कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की बॉक्सिंग स्पर्धाओं में भारतीय दल का शानदार दबदबा देखने को मिला। बॉक्सिंग हॉल में मौजूद भारतीय दर्शकों का उत्साह उस वक्त चरम पर पहुंच गया जब प्रीति पंवार और वर्ल्ड चैंपियन जैस्मिन लंबोरिया ने अपने मुकाबले जीतकर स्वर्णिम सफलता हासिल की। जैस्मिन ने डिफेंडिंग चैंपियन को परास्त करके देश को सातवां गोल्ड मेडल दिलाया था। इसके बाद सभी खेल प्रेमियों की नजरें पुरुषों की 55 किग्रा भारवर्ग स्पर्धा के खिताबी मुकाबले पर टिक गईं, जहां भारत के प्रतिभाशाली मुक्केबाज जदुमणि सिंह रिंग में उतरे। हालांकि, फाइनल मैच में ऑस्ट्रेलिया के आक्रामक बॉक्सर जाय डिक्सन के खिलाफ जदुमणि को कड़े मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक हासिल हुआ।
शुरुआती राउंड में जदुमणि की बढ़त और शानदार रणनीति
मुकाबले की शुरुआत से ही रिंग के भीतर दोनों खिलाड़ियों के बीच जबरदस्त तेजी और पैनापन देखा गया। जदुमणि सिंह और जाय डिक्सन दोनों ने ही बेहतरीन फुटवर्क का प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरे के दांव-पेच को भांपने का प्रयास किया। जदुमणि ने शुरुआती मिनटों में बेहद समझदारी से काम लिया और सटीक पंच लगाते हुए ऑस्ट्रेलियाई प्रतिद्वंद्वी को बैकफुट पर धकेल दिया। उनकी इस चालाक रणनीति के कारण डिक्सन को रक्षात्मक रुख अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पहला राउंड समाप्त होने पर जजों का निर्णय 3-2 के स्प्लिट वर्डिक्ट के साथ भारतीय बॉक्सर के पक्ष में गया, जिससे देश के लिए एक और स्वर्ण पदक की उम्मीदें काफी मजबूत हो गई थीं।
दूसरे दौर में ऑस्ट्रेलियाई बॉक्सर की वापसी और मैच का रुख
दूसरे राउंड में खेल का पूरा परिदृश्य बदल गया। ऑस्ट्रेलियाई मुक्केबाज जाय डिक्सन ने अपनी रणनीति में त्वरित बदलाव किया और बहुत ज्यादा आक्रामक शैली अपनाई। डिक्सन ने रिंग के मध्य में अपना दबदबा बनाते हुए जदुमणि पर कुछ बेहद भारी जैब्स बरसाए। इन जोरदार प्रहारों के कारण भारतीय मुक्केबाज रक्षात्मक स्थिति में आ गए और उन्हें खुद को संभालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। डिक्सन की इस आक्रामकता का असर जजों के स्कोरकार्ड पर भी साफ दिखा। दूसरा राउंड पूरी तरह ऑस्ट्रेलियाई बॉक्सर के नाम रहा और उन्होंने कुल स्कोर में 2-0 की बढ़त बनाकर मुकाबले पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली।
अंतिम सेकेंड तक संघर्ष और रजत पदक पर कब्जा
तीसरे और निर्णायक राउंड में जदुमणि सिंह ने बिना किसी दबाव के अपनी बची हुई पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने लगातार कॉम्बिनेशन पंच लगाकर मैच में वापसी करने की भरपूर कोशिश की। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, जदुमणि ने डिक्सन पर लगातार दबाव बनाए रखा और कुछ सटीक प्रहार भी कनेक्ट किए। हालांकि, जाय डिक्सन आज अपने बेहतरीन फॉर्म में नजर आ रहे थे और उन्होंने भारतीय खिलाड़ी के हर हमले का मुस्तैदी से जवाब दिया। अंतिम बाउट की घंटी बजते ही यह स्पष्ट हो गया कि डिक्सन ने स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है। भले ही जदुमणि को रजत पदक मिला, लेकिन अंतिम सेकंड तक हार न मानने के उनके जज्बे ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
मणिपुर के गांव से बॉक्सिंग रिंग तक का प्रेरक सफर
जदुमणि सिंह का मुक्केबाजी के मंच तक पहुंचने का सफर संघर्षों और अनुशासन से भरा रहा है। मणिपुर के एक बेहद छोटे से गांव में जन्मे जदुमणि का बचपन मुख्य रूप से फुटबॉल के मैदानों में बीता था। वह ब्राजील के महान फुटबॉलर नेमार के बहुत बड़े प्रशंसक रहे हैं और एक समय खुद फुटबॉलर बनने का सपना देखा करते थे। जदुमणि के परिवार का पूरा ध्यान उनकी पढ़ाई-लिखाई पर रहता था, लेकिन खेल के प्रति उनका जुनून इतना गहरा था कि वह कई बार घर वालों से छिपकर फुटबॉल खेलने निकल जाते थे। इसी कड़ी में खेलों की एक और मिसाल देखने को मिलती है जहां सीमा पार पाकिस्तान की मुक्केबाज फातिमा ने भारत की सुपरमॉम मैरी कॉम को अपना गुरु मानकर इतिहास रचा। जदुमणि ने भी अपनी लगन से फुटबॉल के मैदान से निकलकर बॉक्सिंग रिंग में भारत के लिए यह ऐतिहासिक पदक हासिल किया।



















