स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों के गलियारों में दशकों बाद एक बार फिर उस संक्रामक बीमारी ने दस्तक दी है जिसे आधुनिक चिकित्सा प्रणाली लगभग इतिहास मान चुकी थी। संयुक्त राज्य अमेरिका में खसरा यानी मीजल्स के मामलों में अचानक आई तेजी ने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को एक अभूतपूर्व दबाव में डाल दिया है। पूरे देश में इस बीमारी के मामलों का आंकड़ा 3,600 के पार पहुंच गया है, जो वर्ष 1991 के बाद से दर्ज किया गया किसी भी एक साल का सबसे बड़ा स्तर है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए अस्पताल और स्वास्थ्य देखभाल केंद्र अपने दशकों पुराने धूल फांक रहे संक्रमण नियंत्रण नियमों को नए सिरे से लागू करने के साथ ही बिल्कुल नई कार्यप्रणालियों को अपनाने पर मजबूर हो रहे हैं।
पेंसिल्वेनिया में खसरे का केंद्र और आपातकालीन तैयारियां
पेंसिल्वेनिया राज्य का लैनकास्टर काउंटी इस समय संक्रमण के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभरा है। यहां लिटिट्ज स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग मेडिकल सेंटर के सामुदायिक अस्पताल में अब तक करीब 50 संभावित खसरा मरीजों का परीक्षण किया जा चुका है। इनमें से लगभग 20 मरीजों की हालत ऐसी थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पूरे पेंसिल्वेनिया राज्य के आंकड़ों की बात करें तो 30 सितंबर तक यहां कुल 943 मामले सामने आ चुके हैं। इन मामलों में से 176 लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई, जबकि पांच मरीजों की मौत खसरे से संबंधित जटिलताओं के चलते हो चुकी है।
लिटिट्ज अस्पताल में खसरे की पहचान के लिए स्क्रीनिंग व्यवस्था को काफी तेज कर दिया गया है। वहां आने वाले हर मरीज से बुखार, खांसी, गले में खराश और आंखों के लाल होने जैसे शुरुआती लक्षणों के बारे में विस्तार से पूछा जा रहा है। इसके साथ ही यह भी अनिवार्य रूप से दर्ज किया जा रहा है कि व्यक्ति को टीका लगा है या नहीं। चिकित्सकों के अनुसार खसरे का खास दानेदार लाल चकत्ता वायरस के संपर्क में आने के एक से दो सप्ताह बाद या फिर सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण शुरू होने के तीन से पांच दिन बाद ही त्वचा पर उभरता है। यही कारण है कि चकत्ते दिखने से पहले ही मरीज अनजाने में कई अन्य लोगों को संक्रमित कर सकता है।
कार पार्किंग में स्क्रीनिंग और नेगेटिव प्रेशर कमरों का घेरा
संक्रमण को अस्पताल के भीतर फैलने से रोकने के लिए चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि उन्हें किसी मरीज में खसरे का संदेह हो, तो उसे इमरजेंसी विभाग में भेजने से पहले अस्पताल को फोन पर सूचित करें। ऐसे मरीजों के लिए नियम बेहद सख्त बनाए गए हैं। मरीज को मास्क पहनकर सीधे अस्पताल की पार्किंग में ही अपनी गाड़ी के भीतर इंतजार करना होता है। अस्पताल का स्वास्थ्य कर्मी खुद पार्किंग में जाकर मरीज से मिलता है और उसे आम प्रतीक्षा कक्ष से दूर रखते हुए सीधे नेगेटिव प्रेशर कमरे में ले जाता है।
नेगेटिव प्रेशर वाले कमरे ऐसे विशेष आइसोलेशन कक्ष होते हैं जिनमें हवा का दबाव बाहर के गलियारों की तुलना में कम रखा जाता है। इस तकनीक के कारण हवा में मौजूद खतरनाक वायरस कमरे के भीतर ही कैद रहते हैं और अस्पताल के अन्य हिस्सों में नहीं फैल पाते हैं। जिन मरीजों में बीमारी के लक्षण बहुत गंभीर नहीं होते, उन्हें अस्पताल आने के बजाय सीधे अपने घर पर ही आइसोलेशन में रहने की सख्त हिदायत दी जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य अस्पताल परिसर को संक्रमण मुक्त रखना है, क्योंकि एक बार अस्पताल के अंदर वायरस पहुंचने पर अन्य कमजोर मरीजों तक इसका प्रसार रोकना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
