अंतरंग पलों के दौरान शरीर के संवेदनशील अंगों का स्पर्श आमतौर पर सुखद अहसास देने वाला माना जाता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह अनुभव बेहद असहज और भावनात्मक रूप से तनावपूर्ण साबित हो सकता है। जब शरीर के कुछ खास हिस्सों को उत्तेजित करने पर आनंद की जगह अचानक भारी उदासी, डर या खालीपन घेर ले, तो यह स्थिति किसी को भी हैरान कर सकती है। इंटरनेट सर्च ट्रेंड्स में निप्पल उत्तेजना से जुड़े विषयों में 79 प्रतिशत तक का भारी उछाल देखने को मिला था, जहां कई लोगों ने इसे तुरंत उत्तेजना जगाने वाला या दुनिया का सबसे बेहतरीन अहसास बताया। इसके विपरीत, एक ऐसी भी सच्चाई है जिस पर खुलकर बात नहीं होती। एक खास स्थिति के चलते यही स्पर्श कई लोगों के लिए गहरा भावनात्मक दर्द या घबराहट लेकर आता है।
इस स्थिति को बोलचाल में सैड निप्पल सिंड्रोम (SNS) कहा जाता है। यह कोई औपचारिक चिकित्सीय बीमारी या मान्यता प्राप्त विकार नहीं है, बल्कि एक अनौपचारिक नाम है जो निप्पल को छूने या उत्तेजित करने पर अचानक पैदा होने वाले नकारात्मक भावों को दर्शाता है। यह स्थिति महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी प्रभावित कर सकती है। इस अनुभव के दौरान शारीरिक सुख की जगह व्यक्ति को एकदम से गहरा अवसाद, तेज बेचैनी, पुराना खोया हुआ सा अहसास या अचानक घर की याद जैसा खालीपन महसूस होने लगता है।
सेकंडों में उभरती और गायब होती है बेचैनी
द फीमेल हेल्थ डॉक्टर क्लिनिक की संस्थापक और विमेंस हेल्थ जनरल प्रैक्टिशनर (GP) डॉ. निक्की रैम्सकिल के मुताबिक, इस सिंड्रोम की सबसे अनोखी बात इसकी टाइमिंग है। सामान्य मूड डिसऑर्डर के विपरीत, जहां उदासी लंबे समय तक बनी रहती है, इस स्थिति में नकारात्मक भावनाएं लगभग तुरंत उभरती हैं और कुछ ही सेकंड या मिनटों के भीतर वैसे ही गायब हो जाती हैं जैसे ही स्पर्श बंद होता है। व्यक्ति को अच्छी तरह पता होता है कि दुखी होने का कोई व्यावहारिक कारण नहीं है, फिर भी वह अहसास पूरी तरह वास्तविक और असहज करने वाला होता है।
यह केवल शारीरिक अंतरंगता तक ही सीमित नहीं रहता। कई बार रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियां भी इसे ट्रिगर कर सकती हैं। जैसे नहाते समय पानी की धार का पड़ना, तौलिए से बदन पोंछना या फिर कपड़ों का शरीर से हल्का सा रगड़ खाना भी अचानक वही मनहूसियत या बेचैनी पैदा कर देता है। कई लोग बचपन या किशोरावस्था से ही इस समस्या से जूझते हैं, लेकिन झिझक के चलते कभी किसी से इसका जिक्र नहीं कर पाते।
व्यक्तिगत अनुभवों में कैसा लगता है यह अहसास
इस अहसास को शब्दों में बयां करना अक्सर लोगों के लिए मुश्किल होता है। 33 वर्षीय बेथ ने साझा किया कि वह बचपन से ही इस विचित्र अहसास से गुजर रही हैं, लेकिन कभी इसे किसी से कहने लायक नहीं समझा। उनके अनुसार, यह भावना बिल्कुल वैसी लगती है मानो कोई महिला जंग से अपने पति के लौटने का विलाप भरा इंतजार कर रही हो। कभी-कभी यह ऐसा लगता है जैसे अचानक याद आया हो कि कोई बहुत बड़ा जरूरी काम छूट गया है और अब उसका भयानक अंजाम भुगतना पड़ेगा। यह बिजली की कौंध की तरह कुछ पलों के लिए आता है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी में तो रुकावट नहीं आती, लेकिन शारीरिक अंतरंगता के दौरान यह पूरे मूड को एक झटके में खराब कर देता है।
वहीं 36 वर्षीय मेल का अनुभव अलग किस्म की घबराहट से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि निप्पल छुए जाते ही उन्हें तत्काल तेज नर्वसनेस और आने वाले किसी बड़े संकट का खौफ महसूस होने लगता है। उनके पार्टनर के लिए भी यह स्थिति कई बार असमंजस पैदा कर देती है। हालांकि, राहत की बात यह रहती है कि जैसे ही वह स्पर्श रोकने को कहती हैं, अनहोनी का यह डर उतनी ही तेजी से गायब हो जाता है जितनी तेजी से आया था।
