बाजार में मिलने वाले अधिकांश पेन पूरी तरह प्लास्टिक से तैयार किए जाते हैं, जिसे नष्ट होने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं। इसी गंभीर पर्यावरणीय संकट को समाप्त करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सौरभ मेहता और उनकी पत्नी शिवानी मेहता ने एक खास पहल की है। इस दंपति ने मिलकर प्लास्टिक के घातक कचरे को रोकने के लिए पर्यावरण-अनुकूल बायोडिग्रेडेबल पेन तैयार करने वाला स्टार्टअप स्थापित किया है। इन दोनों ने साल 2018-19 में इस विचार पर काम शुरू किया था, जिसके बाद साल 2021 में औपचारिक रूप से अपनी कंपनी का पंजीकरण कराया। अब यह उद्यम 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर अपने पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल पेन को औपचारिक रूप से बाजार में उतारने की तैयारी कर रहा है।
पेन के कचरे का अनदेखा पर्यावरणीय संकट
आमतौर पर पेन के इस्तेमाल के बाद उसे कचरे में फेंक दिया जाता है, लेकिन इसके दूरगामी नुकसान पर लोग ध्यान नहीं देते हैं। करीब 70 साल पहले बना हुआ कोई प्लास्टिक पेन आज भी कचरे के ढेर या जमीन में ज्यों का त्यों मौजूद होगा, क्योंकि यह नष्ट नहीं होता। यदि इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में धरती पर नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाएगा। किसी भी सामान्य पेन में केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही वास्तविक उपयोग का होता है, जिसमें पेन की धातु वाली निब और उसकी स्याही शामिल होती है। शेष 95 प्रतिशत हिस्सा पेन की बाहरी बॉडी और रिफिल की प्लास्टिक नली का होता है, जो पूरी तरह प्लास्टिक होता है और काम खत्म होते ही कचरा बन जाता है। इसी विशाल 95 फीसदी प्लास्टिक वेस्ट को समाप्त करने के लिए दोनों ने कागज के पेन का यह विकल्प निकाला है।
चार साल के शोध से विकसित हुई कागज की रिफिल
पेन की बाहरी बॉडी को कागज से तैयार करना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन प्लास्टिक की रिफिल का सुरक्षित विकल्प खोजना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य साबित हुआ। रिफिल के अंदर भरी तरल स्याही को कागज सोख लेता है या वह रिसने लगती है, जिससे लंबे समय तक सफलता नहीं मिल पा रही थी। सौरभ मेहता ने हार मानने के बजाय लगातार लगभग 4 साल तक गहन रिसर्च की और आखिरकार एक अनूठी तकनीक ईजाद कर ली। उन्होंने कागज से ही रिफिल तैयार की और उसकी आंतरिक सतह पर विशेष रूप से वेजिटेबल ऑयल यानी वनस्पति तेल की परत चढ़ाई। यह वनस्पति तेल स्याही के लिए एक सुरक्षित अवरोधक या बैरियर की तरह काम करता है, जिससे स्याही कागज के संपर्क में आकर बाहर नहीं रिसती। यह पेन उपयोग करने और लिखने में सामान्य बॉल पेन जैसा ही महसूस होता है, जबकि इसमें स्याही के रिसाव की कोई समस्या भी नहीं आती।
सरकारी सहायता और भविष्य के विस्तार की योजना
इस अनूठे विचार को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार की तरफ से भी वित्तीय मदद प्राप्त हुई है। इस स्टार्टअप को केंद्र सरकार की स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम के माध्यम से लगभग 16 लाख रुपये का अनुदान मिला। दंपति ने इस पूरी सहायता राशि का निवेश अपने उत्पाद के तकनीकी विकास और उसे बेहतर बनाने में किया। वर्तमान समय तक यह उद्यम बूटस्ट्रैप्ड स्तर पर संचालित हो रहा है, जिसमें संस्थापकों ने अपने सीमित संसाधनों से काम चलाया है। हालांकि उत्पादन क्षमता बढ़ाने और बाजार में व्यापक विस्तार के लिए कंपनी को आने वाले दिनों में और अधिक वित्तीय मदद की दरकार होगी, जिसके लिए नए निवेशकों से फंडिंग जुटाने की योजना बनाई गई है। संस्थापकों का लक्ष्य स्टेशनरी बाजार के बड़े उद्योगपतियों को अपने साथ जोड़ना है, ताकि सामूहिक रूप से काम करके बायोडिग्रेडेबल स्टेशनरी और पर्यावरण-अनुकूल पेपर पेन का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके।


