टीकाकरण में गिरावट और दवाओं का आपातकालीन भंडारण
पूर्वी पेंसिल्वेनिया और न्यू जर्सी में सेवाएं देने वाले सेंट ल्यूक्स यूनिवर्सिटी हेल्थ नेटवर्क में बाल रोग विभाग की प्रमुख जेनिफर जान्को का कहना है कि टीकाकरण की दर में लगातार गिरावट और देश भर में संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए मामलों का सामने आना तय माना जा रहा था। इस नेटवर्क ने जुलाई के अंत में बिना टीका लगे दो सगे भाई-बहनों का खसरे का इलाज किया था। इनमें से एक बच्चे को दूसरे स्वास्थ्य नेटवर्क में भर्ती कराया गया था, जहां से छुट्टी मिलने के बाद दोनों बच्चों की देखभाल बाल रोग विशेषज्ञों ने रिमोट निगरानी के जरिए उनके घर पर ही रखकर की। नेटवर्क ने कई अन्य संदिग्ध मरीजों की भी जांच की है।
संभावित मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य नेटवर्क ने खसरा, कण्ठमाला और रूबेला यानी एमएमआर वैक्सीन के साथ-साथ इम्यून ग्लोबुलिन का भी बड़ा स्टॉक जुटा लिया है। इम्यून ग्लोबुलिन स्वस्थ मानव रक्त प्लाज्मा से तैयार की जाने वाली एंटीबॉडीज का एक विशेष मिश्रण होता है। बिना टीकाकरण वाले लोगों में वायरस के संपर्क में आने के 72 घंटों के भीतर यदि एमएमआर टीका लगा दिया जाए, तो संक्रमण से बचाव हो सकता है या बीमारी की गंभीरता काफी कम हो जाती है। वहीं दूसरी ओर इम्यून ग्लोबुलिन को वायरस के संपर्क में आने के छह दिनों बाद तक भी दिया जा सकता है, जिससे बीमारी के गंभीर लक्षणों को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलती है।
जांच में लगने वाला समय और सैंपल जुटाने की चुनौतियां
इन जीवनरक्षक दवाओं और टीकों का सही समय पर इस्तेमाल तभी संभव है जब बीमारी की पुष्टि बेहद तेजी और सटीकता से हो। दशकों तक खसरा लगभग गायब रहने के कारण ज्यादातर अस्पतालों के पास अपने स्तर पर इसकी तुरंत जांच करने की आंतरिक लैब सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। मरीजों की नाक या गले से स्वैब का नमूना एकत्र करके उसे व्यावसायिक या सरकारी जनस्वास्थ्य प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। इन बाहरी प्रयोगशालाओं से जांच रिपोर्ट आने में आमतौर पर एक से तीन दिन का समय लग जाता है, जो उपचार के शुरुआती समय के लिहाज से काफी संवेदनशील होता है।
जिन मामलों में खसरे की संभावना बहुत अधिक होती है, जैसे कि बिना टीके वाला कोई व्यक्ति किसी पुष्ट संक्रमित मरीज के संपर्क में आया हो, वहां पेंसिल्वेनिया स्वास्थ्य विभाग खुद अपना प्रतिनिधि मरीज के घर भेजकर नमूने एकत्र करवाता है। कई अन्य मामलों में मरीजों को अस्पताल की पार्किंग में अपनी गाड़ी में ही रुकने के लिए कहा जाता है, जहां स्वास्थ्य कर्मी पीपीई किट में पहुंचकर उनका सैंपल लेते हैं ताकि आम वेटिंग रूम में बैठे अन्य लोगों को जोखिम में न डाला जाए।
साउथ कैरोलिना का अनुभव और बुनियादी ढांचे में बदलाव
जब पिछले साल साउथ कैरोलिना के स्पार्टनबर्ग काउंटी में खसरे के शुरुआती मामले सामने आए थे, तब पास के ग्रीनविले स्थित प्रिज्मा हेल्थ के कर्मचारियों ने संभावित बड़े प्रकोप की स्थिति से निपटने की योजना बनानी शुरू कर दी थी। अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच स्पार्टनबर्ग काउंटी और साउथ कैरोलिना के अपस्टेट इलाके में कुल 997 मामले सामने आए, जिसने इस अग्रिम तैयारी की अहमियत को साबित कर दिया।
