मेहनत और हार न मानने का जज्बा किसी को कहां पहुंचा सकता है, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं जहानाबाद के धीरज कुमार। आठ बार परीक्षाओं में नाकामी झेलने के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और नौवीं कोशिश में आखिरकार बिहार पुलिस की वर्दी पहनने का सपना सच कर दिखाया। खास बात यह कि जिस घड़ी उनका नाम मेरिट लिस्ट में आया, उस वक्त वे बाजार में मटका कुल्फी बेच रहे थे। अपनी सफलता की खबर भी उन्हें किसी और के जरिए मिली। आज वे बेहद खुश हैं और इस कामयाबी का पूरा श्रेय अपने परिवार को देते हैं।
कौन हैं धीरज और कहां से है उनका ताल्लुक
धीरज कुमार जहानाबाद जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर हुलासगंज प्रखंड के निवासी हैं। ग्रेजुएट धीरज की शादी हो चुकी है और इस समय पत्नी समेत तीन बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। माता-पिता दोनों अक्सर बीमार रहते हैं। शुरू से ही उनका सपना सरकारी नौकरी हासिल करने का था, मगर घर की आर्थिक हालत बेहद कमजोर थी। कुछ कर गुजरने की चाहत बचपन से थी और इसके लिए वे दिन-रात मेहनत करने को तैयार रहते थे।
घर की जिम्मेदारी और रास्ते की रुकावटें
शादी के बाद घर-गृहस्थी का बोझ कई गुना बढ़ गया। एक तरफ जेब में पैसा नहीं था, दूसरी तरफ पूरे परिवार की देखभाल भी करनी थी। घर में पत्नी और बाकी सदस्यों से लगातार उलाहने सुनने को मिलते। पिता समझाते कि बाहर जाकर कमाई करो तो कुछ हाथ आएगा, माता जी भी कमोबेश यही बात दोहरातीं। बीच में कुछ वक्त के लिए वे कमाने बाहर भी गए, लेकिन मन नहीं लगा और लौट आए। सरकारी नौकरी पाने का जुनून सिर पर सवार था। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने अलग-अलग नौकरियों के लिए आठ बार परीक्षाएं दीं, मगर हर बार हाथ खाली ही रहा। हर प्रयास में पैसा खर्च होता और पत्नी की नाराजगी भी बढ़ती जाती।
गली-गली बेचा सामान, गर्मियों में कुल्फी
हालात से जूझते हुए धीरज ने आखिरकार एक गाड़ी खरीदी और लहसुन, सर्फ तथा साबुन लेकर गली-गली घूमकर बेचने लगे। कई सालों तक इसी तरह उन्होंने अपना गुजर-बसर किया। गर्मियों के मौसम में वे मटका कुल्फी भी बेच लेते, जिससे थोड़े बहुत पैसे जुट जाते और घर-परिवार का खर्च किसी तरह चल जाता। इन्हीं हालात के बीच पढ़ाई का सिलसिला भी चलता रहा — दिन में सामान बेचना और रात में किताबों के साथ वक्त बिताना उनकी दिनचर्या बन गई।
नौवें प्रयास में पलटी किस्मत
हर बार की तरह उम्मीदों के साथ धीरज ने नौवीं दफा बिहार पुलिस का फॉर्म भरा, और इस बार जो हुआ उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। जिस वक्त परीक्षा का परिणाम आया, वे लहसुन बेच रहे थे, और जब मेरिट लिस्ट बनी तो उस घड़ी कुल्फी की फेरी लगा रहे थे। अपने चयन की सूचना पाते ही उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उनके मुताबिक, सालों की मेहनत आखिरकार रंग लाई।
'शॉर्ट कट नहीं, मेहनत ही असली रास्ता'
अपनी कहानी साझा करते हुए धीरज कहते हैं कि जब तक कामयाबी न मिल जाए, तब तक हार नहीं माननी चाहिए। उनके शब्दों में, यह बेहद संघर्ष भरी सफलता है, जो आठ बार असफल होने के बाद नसीब हुई है। दूसरे युवाओं को संदेश देते हुए वे कहते हैं कि बस लगातार मेहनत करते जाइए, क्योंकि सफलता तक पहुंचने का कोई शॉर्ट कट नहीं होता।













