इंटरनेट और टेलीकॉम नेटवर्क के जरिए लोगों की गाढ़ी कमाई लूटने वाले साइबर अपराधियों से निपटने के लिए अब सुरक्षा एजेंसियां और शोधकर्ता एक अनोखी रणनीति पर काम कर रहे हैं। जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की तकनीक का इस्तेमाल जालसाज लोगों को फंसाने के लिए कर रहे हैं, उसी तकनीक को अब उनके खिलाफ एक मजबूत ढाल के रूप में तैनात किया जा रहा है। दुनिया भर में जांच एजेंसियां सीमाओं के पार बैठे ठगों को पकड़ने में कानूनी और भौगोलिक बाधाओं का सामना करती रही हैं। इसी मुश्किल का तोड़ निकालने के लिए अब ऐसे स्वायत्त बॉट्स विकसित किए गए हैं जो साइबर अपराधियों को फोन और मैसेज पर घंटों उलझाए रखते हैं, ताकि उनका समय और संसाधन पूरी तरह बर्बाद हो जाएं।
फर्जी पीड़ितों की फौज और ठगों का खाली होता समय
धोखाधड़ी के नेटवर्क को भीतर से कमजोर करने के मकसद से ऑस्ट्रेलियाई कंपनी अपाटे ने बीते दो वर्षों में एक खास तकनीक तैयार की है। ग्रीक पौराणिक कथाओं में धोखे की देवी के नाम पर बनी इस कंपनी ने फोन पर आने वाले संदिग्ध कॉल्स को सीधे अपने बुद्धिमान बॉट्स पर डाइवर्ट करने का तंत्र विकसित किया है। इन बॉट्स को इस तरह प्रशिक्षित किया गया है कि वे कभी ठगी के जाल में नहीं फंसते, लेकिन बातचीत को जितना संभव हो उतना लंबा खींचते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद जालसाजों के मन में यह उम्मीद जगाए रखना है कि सामने वाला व्यक्ति उनकी बातों में आ रहा है, जबकि पर्दे के पीछे यह प्रणाली उनके तौर-तरीकों की खुफिया जानकारी एकत्र करती रहती है।
अपाटे के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डाली काफ़र ने इस प्रणाली की उपयोगिता को स्पष्ट करते हुए कहा है,
"What we really like to think is that we’re building the perfect victims for scammers."उनके अनुसार, जब कोई जालसाज किसी बॉट के साथ बातचीत में एक मिनट भी खर्च करता है, तो उस दौरान सैकड़ों या शायद हजारों निर्दोष लोगों को ठगी के कॉल्स से बचाया जा सकता है, क्योंकि जालसाज तेजी से नंबर मिलाने वाले स्वचालित डायलिंग टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।
साढ़े तीन लाख बॉट्स और खुफिया आंकड़ों का विशाल भंडार
टेलीकॉम कंपनियों के सहयोग और बैंकों के समर्थन से चलने वाले इस सिस्टम में लगभग 3,50,000 बॉट्स सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह डिजिटल फौज केवल संदिग्ध फोन कॉल्स का जवाब देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंटरनेट पर चल रहे धोखाधड़ी वाले चैट ग्रुप्स में भी घुसपैठ करती है और टेक्स्ट मैसेज के जवाब देती है। इस तकनीक के जरिए जालसाजों के बारे में वास्तविक समय में 2,50,000 से अधिक महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई जा चुकी हैं। इनमें फर्जी वेबसाइटों के लिंक, पैसे इधर-उधर करने वाले म्यूल अकाउंट्स और संदिग्ध बैंक खातों का विस्तृत विवरण शामिल है।
