इंद्रावती के किनारे बसा आस्था का यह धाम
उत्तराखंड की देवभूमि में सैकड़ों तीर्थस्थल हैं, लेकिन उत्तरकाशी की हरी-भरी वादियों में इंद्रावती नदी के करीब एक पहाड़ी पर स्थित मां कुटेटी देवी मंदिर की बात ही निराली है। यह सिद्धपीठ मां आदिशक्ति को समर्पित है। यहां पहुंचने वाले भक्त बताते हैं कि मंदिर का शांत और दिव्य वातावरण उन्हें एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव देता है। मन को सुकून मिलता है और थकान छू-मंतर हो जाती है।
शंकराचार्य के काल से जुड़ी पुरानी परंपरा
इस मंदिर की उम्र बहुत पुरानी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसकी जड़ें आदि गुरु शंकराचार्य के युग तक जाती हैं। राजस्थान के कोटा राजघराने की अटूट भक्ति भी इस मंदिर के इतिहास का हिस्सा रही है। आज भी यहां नवविवाहित दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना लेकर आते हैं और उनकी मुरादें पूरी होने की कहानियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती हैं।
खोया हुआ बैग और एक राजा की प्रतिज्ञा
मां कुटेटी देवी के उत्तरकाशी में विराजमान होने के पीछे एक बड़ी दिलचस्प कथा है। बात उस दौर की है जब राजस्थान के कोटा के एक महाराजा गंगोत्री की तीर्थयात्रा पर निकले। यात्रा के बीच उनका धन से भरा बैग कहीं गुम हो गया। परेशान महाराजा उत्तरकाशी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे और वहां प्रार्थना की। उन्होंने मन्नत मांगी कि अगर बैग वापस मिल जाए, तो वे अपनी पुत्री का विवाह किसी स्थानीय युवक से करेंगे। देवकृपा से कुछ समय बाद बैग मिल गया और महाराजा ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए राजकुमारी का विवाह एक स्थानीय युवक के साथ संपन्न कराया।
स्वप्न में माता का संदेश बदल गया सब कुछ
राजकुमारी अपने नए घर में खुश थीं, लेकिन एक बात उन्हें अंदर ही अंदर तकलीफ देती थी। उनकी कुलदेवी मां कुटेटी राजस्थान में थीं और वे उनसे सैकड़ों कोस दूर हो गई थीं। राजकुमारी की यह पीड़ा माता को भी स्पर्श कर गई। एक रात माता ने स्वप्न में राजकुमारी को दर्शन दिए और बताया कि वह उनके खेत में मिलेंगी। अगले दिन जब राजकुमारी इंद्रावती नदी के पास अपने खेत में गईं, तो उन्हें वहां तीन पत्थर मिले, ठीक वैसे जैसा माता ने स्वप्न में बताया था। इसे चमत्कार मानकर ग्रामीणों ने उसी स्थान पर मां कुटेटी देवी मंदिर का निर्माण करा दिया।
आज भी उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
उन तीन पत्थरों पर बना वह मंदिर आज उत्तरकाशी क्षेत्र का एक प्रमुख तीर्थस्थल बन चुका है। आसपास की प्राकृतिक सुंदरता, इंद्रावती नदी का कलकल बहता पानी और मंदिर का दिव्य माहौल मिलकर एक ऐसा अनुभव बनाते हैं जो भक्त के मन पर लंबे समय तक छाया रहता है। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूरदराज से आने वाले श्रद्धालु भी यहां मां कुटेटी देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।













