घर में अगर कोई बच्चा साफ बोल नहीं पाता, तुतलाता है या बोलने में अटकता है, तो माता-पिता की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे बच्चों के लिए लोग अक्सर तरह-तरह के उपाय तलाशते हैं। हमारे शास्त्रों में भी इसके लिए एक खास नुस्खा बताया गया है, जिसकी धार्मिक मान्यता बहुत पुरानी है। कहा जाता है कि शंख में रखा हुआ पानी बच्चों को पिलाने से उनकी वाणी में सुधार आता है और धीरे-धीरे उनकी बोलने की क्षमता बेहतर होने लगती है।
शंख को क्यों कहते हैं माता लक्ष्मी का भाई
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि शंख का सीधा नाता समुद्र मंथन से है। जिस समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं, उसी मंथन से शंख भी निकला था। यही वजह है कि शंख को माता लक्ष्मी का भाई कहा जाता है। उनके मुताबिक, शंख के भीतर कई औषधीय गुण मौजूद होते हैं। शास्त्रों में जिक्र मिलता है कि अगर किसी बच्चे की आवाज साफ नहीं है, वह तुतलाता है या बहुत कम बोलता है, तो शंख में रखा जल पिलाने से उसे फायदा मिल सकता है।
तुतलाहट दूर करने का तरीका
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य इस उपाय का तरीका भी बताते हैं। उनके अनुसार शंख को सीधा खड़ा करके उसके छेद में साफ पानी भर देना चाहिए। इस पानी को करीब 12 घंटे तक शंख के अंदर ही रहने देना है और ऊपर से ढककर रखना है। अगली सुबह उसी पानी को गिलास में निकालकर बच्चे को पिलाना चाहिए।
उनका कहना है कि रोजाना ऐसा करने से बच्चे की तुतलाहट कम होने लगती है और उसकी आवाज पहले से ज्यादा साफ होने लगती है। शास्त्रों में इस उपाय को खास महत्व दिया गया है।
धार्मिक नजरिए से भी बेहद अहम है शंख
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के मुताबिक शंख सिर्फ सेहत से जुड़ी मान्यताओं तक सीमित नहीं है, धार्मिक दृष्टि से भी इसका बड़ा महत्व है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा में शंख का खास स्थान है। आरती के वक्त शंख बजाने से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और चारों ओर सकारात्मकता फैलती है। खासतौर पर दक्षिणावर्ती शंख को बहुत शुभ माना गया है, और इसी के जरिए शालिग्राम भगवान की पूजा करने का विधान बताया गया है।
शंख को लेकर एक और दिलचस्प मान्यता भी प्रचलित है। शंख को चेतन यानी जीवंत माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अगर शंख को बड़ी मात्रा में चावल के नीचे दबा दिया जाए, तो कुछ समय बाद वह खुद ऊपर की ओर आ जाता है। इसे शंख की विशेष शक्ति माना जाता है। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य कहते हैं कि चाहे 50 किलो चावल हो या उससे भी ज्यादा, शंख अपने आप ऊपर आने की क्षमता रखता है।
शिव जी की पूजा में न करें शंख का इस्तेमाल
एक जरूरी बात यह भी है कि शंख का उपयोग भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा में जरूर करना चाहिए, लेकिन शिव जी की पूजा और आरती में शंख नहीं बजाना चाहिए। धार्मिक कथाओं के अनुसार शंखासुर नाम के राक्षस से जुड़ी मान्यताओं के चलते शिव पूजा में शंख बजाने की मनाही है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में शिव पूजा और विष्णु पूजा में शंख के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग नियम तय किए गए हैं।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य द्वारा बताई गई बातों पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती। इसे चिकित्सीय सलाह न मानें और किसी भी समस्या में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।













