पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के एक मलबे और कचरे के ढेर में वैज्ञानिकों के हाथ एक ऐसी जैविक खोज लगी है, जिसे पहली नजर में खतरनाक समझा जा सकता है लेकिन जो पर्यावरण के लिहाज से बहुत बड़ी राहत बन सकती है। इस शोध के दौरान मिट्टी के नमूनों से एक ऐसा खास फंगस निकाला गया है जो उस जिद्दी प्लास्टिक को नष्ट करने की ताकत रखता है जिसे सामान्य तरीकों से खत्म करना लगभग असंभव माना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अनूठी खोज से वैश्विक स्तर पर बढ़ते कचरे के संकट से पार पाने के नए रास्ते सामने आ सकते हैं।
डंपिंग ग्राउंड की मिट्टी से हुई पहचान
इस फंगस का वैज्ञानिक नाम Aspergillus tubingensis है। इसकी पहचान इस्लामाबाद शहर के भीतर स्थित एक स्थानीय नगरपालिका के कचरा डंपिंग ग्राउंड से जुटाई गई मिट्टी के नमूनों के जरिए की गई। जब शोधकर्ताओं ने इस जीव को प्रयोगशाला के भीतर पॉलिएस्टर पॉलीयूरेथेन यानी पीयू के संपर्क में रखा, तो इसके प्रभाव ने तुरंत सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह पॉलीयूरेथेन कोई आम या कमजोर सामग्री नहीं है, बल्कि इसका उपयोग सिंथेटिक लेदर, विभिन्न प्रकार की कोटिंग, कुशनिंग सामग्री, इंसुलेशन और कई तरह के औद्योगिक सामानों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसकी अत्यधिक मजबूती ही इसे उद्योगों में लोकप्रिय बनाती है, लेकिन यही खूबी पर्यावरण में इसके प्राकृतिक क्षरण को बेहद कठिन बना देती है।
प्लास्टिक की सतह पर हमले की प्रक्रिया
प्रयोग के दौरान यह देखा गया कि Aspergillus tubingensis सबसे पहले पॉलीयूरेथेन की बाहरी सतह पर तेजी से फैलता है। इसके बाद उस सामग्री के भीतर धीरे-धीरे भौतिक बदलाव स्पष्ट रूप से नजर आने लगते हैं। जब वैज्ञानिकों ने इसे माइक्रोस्कोप की मदद से परखा, तो सतह पर अनगिनत खरोंच, गहरी दरारें, कटाव और सूक्ष्म छिद्र बने हुए पाए गए। इसका साफ अर्थ यह था कि वह फंगस केवल उस सतह पर अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा रहा था, बल्कि उसकी आंतरिक संरचना को सक्रिय रूप से क्षति पहुंचा रहा था।
दो महीने के परीक्षण के नतीजे
इस जीव की क्षमता को परखने के लिए कई प्रकार के नियंत्रित प्रयोग किए गए। इनमें से एक परीक्षण तरल माध्यम के भीतर पॉलीयूरेथेन फिल्म के साथ इस फंगस को रखना भी शामिल था। करीब दो महीने की समयावधि बीतने के बाद वह पॉलीयूरेथेन फिल्म छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो चुकी थी। शोधकर्ताओं ने नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में इसे पूरी तरह डिग्रेडेड या क्षतिग्रस्त पाया। इन बदलावों की गहराई से थाह पाने के लिए उन्नत तकनीकों का सहारा लिया गया। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के जरिए प्लास्टिक की सतह पर आए विकारों को जांचा गया, जबकि एटीआर-एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से पॉलीयूरेथेन के भीतर मौजूद रासायनिक बंधनों में आए फेरबदल का पता लगाया गया। इसके अलावा, अध्ययन के दौरान एस्टरेज और लाइपेज जैसे विशिष्ट एंजाइमों की सक्रियता के संकेत भी मिले, जो इस बात का संकेत देते हैं कि यही एंजाइम पॉलिमर की जटिल संरचना को तोड़ने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
हालांकि वैज्ञानिक इस बात को लेकर पूरी तरह सतर्क हैं कि इस खोज को अभी से प्लास्टिक के पूर्ण समाधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरा परीक्षण एक नियंत्रित प्रयोगशाला के भीतर संपन्न हुआ था। किसी सिंथेटिक उत्पाद का छोटे टुकड़ों में टूट जाना और उसका पर्यावरण में पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित पदार्थों में बदल जाना दो बिल्कुल अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए इस शुरुआती सफलता के आधार पर इसे फौरन अंतिम हल मान लेना जल्दबाजी साबित हो सकता है।
औद्योगिक स्तर पर उपयोग की संभावनाएं
इसके बावजूद शोधकर्ताओं का उत्साह उच्च स्तर पर बना हुआ है क्योंकि इस कदम ने अनुसंधान के नए द्वार खोल दिए हैं। आज तक दुनिया भर में प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए मुख्य रूप से रिसाइक्लिंग, मैकेनिकल प्रोसेसिंग और रासायनिक उपचार जैसी तकनीकों पर ही भरोसा किया जाता रहा है। इसके बावजूद कई तरह के ऐसे प्लास्टिक मौजूद हैं जिन्हें सामान्य विधियों से नष्ट करना अत्यंत दुष्कर है। पॉलीयूरेथेन भी इसी श्रेणी में आता है। आने वाले समय में वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर सकते हैं कि इस विशेष फंगस के कौन से एंजाइम प्लास्टिक की बनावट पर सीधा प्रहार करते हैं और वे किस सटीक रासायनिक तरीके से उसे नष्ट करते हैं। यदि भविष्य में इन एंजाइमों को अलग करके बड़े पैमाने पर उपयोग करने वाली तकनीक विकसित कर ली जाती है, तो कचरे के प्रबंधन के लिए एक क्रांतिकारी जैविक माध्यम हाथ लग सकता है।
इस पूरी खोज का सबसे खास पहलू यह है कि यह अनोखा जीव किसी हाई-टेक प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार नहीं किया गया था, बल्कि इसे इस्लामाबाद के एक साधारण कचरा निपटान केंद्र की मिट्टी से खोजा गया था। जिस स्थान को सामान्य तौर पर प्रदूषण और गंदगी का प्रतीक माना जाता है, प्रकृति ने उसी जगह से इस समस्या से मुकाबले की संभावित कुंजी भी प्रदान कर दी है। साल 2017 में प्रकाशित एक पूर्व शोध में भी इसी फंगस द्वारा पॉलीयूरेथेन को जैविक रूप से नष्ट करने की क्षमता का जिक्र किया गया था। अब वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रकृति में पाए जाने वाले ऐसे सूक्ष्मजीवों की कार्यक्षमता को प्रयोगशाला के दायरे से बाहर निकालकर औद्योगिक पैमाने पर ढाला जा सकता है। यदि भविष्य में इसका उत्तर सकारात्मक मिलता है, तो इस्लामाबाद के कचरे के ढेर से निकाला गया यह सूक्ष्म जीव दुनिया की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में शुमार प्लास्टिक कचरे के खिलाफ एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक सफलता बन सकता है।



















