उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले स्थित रुपईडीह विकासखंड के रहने वाले युवा कृषक संजय मौर्य ने खेती-किसानी के पारंपरिक तौर-तरीकों को पीछे छोड़ते हुए सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। उन्होंने पारंपरिक धान और गेहूं की खेती के स्थान पर लौकी की खेती को अपनाया है। अपनी कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक तकनीकों के बल पर वे न केवल लौकी की बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति में भी उल्लेखनीय सुधार लाने में सफल हुए हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर आसपास के कई अन्य किसान भी सब्जियों की व्यावसायिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
पारंपरिक खेती की चुनौतियों से सब्जी उत्पादन तक का सफर
संजय मौर्य पूर्व में पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं की ही खेती किया करते थे। हालांकि, इन फसलों में बीज, खाद और सिंचाई की लागत साल-दर-साल बढ़ती जा रही थी, जबकि बाजार में प्राप्त होने वाला मुनाफा बहुत सीमित रहता था। कड़ी मेहनत के बावजूद अपेक्षित लाभ न मिलने के कारण उन्होंने कृषि के प्रारूप को बदलने का विचार बनाया। इसी क्रम में उन्होंने कम समय और कम लागत में बेहतर रिटर्न देने वाली लौकी की फसल को चुनने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्होंने परीक्षण के तौर पर बहुत छोटे भूभाग पर लौकी बोई थी। जब फसल की गुणवत्ता अच्छी रही और बाजार में बेहतर दाम मिले, तो उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाने का मन बना लिया।
यूट्यूब और डिजिटल माध्यमों से हासिल की तकनीक
सब्जी की खेती में कदम रखने से पहले संजय मौर्य ने आधुनिक जानकारी जुटाने पर जोर दिया। उन्होंने यूट्यूब और इंटरनेट के विभिन्न मंचों के माध्यम से लौकी की वैज्ञानिक खेती के बारे में विस्तार से अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने क्षेत्र के उन अनुभवी किसानों से भी सीधा संपर्क स्थापित किया जो पहले से लौकी उगा रहे थे। उनसे व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने खेत को तैयार किया। लौकी की अच्छी पैदावार के लिए खेत की गहरी जुताई, सही जल निकासी, समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई की प्रक्रिया बेहद आवश्यक होती है।
जैविक खाद और समय पर फसल की निगरानी
संजय मौर्य अपनी लौकी की फसल में रासायनिक उर्वरकों के बजाय संतुलित मात्रा में जैविक खाद का प्रयोग करते हैं। उनका मानना है कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और सब्जी की गुणवत्ता सुधारने में जैविक खाद मुख्य भूमिका निभाती है। इसके साथ ही वे खेत की नियमित निगरानी करते हैं। पौधों का निरंतर निरीक्षण करने से कीटों और विभिन्न रोगों का शुरुआती चरण में ही पता चल जाता है, जिससे समय रहते उनका जैविक अथवा सुरक्षित तरीकों से नियंत्रण कर लिया जाता है। बेहतर देखभाल के कारण उनकी लौकी की चमक और ताजगी बाजार में अलग ही नजर आती है।
लागत, कुल मुनाफा और आगे की योजनाएं
संजय मौर्य वर्तमान में लगभग एक बीघा जमीन पर लौकी की फसल उगा रहे हैं। एक बीघा खेत में लौकी की खेती शुरू करने में उनकी कुल लागत लगभग 3,000 रुपये आती है। लौकी की फसल को पूरी तरह तैयार होने और कटाई योग्य बनने में 6 से 7 महीने का समय लगता है। इस अवधि के दौरान वे अपनी उपज को बेचकर 70,000 रुपये से लेकर 80,000 रुपये तक की कुल आमदनी अर्जित कर लेते हैं। उनकी उत्पादित लौकी की स्थानीय मंडियों के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण और शहरी बाजारों में काफी मांग रहती है, जिससे बिक्री में कोई परेशानी नहीं आती। इस कमाई से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है और वे आने वाले समय में सब्जी की खेती के क्षेत्र का और अधिक विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।


