नवजात शिशु खसरे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि आमतौर पर बच्चों को एमएमआर टीके की पहली खुराक 12 महीने की उम्र पूरी होने पर ही दी जाती है। नवजात बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए प्रिज्मा हेल्थ ने एक खास नियम बनाया। नवजात शिशुओं के माता-पिता से कहा गया कि वे क्लीनिक पहुंचने पर पहले फोन करें और आम वेटिंग रूम में बैठने के बजाय एक अलग प्रवेश द्वार से सीधे डॉक्टर के कमरे में आएं। इसके अलावा कैंसर या कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों और गर्भवती महिलाओं में भी खसरे से गंभीर समस्याएं होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है। ऐसे संवेदनशील मरीजों को सुरक्षित रखने के लिए डॉक्टरों के दफ्तरों में फोन पर अपॉइंटमेंट लेते समय और क्लीनिक पहुंचने पर व्यक्तिगत रूप से खसरे के लक्षणों की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई।
अस्पताल के कमरों का तकनीकी रूपांतरण और वेंटिलेशन प्रणाली
प्रिज्मा हेल्थ के ग्रीनविले मेमोरियल अस्पताल ने प्रकोप के दौरान करीब 400 संभावित मरीजों की जांच की और 13 गंभीर मरीजों को भर्ती कर उपचार दिया। लेकिन अस्पताल में नेगेटिव प्रेशर वाले कमरों की भारी कमी पड़ गई। इस संकट से पार पाने के लिए इंजीनियरिंग टीम ने सामान्य कमरों को ही आइसोलेशन वार्ड में तब्दील करने का बीड़ा उठाया। इसके तहत कमरों में पोर्टेबल एयर स्क्रबर और उच्च क्षमता वाले हेपा फिल्टर लगाए गए।
इंजीनियरिंग विभाग ने पूरे अस्पताल के वेंटिलेशन सिस्टम का विस्तृत ऑडिट किया और हवा के बहाव को मापा। यह सुनिश्चित किया गया कि खसरा मरीजों को ऐसे कमरों में रखा जाए जिनकी एयर-हैंडलिंग यूनिट सामान्य मरीजों वाले कमरों से बिल्कुल अलग हो। साधारण क्लीनिकों और डॉक्टरों के केबिन में जहां नेगेटिव प्रेशर की सुविधा नहीं होती, वहां खसरे का एक संदिग्ध मरीज आना भी पूरी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देता है। खसरे का वायरस संक्रमित व्यक्ति के कमरे से चले जाने के बाद भी पूरे दो घंटे तक हवा में सक्रिय रह सकता है। इस वजह से किसी संदिग्ध मरीज के जाने के बाद उस कमरे को कम से कम दो घंटे तक पूरी तरह खाली और बंद रखना पड़ता था, जिससे अन्य मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था।
टेलीमेडिसिन का सहारा और नवजात आईसीयू के कड़े नियम
साउथ कैरोलिना में संक्रमण जब चरम पर था, तब अस्पतालों पर दबाव घटाने के लिए बड़े पैमाने पर टेलीमेडिसिन का सहारा लिया गया। जिन मरीजों में संक्रमण हल्का था, उन्हें अस्पताल आने से रोका गया। कई बाल रोग विशेषज्ञ दिन में दो-दो बार वीडियो कॉल के जरिए मरीजों की सेहत का हाल लेते थे ताकि यह तय किया जा सके कि उन्हें घर पर ही ठीक किया जा सकता है या अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता है। यह पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य कर्मियों और मरीजों दोनों के लिए काफी थका देने वाली रही।
संक्रमण के बढ़ते खतरे ने अस्पताल के सबसे संवेदनशील हिस्सों में भी नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। पेंसिल्वेनिया के डैनविले स्थित गीसिंगर मेडिकल सेंटर में अगस्त के महीने में एक आगंतुक के कारण खसरे के संभावित प्रसार का खतरा पैदा हो गया था। इसके तुरंत बाद अस्पताल ने अपने नवजात गहन चिकित्सा इकाई यानी एनआईसीयू में जाने के नियमों को सख्त कर दिया। अब एनआईसीयू में केवल बच्चे के माता-पिता या कानूनी अभिभावकों को ही प्रवेश की अनुमति है, वह भी तब जब उनमें खसरे का कोई लक्षण न हो। इस सुविधा केंद्र में प्रवेश द्वार पर ही माता-पिता की जांच की जा रही है और सितंबर की शुरुआत में इन कड़े नियमों को बच्चों के पूरे अस्पताल में अनिवार्य कर दिया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस संक्रामक लहर को रोकने के लिए चिकित्सा संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है।



















