं। बुध और शुक्र के मामले में कोई शक बाकी नहीं है, ये दोनों ग्रह सूरज की फैलती बाहरी परतों में पूरी तरह समा जाएंगे और तेज गर्मी व टाइडल खिंचाव के मिले जुले असर से हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। मंगल का अंजाम थोड़ा नरम रहेगा, तापमान में अचानक आई भारी बढ़ोतरी उसके स्थायी बर्फ के भंडार को भाप बना देगी, लेकिन लाल ग्रह असल में एक ज्यादा दूर की कक्षा में खिसक जाएगा और भौतिक रूप से नष्ट होने से बच जाएगा।

बृहस्पति और शनि के चांदों को मिल सकता है नया मौका

सौरमंडल में और आगे जाकर हालात अजीब तरीके से उम्मीद जगाने वाले दिखते हैं। बृहस्पति और शनि के चांदों की कक्षाएं बदलते हालात की वजह से नया आकार लेंगी, और सौर विकिरण में आई बढ़ोतरी यूरोपा और एन्सेलाडस जैसे चांदों की बर्फीली परत को कुछ समय के लिए पिघला सकती है, जिससे उनकी सतह पर तरल पानी के महासागर बन सकते हैं। इसका मतलब यह है कि ये दूर और जमे हुए चांद, कम से कम कुछ समय के लिए, नीले ग्रह पृथ्वी की जगह ले सकते हैं, ठीक उसी दौर में जब पृथ्वी खुद एक झुलसी हुई और वीरान जगह में बदल चुकी होगी।

सवाल-जवाब

नई स्टडी में क्या दावा किया गया है?
स्टडी के मुताबिक जब अरबों साल बाद सूरज एक रेड जायंट में बदलेगा, तब भी पृथ्वी के बचने की संभावना पहले की सोच से कहीं ज्यादा है।
सूरज कब रेड जायंट बनेगा?
वैज्ञानिकों के मुताबिक करीब 5 अरब साल बाद सूरज का हाइड्रोजन ईंधन खत्म हो जाएगा और यह रेड जायंट में बदलना शुरू करेगा।
पहले क्या माना जाता था?
अब तक ज्यादातर खगोलविद मानते थे कि टाइडल फोर्स का असर हावी रहेगा, जिससे पृथ्वी धीरे धीरे सूरज की तरफ खिंचकर उसमें समा जाएगी।
नई स्टडी में बदलाव की वजह क्या है?
नई स्टडी में पाया गया कि टाइडल डिसिपेशन का असर पहले के मॉडलों जितना मजबूत नहीं है, जबकि सूरज के मास लॉस का असर उसे पीछे छोड़ सकता है।
एल2 पप्पिस तारे का इससे क्या संबंध है?
पृथ्वी से करीब 209 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद रेड जायंट तारे एल2 पप्पिस के अवलोकन इस नई थ्योरी को सहारा देते हैं।
क्या पृथ्वी का बचना पूरी तरह तय है?
नहीं, सौर हवाओं और थर्मल पल्स से जुड़ी अनिश्चितताओं के चलते अगर सूरज कम मास खोता है तो टाइडल फोर्स फिर भी पृथ्वी को अंदर खींच सकते हैं।
बुध और शुक्र का क्या होगा?
बुध और शुक्र दोनों सूरज की फैलती बाहरी परतों में पूरी तरह समाकर हमेशा के लिए नष्ट हो जाएंगे।
मंगल और बृहस्पति, शनि के चांदों पर क्या असर होगा?
मंगल की बर्फ भाप बन जाएगी लेकिन वह दूर कक्षा में खिसककर बच जाएगा, जबकि यूरोपा और एन्सेलाडस जैसे चांदों की बर्फ पिघलकर कुछ समय के लिए तरल पानी के महासागर बना सकती है।
दिव्या रेड्डी
लेखक के बारे मेंदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता आगरा
विशेषज्ञताशिक्षा समाचार, स्कूल, विश्वविद्यालय, शिक्षा नीति, परीक्षा, छात्रवृत्ति, छात्र मामले, शैक्षणिक रुझान, उच्च शिक्षा, कौशल विकास

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक रुझानों और छात्रों से जुड़ी ख़बरों को कवर करती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के अहम घटनाक्रमों पर स्पष्टता व अंतर्दृष्टि के साथ रिपोर्ट करती हैं।

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो शिक्षा पत्रकारिता — स्कूल व विश्वविद्यालय की ख़बरों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक सुधारों, छात्र मामलों और कौशल विकास पहलों — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के ब्रेकिंग घटनाक्रम, परीक्षा अपडेट, संस्थागत बदलाव, सरकारी शिक्षा कार्यक्रम और सीखने में नवाचार पर रिपोर्ट करती हैं। सटीक व सुलभ रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ दिव्या छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे कवर करती हैं। उनका काम पाठ्यक्रम में बदलाव, उच्च शिक्षा रुझानों, छात्रवृत्ति अवसरों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा में तकनीक की बदलती भूमिका को उजागर करता है।

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