महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोणार झील न केवल भारत की बल्कि दुनिया की सबसे अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं में से एक है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 50,000 से 52,000 साल पहले एक विशालकाय उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण इस गोलाकार क्रेटर का निर्माण हुआ था, जो बाद में जल से भर गया। लगभग 1.8 किलोमीटर व्यास वाली यह झील बेसाल्ट चट्टानों के ऊपर बने दुनिया के उन गिने-चुने प्रभाव क्रेटरों में शामिल है, जिन्हें भूवैज्ञानिक बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। हालांकि, इस झील को वैश्विक पहचान इसके पानी के बार-बार बदलते रंगों के कारण मिली है।
रंग बदलने का मुख्य वैज्ञानिक कारण
इस झील का पानी किसी सामान्य मीठे पानी के स्रोत जैसा नहीं है। इसमें खारापन और क्षारीयता का स्तर बहुत ज्यादा है, जो इसे विशिष्ट बनाता है। जब भी मौसम में बदलाव आता है या पानी के तापमान और उसकी रासायनिक संरचना में उतार-चढ़ाव होता है, तो झील के भीतर मौजूद सूक्ष्म जीव और शैवाल तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। इन जीवों की जैविक प्रतिक्रिया ही मुख्य रूप से पानी के रंग को बदलने का काम करती है।
गुलाबी रंग की रहस्यमयी वजह
साल 2020 में जब लोणार झील का पानी अचानक गुलाबी हो गया, तो यह घटना पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय बन गई। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे का कारण बताते हुए कहा कि गर्म मौसम के दौरान जब झील का जलस्तर घटता है और खारापन बढ़ जाता है, तब हेलोफिलिक सूक्ष्मजीव और ड्यूनालिएला नामक सूक्ष्म शैवाल पनपने लगते हैं। ये जीव प्राकृतिक रूप से लाल और गुलाबी वर्णक उत्पन्न करते हैं, जिससे पूरा पानी उसी रंग में रंगा हुआ दिखने लगता है। यह पूरी तरह से एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, और जैसे ही मौसम बदलता है, पानी अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है।
हरा रंग कब और क्यों दिखता है?
झील का हरा रंग आमतौर पर तब दिखाई देता है जब शैवाल और अन्य जलीय सूक्ष्म जीवों की मात्रा सामान्य स्तर पर होती है। विशेष रूप से बारिश के मौसम में, जब झील में बाहरी पानी का प्रवाह बढ़ता है, तो पानी का खारापन कम हो जाता है। इस बदलती परिस्थितियों में गुलाबी रंग पैदा करने वाले जीवों की संख्या काफी गिर जाती है और हरे शैवाल अपना वर्चस्व बना लेते हैं, जिससे झील का दृश्य पूरी तरह बदल जाता है।
वैज्ञानिक शोध और भविष्य की संभावनाएं
लोणार झील की रासायनिक संरचना और खारे-क्षारीय पानी का मिश्रण इसे अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनाता है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इस झील का पर्यावरण मंगल ग्रह और चंद्रमा की सतह से काफी मेल खाता है, जिसके कारण इसे ग्रहों के भूगर्भीय अध्ययन के लिए एक प्रयोगशाला के रूप में देखा जाता है। प्रकृति का यह अनोखा रूप न केवल भारत के लिए गर्व की बात है, बल्कि यह विज्ञान के क्षेत्र में भी निरंतर नई जानकारियों के द्वार खोलता है।











