पवित्र श्रावण मास के प्रारंभ होते ही देशभर के शिवालयों में हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नगर में स्थित ऐतिहासिक पांडेश्वर नाथ मंदिर में इन दिनों श्रद्धालुओं का भारी तांता लगा हुआ है। धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद समृद्ध इस नगर को श्रद्धालु मिनी काशी के नाम से भी पुकारते हैं। पांडेश्वर नाथ मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण और धार्मिक महत्व यह है कि यहां भगवान शिव के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के पावन स्वरूप एक ही विस्तृत प्रांगण में स्थापित किए गए हैं। देश के अलग-अलग कोनों में स्थित इन पवित्र धामों की यात्रा एक साथ कर पाना हर किसी के लिए सुलभ नहीं होता, ऐसे में यहां आने वाले भक्तों को एक ही परिसर की परिक्रमा करने पर सभी प्रमुख ज्योतिर्लिंगों की पूजा और दर्शन का फल प्राप्त होता है।
मंदिर के मुख्य पुजारी उमेश शर्मा ने बताया कि पांडेश्वर नाथ मंदिर की इस पावन भूमि पर द्वादश ज्योतिर्लिंगों के महात्म्य और उनकी पौराणिक कथाओं को बहुत ही श्रद्धाभाव के साथ संजोया गया है। इस धाम में सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वरम और घुश्मेश्वर के पावन स्वरूपों की विधिवत प्रतिष्ठा की गई है। सावन के महीने में यहां प्रतिदिन भोर से ही जलाभिषेक और विशेष अनुष्ठानों का क्रम शुरू हो जाता है, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दराज के जिलों और राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
सोमनाथ और मल्लिकार्जुन के पावन स्वरूप
पांडेश्वर नाथ मंदिर के विशाल प्रांगण में स्थापित ज्योतिर्लिंगों की श्रृंखला में सबसे पहला स्थान गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ महादेव का है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रजापति दक्ष के श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने इसी पावन स्थल पर भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने हेतु घोर तपस्या की थी। चंद्रदेव की कठोर भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी वहां साक्षात ज्योति रूप में प्रकट हुए और उन्हें रोगमुक्त किया। चंद्रमा का एक प्रसिद्ध नाम सोम भी है, इसलिए इस पहले ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ के नाम से ख्याति मिली।
प्रांगण में दूसरा स्वरूप मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का स्थापित किया गया है। मूल रूप से यह पावन धाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के मनोरम तट पर श्रीशैल पर्वत पर स्थित है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मल्लिकार्जुन अकेला ऐसा दुर्लभ ज्योतिर्लिंग है जहां माता पार्वती देवी मल्लिका के रूप में और देवाधिदेव महादेव अर्जुन के रूप में एक साथ ज्योति स्वरूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि इस पावन विग्रह के श्रद्धापूर्वक दर्शन मात्र से मनुष्य को प्राचीन अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है और उसके जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।
महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर की अलौकिक महिमा
तीसरे ज्योतिर्लिंग के रूप में मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में क्षिप्रा तट पर स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का विग्रह यहां प्रतिष्ठित है। महाकाल के सानिध्य में ही प्रसिद्ध शक्तिपीठ हरसिद्धि देवी का मंदिर भी विद्यमान है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ही एकमात्र ऐसे ज्योतिर्लिंग हैं जो दक्षिणमुखी हैं, जिन्हें काल और मृत्यु का स्वामी माना जाता है। उज्जैन में तड़के होने वाली प्रसिद्ध भस्म आरती के दर्शन के लिए दुनिया भर से लोग पहुंचते हैं। ऐसी लोकमान्यता है कि महाकालेश्वर के दर्शन करने से साधक के मन से हर प्रकार का अनजाना भय और अकाल मृत्यु का संकट सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
चौथे क्रम पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का पावन स्वरूप विराजित है। मूल तीर्थ मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर पुण्यसलिला नर्मदा नदी के मध्य स्थित एक ऊंचे पर्वत द्वीप पर बसा है। नर्मदा नदी के दोनों धाराओं में बंटकर बहने के कारण यह पूरा पहाड़ी क्षेत्र विहंगम ऊंचाई से देखने पर ॐ की पवित्र आकृति के समान प्रतीत होता है। प्रणव स्वरूप में विद्यमान होने के कारण ही इस तीर्थ स्थल को ओंकारेश्वर के नाम से पूजा जाता है, जिसका दर्शन पांडेश्वर नाथ धाम में आने वाले हर शिवभक्त को आत्मिक शांति प्रदान करता है।
केदारनाथ और भीमाशंकर के स्वरूपों का दर्शन
