भारत अपनी अंतरिक्ष और सैन्य निगरानी व्यवस्था को इस स्तर पर मजबूत करने में जुटा है कि पड़ोसी देश के हर कोने पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखी जा सके। इस रणनीति के तहत भारत पारंपरिक उपग्रहों और सामान्य ड्रोनों के बीच की एक बेहद आधुनिक कड़ी पर काम कर रहा है, जिसे हाई-एल्टीट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट्स यानी HAPS कहा जाता है। इन खास विमानों की मदद से पाकिस्तानी क्षेत्र के भीतर होने वाली हर हलचल को अंतरिक्ष जैसी ऊंचाई से आसानी से ट्रैक किया जा सकेगा। इसके लिए न तो किसी लड़ाकू विमान को दुश्मन की सीमा में भेजने की जरूरत पड़ेगी और न ही किसी मिसाइल का इस्तेमाल करना होगा, बल्कि देश की सीमा के अंदर सुरक्षित रहकर ही पड़ोसी देश की हर गतिविधि का मुआयना किया जा सकेगा।
स्वदेशी HAPS तकनीक और हालिया उड़ान परीक्षण
भारत के स्वदेशी HAPS कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में वैज्ञानिक लगातार जुटे हुए हैं और इसमें हाल ही में महत्वपूर्ण सफलता भी हासिल हुई है। सीएसआईआर नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज यानी NAL ने 12 मीटर विंगस्पैन वाले एक सब-स्केल प्रोटोटाइप का सफल परीक्षण किया है, जिसने 8 घंटे से अधिक समय तक लगातार उड़ान भरी। इस शुरुआती सफलता के बाद अब वैज्ञानिकों की योजना करीब 30 मीटर विंगस्पैन वाले पूर्ण आकार के HAPS को विकसित करने की है। इस बड़े संस्करण के लिए साल 2027 तक लगातार 90 दिनों तक हवा में रहने की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी DAC पहले ही सशस्त्र बलों के लिए इस आधुनिक तकनीक की खरीद को मंजूरी दे चुकी है, जिससे यह साफ होता है कि देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं में यह प्रोजेक्ट कितना अहम है।
समताप मंडल में उड़ान और तकनीकी विशेषताएं
सौर ऊर्जा से संचालित होने वाले ये विमान जमीन से करीब 17 से 25 किलोमीटर यानी समताप मंडल की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और बिना उतरे लगातार कई हफ्तों या महीनों तक हवा में बने रहने की क्षमता रखते हैं। ‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, HAPS का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ इसकी अत्यधिक ऊंचाई है, क्योंकि यह सामान्य विमानों के ट्रैफिक और खराब मौसम के स्तर से काफी ऊपर रहकर काम करता है। पाकिस्तान के पास मौजूद F-16 और JF-17 जैसे लड़ाकू विमान आम तौर पर करीब 50,000 से 60,000 फीट की ऊंचाई तक ही संचालन कर पाते हैं। इसके मुकाबले 70,000 से 80,000 फीट की ऊंचाई पर मंडराने वाले इन प्लेटफॉर्म्स को पारंपरिक लड़ाकू विमानों की मदद से रोकना बेहद कठिन साबित होगा।
चुनौतियां और लागत का समीकरण
हालांकि इतनी ऊंचाई HAPS को पूरी तरह से अचूक या सुरक्षित नहीं बनाती है। लंबी दूरी की आधुनिक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें यानी SAM 20 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता रखती हैं। यदि कोई HAPS किसी बेहद सुरक्षित सैन्य प्रतिष्ठान के ऊपर से गुजरे तो ताकतवर रडार और एयर डिफेंस सिस्टम उसे ट्रैक करने में सफल हो सकते हैं। इसके अलावा भविष्य में हाई-एल्टीट्यूड मिसाइलें, लेजर हथियार और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसी तकनीकें भी इनके सामने नई मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। इसके बावजूद HAPS के पक्ष में सबसे बड़ा मजबूत पहलू लागत का संतुलन है। एक हल्के और बिना हथियारों वाले सौर ऊर्जा चालित प्लेटफॉर्म को गिराने के लिए करोड़ों रुपये की महंगी इंटरसेप्टर मिसाइल का उपयोग करना दुश्मन देश के लिए भारी वित्तीय नुकसान का सौदा बन सकता है, जिसे सामरिक भाषा में ‘कॉस्ट-एक्सचेंज इंबैलेंस’ कहा जाता है।
व्यापक सामरिक और नागरिक उपयोग
भारत के लिए HAPS का सबसे असरदार उपयोग दूसरे देश के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किए बिना स्टैंड-ऑफ निगरानी करना होगा। लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई से इन विमानों के कैमरे सैकड़ों किलोमीटर दूर तक के इलाके को साफ देख सकते हैं। आधुनिक कैमरों, थर्मल सेंसर और सिग्नल इंटेलिजेंस उपकरणों से लैस ये प्लेटफॉर्म भारतीय क्षेत्र में सुरक्षित रहकर पड़ोसी देश के भीतर सैन्य ठिकानों, सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही, एयरबेस और लॉजिस्टिक रास्तों पर लगातार नजर रख सकते हैं। इससे किसी भी प्रकार के राजनीतिक या सैन्य तनाव का जोखिम भी न्यूनतम हो जाता है। इसके अलावा HAPS का इस्तेमाल दूरदराज के इलाकों में संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने, आपदा प्रबंधन के वक्त राहत कार्यों में मदद करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों के लिए ‘फ्लोटिंग सेल टावर’ के रूप में भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। देश में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL के साथ कई निजी एयरोस्पेस कंपनियां भी इस तकनीक के विकास में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। लगभग 15,000 किलोमीटर लंबी थल सीमा और विशाल तटरेखा वाले भारत के लिए ये प्लेटफॉर्म अंतरिक्ष आधारित महंगे संसाधनों और कम दूरी के ड्रोनों के बीच एक मजबूत और किफायती विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।



















