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धरती के नीचे फैले फंगस नेटवर्क का पहला पूरा नक्शा तैयार, दुनिया के 70 प्रतिशत पौधे इसी पर निर्भरविज्ञान
2 घंटे पहले· 2

धरती के नीचे फैले फंगस नेटवर्क का पहला पूरा नक्शा तैयार, दुनिया के 70 प्रतिशत पौधे इसी पर निर्भर

शोधकर्ताओं ने पहली बार आर्बस्कुलर माइकोराइजल फंगस के वैश्विक भूमिगत नेटवर्क का पूरा नक्शा तैयार किया है, जो धरती के करीब 70 प्रतिशत पौधों को पानी और पोषक तत्व देता है। अध्ययन के मुताबिक यह नेटवर्क करीब 300 मेगाटन कार्बन बायोमास के रूप में रखता है और हर साल इंसानी उत्सर्जन के करीब 11 प्रतिशत के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड मिट्टी में पहुंचाता है।

दिव्या रेड्डीदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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हर जंगल, हर घास के मैदान और हर खेत के नीचे फंगस का एक ऐसा जाल फैला है, जिसका असली आकार अब तक किसी ने ठीक से नापा ही नहीं था। शोधकर्ताओं ने पहली बार आर्बस्कुलर माइकोराइजल फंगस के इस भूमिगत नेटवर्क का पूरा वैश्विक नक्शा तैयार किया है, जो धरती के करीब 70 प्रतिशत पौधों को जिंदा रखने में मदद करता है।

मिट्टी के भीतर छिपा यह रिश्ता कैसे काम करता है

इन्हें एएम फंगस यानी आर्बस्कुलर माइकोराइजल फंगस कहा जाता है। ये मिट्टी में हाइफी नाम के बेहद पतले धागों के जरिए फैलते हैं और पौधों की जड़ों से जुड़ जाते हैं। यह कोई प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि लेनदेन का रिश्ता है, फंगस मिट्टी से पानी और पोषक तत्व निकालकर पौधों को देते हैं, और बदले में पौधे प्रकाश संश्लेषण से बनाया गया कार्बन फंगस को लौटाते हैं। यह साझेदारी करोड़ों सालों से धरती पर जीवन को आकार दे रही है, लेकिन अब तक किसी को ठीक अंदाजा नहीं था कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है या दुनियाभर में कहां कितना फैला है।

पिछले साल नेचर पत्रिका में छपे एक अध्ययन ने यह जरूर बताया था कि इन भूमिगत फंगस समुदायों की विविधता जगह-जगह कैसे बदलती है। लेकिन विविधता और घनत्व दो अलग चीजें हैं, और इस नए अध्ययन से पहले किसी ने भी इस नेटवर्क की मात्रा को दुनियाभर के स्तर पर मापने की कोशिश नहीं की थी।

322 अध्ययनों और 16,000 मिट्टी नमूनों से तैयार हुआ नक्शा

इस कमी को पूरा करने के लिए शोधकर्ताओं ने 322 पुराने अध्ययनों का डेटा इकट्ठा किया और उसे दुनियाभर के अलग अलग पारिस्थितिकी तंत्रों से लिए गए 16,000 मिट्टी के नमूनों के साथ जोड़ा। इस पूरे डेटा को मशीन लर्निंग मॉडल और अत्याधुनिक इमेजिंग तकनीकों से गुजारकर टीम ने अंदाजा लगाया कि यह नेटवर्क कितनी दूर तक फैला है और इसमें कितना बायोमास मौजूद है।

सह लेखक कोरेंटिन बिसो ने कहा, हाई रेजोल्यूशन इमेजिंग, मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स जैसी नई तकनीकों के आने से अब हम वह सब उजागर करने लगे हैं जो लंबे समय से हमारे पैरों तले छिपा रहा है। हम यह समझ रहे हैं कि फंगस की जटिल नेटवर्क बनाने वाली संरचनाएं पोषक तत्वों का परिवहन कैसे करती हैं और जलवायु को नियंत्रित करने में कैसे मदद करती हैं।

आंकड़े जो सोच से परे हैं

डेटा से जो तस्वीर सामने आई वह हैरान करने वाली है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक इस भूमिगत फंगस नेटवर्क की कुल लंबाई करीब 110 क्वाड्रिलियन किलोमीटर है, और इसमें करीब 300 मेगाटन कार्बन बायोमास के रूप में मौजूद है, यानी धरती पर मौजूद सभी इंसानों के कुल वजन से करीब चार से छह गुना ज्यादा।

यह नेटवर्क जलवायु के लिए भी काम करता है, यह हर साल करीब 4 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर मात्रा मिट्टी में पहुंचाता है, जो इंसानों के सालाना कार्बन उत्सर्जन का करीब 11 प्रतिशत है।

मुख्य लेखक जस्टिन स्टीवर्ट, जो सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ अंडरग्राउंड नेटवर्क्स से जुड़े हैं, ने इसे रोजमर्रा की भाषा में समझाया, इन फंगस के महत्व और इनके आकार को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। मिट्टी के एक चम्मच में भी माइकोराइजल नेटवर्क की लंबाई 10 मीटर तक हो सकती है।

