भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी हुई काशी की नगरी पूरी दुनिया से एकदम अलग और अनूठी है। इसी प्राचीन नगरी में नाथों के नाथ बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। काशी में विराजमान बाबा विश्वनाथ देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में खास महत्व रखते हैं। यह पावन मंदिर देश भर के संतों, नागाओं और सनातन धर्मावलंबियों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र माना जाता है। काशी के विश्वनाथ मंदिर से कई ऐसे रहस्य जुड़े हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
श्रीयंत्र और तंत्र साधना का केंद्र
वाराणसी में विराजे काशी विश्वनाथ पूरे संसार के नाथ हैं और उनका यह मंदिर कई मायनों में बेहद खास है। मुख्य मंदिर के शिखर पर श्रीयंत्र मंडित किया गया है, जिसके कारण यह स्थान तंत्र सिद्धियों का भी बहुत बड़ा केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीयंत्र को शक्ति और माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस जगह को अत्यंत चमत्कारिक और ऊर्जावान समझा जाता है।
शिव और शक्ति का अद्वितीय स्वरूप
काशी में विराजे बाबा का यह चमत्कारिक शिवलिंग इकलौता ऐसा शिवलिंग है जिसके एक हिस्से में भगवान शिव और दूसरे हिस्से में देवी शक्ति का वास माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों में इस बात का वर्णन मिलता है कि शिवलिंग के दाहिने तरफ शक्ति स्वरूपा माता पार्वती और बाएं भाग में खुद भगवान शिव विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि केवल इन दुर्लभ दर्शन मात्र से ही इंसान के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
मोक्ष और तारक मंत्र का धाम
काशी में स्थित भगवान शिव का यह शिवलोक हजारों साल पुराना है और महाभारत काल के ग्रंथों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। बाबा विश्वनाथ के इस पवित्र धाम को मोक्ष और मुक्ति की नगरी भी कहा जाता है। यहां प्राण त्यागने वाले मनुष्य को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र देते हैं, जिससे जीव जन्म-मृत्यु के इस अंतहीन चक्र से हमेशा के लिए मुक्त होकर परम मोक्ष को प्राप्त करता है।
चारों द्वारों का रहस्य और शिवलिंग की स्थिति
काशी विश्वनाथ के मुख्य मंदिर में चार विशेष द्वार बने हैं जिन्हें चार अलग-अलग चीजों का प्रतीक माना जाता है। मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इन चारों द्वारों के अलग-अलग नाम हैं जिन्हें शांति, कला, निवृत्ति और प्रतिष्ठा का द्वार कहा जाता है। पूरी दुनिया में केवल गिने-चुने ऐसे स्थान हैं जहां इस प्रकार के चारों द्वार मौजूद हैं, जिसके कारण तंत्र साधना के लिए यह भूमि बेहद सिद्ध मानी जाती है। इसके अलावा एक खास बात यह भी है कि यहां का शिवलिंग गर्भगृह के बिल्कुल बीच में न होकर ईशान कोण में स्थित है, जो विद्या और कला साधना का बड़ा प्रतीक है।
त्रिशूल की नोक पर बसी अविनाशी नगरी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काशी कुल तीन खंडों में बंटी हुई है जिसमें पहला केदार खंड, दूसरा विशेश्वर खंड और तीसरा ओमकलेश्वर खंड शामिल हैं। ये तीनों खंड भगवान शिव के त्रिशूल के तीन सिरों या नोकों के समान हैं। इसमें विशेश्वर खंड यानी काशी विश्वनाथ मंदिर वाला हिस्सा त्रिशूल के ठीक मध्य वाली नोक पर स्थापित माना जाता है। यही वजह है कि इस काशी और बाबा विश्वनाथ की इस पावन नगरी को अविनाशी कहा जाता है, यानी प्रलय के समय भी इस स्थान पर कोई आंच नहीं आती है।



