इन बॉट्स को इंसानी व्यवहार के बेहद करीब रखने के लिए अलग-अलग व्यक्तित्व, भाषाई कौशल और सामाजिक प्रोफाइल दिए गए हैं। डाली काफ़र बताते हैं कि वास्तविक इंसानों की तरह ही कुछ बॉट्स के व्हाट्सएप खाते होते हैं और कुछ के नहीं। कई बार बॉट्स तुरंत फोन उठाते हैं, तो कभी वे यह कहकर कॉल काट देते हैं कि वे थोड़ी देर बाद बात करेंगे। यह स्वाभाविकता ही जालसाजों को यह भांपने से रोकती है कि वे किसी सॉफ्टवेयर से बात कर रहे हैं।
घंटों चलने वाली बातचीत और मनोवैज्ञानिक उलझन
जब इन बॉट्स की क्षमता का परीक्षण किया गया, तो यह सामने आया कि वे थोड़ी शंका जताते हुए भी जालसाज को आगे बात करने का मौका देते हैं। यही स्वभाव जालसाज को कॉल पर टिके रहने के लिए प्रेरित करता है और उनके सब्र की परीक्षा लेता है। ठगी करने वाले अक्सर सतर्क ग्राहकों से निपटने के आदी होते हैं, इसलिए उन्हें यह व्यवहार बिल्कुल स्वाभाविक लगता है। इसी वजह से अपाटे के बॉट्स के साथ आने वाली कई कॉल्स नियमित रूप से दो घंटे से भी अधिक समय तक चलती रहती हैं।
क्रिप्टोकरेंसी में निवेश का लालच देकर जब छह मिनट तक एक बॉट को राजी करने की कोशिश की गई, तो उसने अत्यधिक आकर्षक रिटर्न के वादों के बावजूद कोई रकम निवेश नहीं की। बॉट की प्रतिक्रिया का समय और बातचीत का प्रवाह इतना सटीक था कि दो लोग मिलकर भी उसे अपने जाल में फंसाने में पूरी तरह नाकाम रहे। यह दर्शाता है कि यह तकनीक सामान्य धोखाधड़ी के तर्कों को कितनी आसानी से निष्प्रभावी कर देती है।
वैश्विक गिरोहों की चुनौती और डिजिटल हनीपॉट की भूमिका
यद्यपि लाखों बॉट्स दिन-रात सक्रिय हैं, फिर भी आम नागरिकों के फोन पर आने वाले संदिग्ध कॉल्स और संदेशों की समस्या तुरंत खत्म नहीं होने वाली। संगठित साइबर गिरोह हर साल अरबों की संख्या में संदेश भेजते हैं और विशाल कॉल सेंटर संचालित करते हैं। वर्षों से व्यक्तिगत स्तर पर ठगों को उलझाने वाले लोगों और सुरक्षा एजेंसियों के प्रयासों के बावजूद इस अवैध कारोबार का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इसे पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए पुलिस, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, बैंकों और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के बीच रियल-टाइम खुफिया सूचनाओं का साझा होना अत्यंत जरूरी है।
साइबर अपराधियों के खिलाफ इसी तरह का एक और मनोवैज्ञानिक तरीका डिजिटल हनीपॉट के रूप में अपनाया जा रहा है। वर्षों से सुरक्षा शोधकर्ता फर्जी वर्चुअल मशीनें स्थापित करते रहे हैं ताकि हैकर्स को भटकाकर उनके गुप्त तकनीकों का अध्ययन किया जा सके। ईटीएच ज्यूरिख के कंप्यूटर विज्ञान विभाग में डॉक्टरेट शोधकर्ता मार्क वेरो बताते हैं कि ओपन सोर्स हनीपॉट में अब लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को जोड़ा जा रहा है ताकि वे पूरी तरह असली सिस्टम जैसे दिखें।
हालिया शोध में मार्क वेरो और उनके साथियों ने पाया कि आधुनिक लैंग्वेज मॉडल से संचालित हनीपॉट स्वचालित हमलावरों को पुराने सिस्टम्स की तुलना में काफी ज्यादा समय तक रोके रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक एआई एजेंट्स इन नए हनीपॉट्स को आसानी से पहचान नहीं पाते और भ्रमित बने रहते हैं। रक्षात्मक प्रणालियों को मजबूत बनाने और हमलावरों के संसाधनों को बेकार करने के लिए यह तरीका बेहद असरदार साबित हो रहा है।



