सेक्स लाइफ और रिश्तों पर पड़ता है सीधा असर
सैड निप्पल सिंड्रोम का असर कपल्स की इंटीमेट लाइफ पर काफी गंभीर हो सकता है। जब भी अंतरंग पलों में स्पर्श से घबराहट या निराशा पैदा होती है, तो व्यक्ति धीरे-धीरे शारीरिक निकटता से ही कतराने लगता है। उसे हर बार सेक्सुअल गतिविधि के दौरान चिंता घेरने लगती है कि कहीं वही अहसास दोबारा न लौट आए।
दूसरी तरफ, पार्टनर इस व्यवहार का गलत मतलब निकाल सकते हैं। उन्हें लग सकता है कि सामने वाला उन्हें नकार रहा है या उनसे कोई गलती हो गई है, जिससे रिश्ते में बेवजह की गलतफहमियां पनपने लगती हैं। ऐसे में खुलकर बातचीत करना बेहद जरूरी हो जाता है। डॉ. रैम्सकिल की सलाह है कि अपने पार्टनर को साफ शब्दों में समझाएं कि उस स्पर्श से शरीर में कैसी भावनाएं ट्रिगर होती हैं। इंटीमेसी के दौरान अपनी सीमाएं तय करें और नजदीकी के अन्य तरीके तलाशें जो दोनों के लिए सुखद हों। सेक्शुअल प्लेजर पूरी तरह व्यक्तिगत मामला है और एक संतुष्ट इंटीमेट लाइफ के लिए निप्पल उत्तेजना का शामिल होना कतई अनिवार्य नहीं है।
पहचान की कमी और वैज्ञानिक शोध की स्थिति
इस सिंड्रोम के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह कोई औपचारिक मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है। इसके कारणों, व्यापकता या असरदार इलाज को लेकर बड़े पैमाने पर कोई पुख्ता वैज्ञानिक रिसर्च मौजूद नहीं है। हालांकि, कुछ मामलों में इसकी समानता डिस्फोरिक मिल्क इजेक्शन रिफ्लेक्स (D-MER) से देखी जाती है, जिसमें स्तनपान कराने वाली माताओं को दूध उतरने के दौरान अचानक तीव्र नकारात्मक भावनाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि दोनों एक ही स्थिति हों ऐसा जरूरी नहीं है और दोनों की जैविक कार्यप्रणाली समान होने का दावा नहीं किया जा सकता।
सैड निप्पल सिंड्रोम केवल स्तनपान कराने वाली महिलाओं तक सीमित नहीं है। यह पुरुषों में भी देखा जाता है और उन लोगों में भी जो सेक्शुअली एक्टिव नहीं हैं। समस्या यह है कि अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनके इस अनुभव का कोई नाम भी है, जिसके चलते वे खुद को अकेला और अजीब मानकर शर्मिंदगी में चुप रह जाते हैं।
क्या हैं इसके संभावित कारण
पर्याप्त शोध के अभाव में यह स्पष्ट नहीं है कि इस भावना को असल में क्या चीज ट्रिगर करती है। कुछ लोग प्यूबर्टी के समय से ही इसके लक्षण महसूस करते हैं, जबकि अन्य को वयस्क होने पर इसका अहसास होता है। माहवारी, गर्भावस्था या मेनोपॉज के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इस संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं या नहीं, यह भी अभी अज्ञात है।
डॉ. रैम्सकिल स्पष्ट करती हैं कि इस सिंड्रोम का अनुभव होने का यह कतई मतलब नहीं है कि व्यक्ति को कोई हार्मोनल असंतुलन, मनोवैज्ञानिक बीमारी या किसी पुराने ट्रॉमा का इतिहास है। हमारे समाज में निप्पल्स को लेकर एक गैर-जरूरी शर्मिंदगी जुड़ी हुई है। उन्हें अक्सर केवल कामुकता या स्तनपान के नजरिए से देखा जाता है, जबकि हकीकत में वे शरीर का एक सामान्य अंग हैं जिनमें जटिल तंत्रिका नेटवर्क और संवेदी प्रतिक्रियाएं मौजूद होती हैं। महिलाओं पर अक्सर यह सामाजिक दबाव रहता है कि हर तरह का स्पर्श उनके लिए सुखद ही होना चाहिए। ऐसे में जब अनुभव इसके उलट होता है, तो वे हीनभावना का शिकार होने लगती हैं। जरूरत इस बात की है कि लोग बिना किसी झिझक या डर के अपने शरीर के इन अनुभवों पर खुलकर बात कर सकें।



















