सिनेमाघरों में बड़े पर्दे पर रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' की सफलता ने एक बार फिर अध्यात्म की दुनिया में नीम करौली बाबा की पावन स्मृति को जागृत कर दिया है। जब भी इस महान संत का स्मरण किया जाता है, सबसे पहले मन मस्तिष्क में उत्तराखंड के नैनीताल जिले की हसीन पहाड़ियों में स्थित कैंची धाम की तस्वीर उभरती है। कैंची धाम आज देश ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के श्रद्धालुओं के लिए एक महान आध्यात्मिक केंद्र और अटूट श्रद्धा की स्थली बना हुआ है। हालांकि, बाबा की जीवन यात्रा केवल इस पर्वतीय आश्रम तक सीमित नहीं रही। उनके भौतिक जीवन का अंतिम अध्याय श्रीकृष्ण की पावन नगरी वृंदावन में लिखा गया था, जहाँ उन्होंने 11 सितंबर 1973 को इस नश्वर संसार का त्याग करके महासमाधि प्राप्त की थी। यही कारण है कि आज भी लाखों भक्तों के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि कैंची धाम को अपनी मुख्य तपोभूमि बनाने वाले संत ने महासमाधि के लिए वृंदावन को ही क्यों चुना।
कैंची धाम और साधारण जीवन शैली का आध्यात्मिक प्रभाव
उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ियों से घिरा कैंची धाम नीम करौली बाबा की प्राथमिक तपोस्थली और मुख्य आश्रम माना जाता है। बाबा ने इस स्थान पर रहकर साधना, ध्यान और निस्वार्थ जनसेवा का एक ऐसा अद्भुत वातावरण तैयार किया, जिसने देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित किया। बाबा की पहचान हमेशा एक बेहद सरल और आडंबरहीन संत के रूप में रही। वे प्रायः शरीर पर एक साधारण सा कंबल लपेटे रहते थे। इसी सादगी भरे स्वरूप के कारण उनके भक्त उन्हें बड़े प्रेम और श्रद्धा से 'कंबल वाले बाबा' कहकर भी पुकारते थे। बाबा अपनी शिक्षाओं में कभी लंबे चौड़े प्रवचन नहीं देते थे, बल्कि बहुत ही सरल और सहज शब्दों में गूढ़ जीवन दर्शन को समझा दिया करते थे।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति और वैश्विक हस्तियों पर प्रभाव
नीम करौली बाबा के विचारों और जीवन दर्शन की सबसे मुख्य बात प्रेम, दया और सेवा की भावना रही है। उनके आश्रमों का नियम यही रहा कि जो भी व्यक्ति वहाँ आए, उसे निस्वार्थ भाव से आध्यात्मिक शांति और भोजन का प्रसाद प्राप्त हो। समय बीतने के साथ-साथ कैंची धाम की प्रसिद्धि भारत की सीमाओं को पार कर पश्चिमी देशों तक पहुँच गई। विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों के कई बड़े चिंतक और उद्योगपति बाबा की शिक्षाओं से गहराई से प्रभावित हुए। प्रौद्योगिकी जगत की दिग्गज हस्तियों में शामिल एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों का नाम भी बाबा के प्रति अपार श्रद्धा और उनके आश्रम की यात्रा से जोड़ा जाता रहा है।
हनुमान भक्ति और वृंदावन की पावन भूमि का संबंध
नीम करौली बाबा का संपूर्ण जीवन भगवान हनुमान की अनन्य भक्ति और साधना से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में वृंदावन का स्थान अत्यंत पवित्र और विशिष्ट रहा है। भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली के रूप में प्रसिद्ध वृंदावन सदियों से उच्च कोटि के संतों, साधकों और योगियों की ध्यान साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। बाबा का आध्यात्मिक जुड़ाव वृंदावन की इस रज और पावन वातावरण से लंबे समय से चला आ रहा था। इसलिए उनके भक्तों का मानना है कि हनुमान जी के अनन्य भक्त होने के नाते बाबा का इस पवित्र धाम से एक अटूट आत्मिक संबंध था, जो उन्हें अपने अंतिम समय में इस पवित्र नगरी की ओर ले आया।
अंतिम यात्रा और 11 सितंबर 1973 की महासमाधि
वर्ष 1973 के उत्तरार्ध में नीम करौली बाबा का स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ने लगा था। सितंबर महीने की शुरुआत में वे किसी कार्यवश आगरा की ओर गए हुए थे। इसी दौरान अचानक उनकी शारीरिक स्थिति बहुत अधिक खराब हो गई। उनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्हें तुरंत ट्रेन के माध्यम से आगरा से वृंदावन लाया गया। वृंदावन पहुँचने पर उन्हें त्वरित उपचार के लिए रामकृष्ण मिशन अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के भरपूर प्रयासों के बावजूद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका और अंततः 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा ने वृंदावन की पवित्र भूमि पर अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। उनके अनुयायी और भक्त इस घटना को एक सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि एक दिव्य 'महासमाधि' के रूप में याद करते हैं। इसी पावन स्थल पर उनकी मुख्य समाधि का निर्माण किया गया, जहाँ आज भी विश्वभर से श्रद्धालु नतमस्तक होने पहुँचते हैं।


















