सावन का पावन महीना शुरू होते ही चारों तरफ रिमझिम बारिश, सुहावना मौसम और हरियाली छा जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि को भगवान शिव की पूजा-अर्चना और नाग पूजन के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। हालांकि, इसी दौरान रिहाइशी इलाकों, खेतों और बगीचों में सांपों की मौजूदगी अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। अधिकांश लोग इस घटना को केवल धार्मिक आस्था और परंपराओं से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि इसका मुख्य कारण पूरी तरह से प्राकृतिक परिवर्तन और मौसम का मिजाज है। मानसून के समय वातावरण में होने वाले बदलाव सांपों के शरीर, उनकी आदतों और जीवन चक्र को गहराई से प्रभावित करते हैं।
जलभराव के कारण बिलों से बेघर होना
मानसून की शुरुआत के साथ ही जब मुसलाधार बारिश होती है, तो जमीन के भीतर बने सांपों के प्राकृतिक आवास और बिल पानी से पूरी तरह भर जाते हैं। चूहे या अन्य जीवों द्वारा बनाए गए जिन गड्ढों में सांप शरण लेते हैं, वहां नमी अत्यधिक बढ़ जाती है और पानी का जमाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में दम घुटने और डूबने के खतरे से बचने के लिए सांपों के पास बाहर निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। वे सुरक्षित, सूखे और ऊंचे स्थानों की तलाश में बाहर निकलते हैं। यही कारण है कि बारिश के दिनों में वे अक्सर इंसानी बस्तियों, घरों के कोनों, सूखी झाड़ियों और पत्थरों के ढेर के पास शरण लेते दिखाई देते हैं।
ठंडे खून वाले शरीर पर मौसम का असर
सांपों की शारीरिक बनावट और उनकी जैविक प्रणाली अन्य स्तनधारी जीवों से काफी अलग होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सांप ठंडे खून वाले जीव होते हैं। इसका अर्थ यह है कि वे अपने शरीर का तापमान स्वयं नियंत्रित नहीं कर पाते और उनका शारीरिक तापमान पूरी तरह से बाहरी वातावरण पर निर्भर करता है। कड़ाके की ठंड या अत्यधिक गर्मी के समय उनकी शारीरिक गतिविधियां सुस्त पड़ जाती हैं। हालांकि, मानसून के मौसम में जब तापमान में एक संतुलन आता है और वातावरण में नमी बढ़ती है, तो यह स्थिति उनके लिए बेहद अनुकूल साबित होती है। इस सुखद माहौल में उनकी ऊर्जा का स्तर बढ़ता है और वे अधिक सक्रिय होकर विचरण करने लगते हैं।
भोजन की उपलब्धता और शिकार की तलाश
मानसून का समय केवल सांपों के लिए ही नहीं, बल्कि कई अन्य छोटे जीवों के लिए भी सक्रियता का काल होता है। बारिश के मौसम में मेंढक, चूहे, छिपकलियां, कीड़े-मकोड़े और अन्य छोटे रेंगने वाले जीव बड़ी संख्या में अपने बिलों से बाहर आते हैं। ये सभी जीव सांपों का मुख्य भोजन होते हैं। जब भोजन की उपलब्धता हर तरफ बढ़ जाती है, तो सांप शिकार करने और अपनी भूख मिटाने के लिए अधिक दूरी तय करते हैं। भोजन की इस सहज उपलब्धता के कारण ही वे अपने नियमित छिपने के स्थानों को छोड़कर खुले क्षेत्रों और मानव बस्तियों की ओर खिंचे चले आते हैं।
प्रजनन काल और आवाजाही में बढ़ोतरी
सांपों की आवाजाही बढ़ने का एक अन्य प्रमुख जैविक कारण उनका प्रजनन चक्र है। कई प्रजातियों के सांपों का प्रजनन काल मानसून के महीनों के दौरान ही होता है। इस अवधि में नर और मादा सांप साथी की तलाश में सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक दूरी तय करते हैं। साथी की खोज और वंश बढ़ाने की इस स्वाभाविक प्रक्रिया के कारण सांपों का अपने क्षेत्र से बाहर निकलना अनिवार्य हो जाता है। इस दौरान उनकी स्वाभाविक चौकसी और आवाजाही बहुत बढ़ जाती है, जिससे लोगों का सामना उनसे होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
वर्ष 2024 के वैज्ञानिक अध्ययन के आंकड़े
सांपों की इस मौसमी सक्रियता को प्रमाणित करने के लिए वर्ष 2024 में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन प्रकाशित किया गया था। इस शोध में दिल्ली क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में सांपों के दिखने और बचाव की घटनाओं का बारीक विश्लेषण किया गया। अध्ययन के परिणामों से स्पष्ट हुआ कि साल भर के मुकाबले जुलाई और अगस्त के महीनों में सांपों के दिखने की घटनाएं अपने उच्चतम स्तर पर थीं। शोधकर्ताओं ने इस आंकड़े के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बारिश की मात्रा, वायुमंडलीय आर्द्रता और अनुकूल तापमान का सांपों की दैनिक गतिविधियों तथा उनके बाहर निकलने की दर से बेहद मजबूत और सीधा संबंध होता है।
धार्मिक आस्था और प्राकृतिक विज्ञान का समन्वय
सावन के महीने में नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और भगवान शिव के गले में सुशोभित नागराज की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में सांपों को पूजनीय स्थान दिया गया है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। हालांकि वैज्ञानिक प्रमाण इस बात की पुष्टि करते हैं कि सावन में सांपों का बार-बार दिखना किसी अलौकिक घटना के बजाय प्रकृति के कठोर नियमों, पर्यावरण संतुलन और उनके जीवित रहने की मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस मौसम में धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ सतर्कता और वैज्ञानिक जागरूकता बनाए रखना बेहद जरूरी है।



