पांचवें ज्योतिर्लिंग के रूप में उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में स्थित श्री केदारनाथ धाम का स्वरूप यहां स्थापित है। केदारनाथ धाम सनातन परंपरा के चार प्रमुख धामों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जो रुद्रप्रयाग जिले में गौरीकुंड से लगभग 16 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पर स्थित है। अत्यधिक ऊंचाई और हिमालयी वातावरण के कारण शीत ऋतु में वहां भारी बर्फबारी होती है, जिसके चलते सर्दियों के छह महीनों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। महाभारत कालीन कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति देने के लिए भगवान शिव ने यहां बैल यानी नंदी के रूप में दर्शन दिए थे। वर्तमान ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण आठवीं और नौवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा करवाया गया था।
छठे स्थान पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का विग्रह मौजूद है, जिसका मूल स्थान महाराष्ट्र के पुणे जिले में सह्याद्रि की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है। स्थानीय परंपरा में भीमाशंकर महादेव को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। त्रेतायुग से जुड़ी कथा के अनुसार, रावण के अनुज कुंभकर्ण का एक पुत्र भीम नामक असुर था। जब भगवान श्रीराम ने लंका युद्ध में रावण और कुंभकर्ण का संहार किया, तो भीम ने श्रीहरि विष्णु और श्रीराम से प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी से असीम शक्तियां प्राप्त कर उस दैत्य ने देवताओं पर अत्याचार शुरू कर दिए थे, जिसके बाद भगवान शिव ने प्रकट होकर उसका वध किया और वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थिर हुए।
काशी विश्वनाथ और त्र्यंबकेश्वर की दिव्यता
सातवें ज्योतिर्लिंग के रूप में उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर वाराणसी यानी काशी में स्थित बाबा काशी विश्वनाथ का पावन स्वरूप इस मंदिर प्रांगण की शोभा बढ़ा रहा है। काशी को भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में मोक्षदायिनी नगरी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर में देवाधिदेव महादेव के साथ साक्षात माता पार्वती अन्नपूर्णा रूप में निवास करती हैं। देवर्षि नारद समेत समस्त देवी-देवता नियमित रूप से इस क्षेत्र में शिव आराधना के लिए आते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी क्षेत्र में देहत्याग करने वाले हर प्राणी को भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं।
आठवें क्रम पर महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन होता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर के ठीक निकट पवित्र ब्रह्मगिरि पर्वत स्थित है, जहां से दक्षिण भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली पुण्य गोदावरी नदी का उद्गम होता है। इस ज्योतिर्लिंग की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसके छोटे से गर्त में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों के तीन छोटे-छोटे लिंग स्वरूप एक साथ विद्यमान हैं। पौराणिक इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में महर्षि गौतम ने इस क्षेत्र में दीर्घकाल तक कठोर तप करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। ऋषि की प्रार्थना पर भगवान शिव ने वहां गोदावरी को अवतरित कराया और स्वयं ज्योति स्वरूप में स्थापित हो गए।
वैद्यनाथ धाम और अन्य ज्योतिर्लिंगों की उपस्थिति
नौवें क्रम पर वैद्यनाथ धाम का स्वरूप स्थापित है। त्रेतायुग की पौराणिक कथा के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव का अनन्य उपासक था। रावण ने हिमालय में कठोर तपस्या की और अपने शीश काटकर शिवलिंग पर अर्पित किए थे। रावण की इस अप्रतिम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने साक्षात प्रकट होकर उसके सभी शीश पुनः जोड़ दिए, जिससे उनका एक नाम वैद्यनाथ पड़ा। रावण ने वरदान स्वरूप उस पावन शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति मांगी थी। महादेव ने वरदान देते हुए यह शर्त रखी थी कि मार्ग में इस लिंग को जहां भी भूमि पर रख दिया जाएगा, वह वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा।
पुजारी उमेश शर्मा के अनुसार, पांडेश्वर नाथ परिसर में इन नौ ज्योतिर्लिंगों के साथ-साथ नागेश्वर, रामेश्वरम और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंगों के पावन विग्रह भी विधि-विधान के साथ पूजित हैं। इस प्रकार यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को एक ही यात्रा में संपूर्ण भारत के पावन द्वादश ज्योतिर्लिंगों की सामूहिक आराधना का दुर्लभ अवसर मिलता है। सावन के इस पवित्र कालखंड में बेलपत्र, धतूरा, गंगाजल और दूध से इन सभी स्वरूपों का अभिषेक करने के लिए श्रद्धालुओं की कतारें सुबह से शाम तक लगी रहती हैं।



















