मध्य प्रदेश के सतना जिले की एक छोटी सी बस्ती आज भी आस्था और रहस्य का ऐसा संगम बनी हुई है, जिसके किस्से सुनकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। सतना से करीब 32 किलोमीटर दूर जनार्दनपुर गांव में बसा कंगालदास बाबा धाम वही जगह है, जहां श्रद्धालु आज भी ऐसे चमत्कारों पर पूरी श्रद्धा रखते हैं, जैसे किसी संत के सोते ही उसका सिर और पैर शरीर से अलग होकर हवा में टिक जाना, या तेज बुखार को एक कमंडल या पेड़ पर टंगी गुदड़ी में भेज देना। सुनने में यह किसी तिलिस्म या लोककथा जैसा लगता है, लेकिन बघेलखंड के इस जागृत धाम की मिट्टी में मानो चमत्कारों की गाथाएं रची-बसी हैं।
250 साल पुराने संत, जिनका शरीर नींद में हो जाता था अलग
सतना का यह छोटा सा गांव जनार्दनपुर अगर देश-दुनिया में कहीं पहचाना जाता है, तो उसकी एकमात्र वजह यहां जन्मे संत कंगालदास बाबा हैं। स्थानीय लोग और श्रद्धालु मानते हैं कि बाबा कोई सामान्य संत नहीं थे, उनके पास अद्भुत यौगिक शक्तियां थीं। धाम के स्थानीय पुजारी रामप्रसाद शुक्ला बताते हैं कि बाबा कंगालदास आज से करीब 250 साल पहले इसी इलाके में रहा करते थे। उनके समय की सबसे चौंका देने वाली बात यह थी कि जब बाबा आराम करते या सोते, तो उनके शरीर के हिस्से, यानी सिर और पैर धड़ से अलग होकर अलग-अलग विश्राम करते दिखाई देते थे। इस अलौकिक दृश्य को जिसने भी देखा, वह बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गया। आज भी बाबा की समाधि के दर्शन के लिए दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
जब राजा के सामने बुखार को कमंडल में उतार दिया
बाबा कंगालदास के चमत्कारों की सूची बहुत लंबी है। रीवा से यहां भंडारा कराने पहुंचे श्रद्धालु राकेश तिवारी एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं। बात उस समय की है, जब रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह माधवगढ़ जा रहे थे। उन्होंने सोचा कि रास्ते में जनार्दनपुर रुककर बाबा कंगालदास के दर्शन कर लिए जाएं। राजा जब बाबा के आवास पर पहुंचे, तब बाबा तेज बुखार से, या तब की भाषा में कहें तो ज्वर से पीड़ित थे और कमजोरी के कारण खड़े होने तक की स्थिति में नहीं थे। फिर भी राजा का मान रखने के लिए बाबा ने एक अनोखा कौतुक किया। उन्होंने अपने पास रखे कमंडल से कहा कि कुछ देर के लिए यह बुखार तुम अपने भीतर समा लो, ताकि मैं महाराज से मिल सकूं। देखते ही देखते वह कमंडल अपने आप कांपने लगा और बाबा का बुखार गायब हो गया। राजा से मुलाकात कर उन्हें आशीर्वाद देने के बाद जब बाबा लौटे, तो वही बुखार कमंडल से निकलकर दोबारा बाबा के शरीर में आ गया। इसी किस्से में थोड़ा फेरबदल करते हुए स्थानीय पुजारी बताते हैं कि बाबा ने अपना बुखार कमंडल में नहीं, बल्कि पास के एक पेड़ पर लटकी अपनी गुदड़ी में भेज दिया था। तरीका जो भी रहा हो, यह बाबा की परम शक्ति का प्रमाण माना जाता है।
टमस नदी पर बना अदृश्य पुल और राजा की बची जान
स्थानीय पुजारी रामप्रसाद शुक्ला बाबा के एक और हैरतअंगेज चमत्कार का जिक्र करते हैं, जो गोराईया के राजा से जुड़ा है। एक बार गोराईया के राजा रीवा दरबार से अपने राज्य लौट रहे थे। रात बहुत घनी हो चुकी थी और रास्ते में पड़ने वाली टमस नदी उफान पर थी। तेज बहाव के कारण नदी पार करना नामुमकिन था और राजा बीच रास्ते में फंस गए। संकट की इस घड़ी में राजा ने बाबा कंगालदास को याद किया और उनसे मदद मांगी। कहते हैं कि बाबा ने अपनी शक्तियों से टमस नदी के पानी से ठीक थोड़ा ऊपर एक अदृश्य पुल बना दिया। इसी पुल की मदद से राजा और उनके सैनिक घोड़ों समेत पानी के ऊपर पैदल चलकर सुरक्षित गोराईया पहुंच गए।
राजा रघुराज प्रताप सिंह के रूप में पुनर्जन्म की कहानी
बघेलखंड के इतिहास और लोक-संस्कृति में बाबा कंगालदास से जुड़ी एक और अमर कहानी प्रचलित है। कहा जाता है कि रीवा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की कोई संतान नहीं थी, जिसको लेकर वह बेहद चिंतित रहते थे। जब वह बाबा की शरण में पहुंचे, तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह स्वयं उनकी संतान बनकर उनके घर जन्म लेंगे। इसके बाद राजा के घर एक प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम राजा रघुराज प्रताप सिंह पड़ा। इस घटना को लेकर आज भी पूरे बघेलखंड में एक कहावत गूंजती है:
एंड बंड हम चलताए रहबय सुन ले भूंजा भाई और विश्वनाथ घर पैदा होवेय, खाबाय दूध मलाई।
पुनर्जन्म का यह किस्सा रीवा राजघराने की भरतमाल नामक पुस्तक में भी दर्ज मिलता है।
गुरु-शिष्य की अटूट जोड़ी और मन्नतों का धाम
कंगालदास बाबा धाम की एक और बड़ी खासियत यह है कि यहां बाबा अकेले नहीं हैं। बाबा की समाधि के ठीक बगल में उनके परम प्रिय शिष्य खरगूदास जी की भी समाधि बनी हुई है। बताया जाता है कि जब बाबा कंगालदास ने जीवित समाधि लेने का निर्णय किया, तो गुरुभक्ति में डूबे शिष्य खरगूदास ने भी उनके साथ ही जीवित समाधि ले ली। गुरु और शिष्य की यह अटूट जोड़ी आज भी इस धाम में पूजी जाती है। यहां की मान्यता ऐसी है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। लोग अपनी बीमारियां ठीक कराने, अदालती मामलों से छुटकारा पाने और संतान प्राप्ति की मन्नतें लेकर यहां आते हैं। जब मन्नत पूरी हो जाती है, तो श्रद्धालु यहां पहुंचकर भव्य भंडारे का आयोजन करते हैं।