खेती की जमीन में पतला पड़ता नेटवर्क

अध्ययन में एक चेतावनी भी दी गई है। इसके मुताबिक खेती वाली मिट्टी में इन फंगस नेटवर्क का घनत्व प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों की तुलना में करीब आधा ही रह जाता है। यह चिंता की बात इसलिए है क्योंकि घास के मैदान, जिनमें दुनिया के करीब 40 प्रतिशत आर्बस्कुलर माइकोराइजल बायोमास मौजूद है, सबसे कम संरक्षित पारिस्थितिकी तंत्रों में गिने जाते हैं, और इन्हें जंगलों की तुलना में चार गुना तेज रफ्तार से खेती की जमीन में बदला जा रहा है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक जैसे ही यह नेटवर्क पतला पड़ता है, मिट्टी की कार्बन जमा करने और पोषक तत्वों को दोबारा इस्तेमाल में लाने की क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है, जिससे धरती की जलवायु सुरक्षा की एक खामोश परत कमजोर हो जाती है।

आगे की राह

सह लेखक मर्लिन शेल्ड्रेक ने इस अध्ययन को अंत नहीं बल्कि शुरुआत बताया, माइकोराइजल फंगस ने करोड़ों सालों से धरती पर जीवन को आकार दिया है, लेकिन हमें अब भी बहुत कम पता है कि इन जीवित परिवहन तंत्रों का ढांचा दुनियाभर में कैसे फैला हुआ है। यह अध्ययन इस ग्रहीय संचार तंत्र को समझने की दिशा में एक अहम कदम है, और यह बताता है कि खाद्य सुरक्षा से लेकर जलवायु परिवर्तन तक, हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए हम फंगस के साथ बेहतर तरीके से कैसे काम कर सकते हैं।

इसका आप पर असर

यह शोध सीधे तौर पर कोई कीमत या नियम नहीं बदलता, लेकिन यह खेती और भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए एक अहम संकेत देता है।

  • किसानों और खाद्य सुरक्षा के लिए: खेती वाली मिट्टी में फंगस नेटवर्क का घनत्व प्राकृतिक जमीन के मुकाबले आधा पाया गया है, इसलिए मिट्टी की सेहत बनाए रखने वाले तरीके अपनाना लंबे समय में खेतों की उर्वरता बचाए रखने के लिए जरूरी हो सकता है।
  • जलवायु से जुड़े मुद्दों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए: चूंकि यह फंगस नेटवर्क पहले से ही इंसानी कार्बन उत्सर्जन के करीब 11 प्रतिशत के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड मिट्टी में पहुंचा रहा है, इसलिए घास के मैदानों को खेती में बदले जाने से बचाना जलवायु के लिए एक सस्ता और असरदार कदम साबित हो सकता है।

सवाल-जवाब

आर्बस्कुलर माइकोराइजल फंगस (एएम फंगस) क्या है?
यह एक भूमिगत फंगस है जो हाइफी नाम के महीन धागों से पौधों की जड़ों से जुड़कर उन्हें पानी और पोषक तत्व देता है, और बदले में पौधे से प्रकाश संश्लेषण से बना कार्बन लेता है।
यह फंगस नेटवर्क कितना बड़ा है?
शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक इसकी कुल लंबाई करीब 110 क्वाड्रिलियन किलोमीटर है और इसमें करीब 300 मेगाटन कार्बन बायोमास के रूप में मौजूद है, जो सभी इंसानों के कुल वजन से चार से छह गुना ज्यादा है।
यह वैश्विक नक्शा कैसे तैयार किया गया?
शोधकर्ताओं ने 322 पुराने अध्ययनों के डेटा और दुनियाभर से लिए गए 16,000 मिट्टी के नमूनों को मशीन लर्निंग और इमेजिंग तकनीकों से जोड़कर यह अनुमान लगाया।
यह नेटवर्क जलवायु के लिए क्यों जरूरी है?
यह हर साल करीब 4 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर मात्रा मिट्टी में पहुंचाता है, जो इंसानों के सालाना कार्बन उत्सर्जन का करीब 11 प्रतिशत है।
खेती की जमीन पर इसका क्या असर पड़ रहा है?
खेती वाली मिट्टी में इस नेटवर्क का घनत्व प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के मुकाबले करीब आधा है, और घास के मैदान जंगलों की तुलना में चार गुना तेजी से खेती की जमीन में बदले जा रहे हैं।
इस अध्ययन के लेखक कौन हैं?
इस अध्ययन में जस्टिन स्टीवर्ट, कोरेंटिन बिसो और मर्लिन शेल्ड्रेक जैसे शोधकर्ता शामिल हैं।
दिव्या रेड्डी
लेखक के बारे मेंदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता आगरा
विशेषज्ञताशिक्षा समाचार, स्कूल, विश्वविद्यालय, शिक्षा नीति, परीक्षा, छात्रवृत्ति, छात्र मामले, शैक्षणिक रुझान, उच्च शिक्षा, कौशल विकास

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक रुझानों और छात्रों से जुड़ी ख़बरों को कवर करती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के अहम घटनाक्रमों पर स्पष्टता व अंतर्दृष्टि के साथ रिपोर्ट करती हैं।

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो शिक्षा पत्रकारिता — स्कूल व विश्वविद्यालय की ख़बरों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक सुधारों, छात्र मामलों और कौशल विकास पहलों — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के ब्रेकिंग घटनाक्रम, परीक्षा अपडेट, संस्थागत बदलाव, सरकारी शिक्षा कार्यक्रम और सीखने में नवाचार पर रिपोर्ट करती हैं। सटीक व सुलभ रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ दिव्या छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे कवर करती हैं। उनका काम पाठ्यक्रम में बदलाव, उच्च शिक्षा रुझानों, छात्रवृत्ति अवसरों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा में तकनीक की बदलती भूमिका को उजागर करता है।

पूरा प्रोफ़ाइल देखें ↗
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