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मेहंदी की रस्म वाले दिन ही अफसर बन गया जहानाबाद का यह बेटा, दोनों पैरों से दिव्यांग विकास ने दो बार इंटरव्यू में पिछड़कर भी रच दिया इतिहाससक्सेस स्टोरी
3 घंटे पहले· 3

मेहंदी की रस्म वाले दिन ही अफसर बन गया जहानाबाद का यह बेटा, दोनों पैरों से दिव्यांग विकास ने दो बार इंटरव्यू में पिछड़कर भी रच दिया इतिहास

जहानाबाद के डेढ़सैया गांव के विकास कुमार दोनों पैरों से दिव्यांग हैं, फिर भी BPSC पास कर प्रखंड विकास पदाधिकारी बने। खास बात यह कि कामयाबी की खबर उसी दिन आई जिस दिन उनकी मेहंदी की रस्म चल रही थी।

Vikram YadavVikram YadavBihar Correspondent 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बिहार के जहानाबाद जिले के विकास कुमार ने यह कर दिखाया कि शरीर की मुश्किलें कभी इरादों के आगे नहीं टिकतीं। दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने राज्य की सबसे कठिन मानी जाने वाली BPSC परीक्षा पास कर ली और प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) का पद हासिल किया। किस्मत का संयोग देखिए, अफसर बनने की खुशखबरी ठीक उसी दिन उनके पास पहुंची जिस दिन उनके घर मेहंदी की रस्म चल रही थी। एक तरफ शादी की तैयारियों की रौनक थी और दूसरी तरफ बरसों के सपने के सच होने का पल।

विकास जहानाबाद जिला मुख्यालय से करीब 6 किलोमीटर दूर डेढ़सैया गांव के रहने वाले हैं। उनकी मां अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके भीतर का जुनून और हौसला हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। यही जज्बा उन्हें अफसर की कुर्सी तक ले गया और आज वे अपने गांव और पूरे समाज के लिए मिसाल बन चुके हैं। BPSC में कामयाबी से पहले विकास पटना उच्च न्यायालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर काम कर रहे थे। दिन में नौकरी और जो वक्त बचता उसमें पढ़ाई, इसी अनुशासन ने उन्हें यह बड़ी उपलब्धि दिलाई।

गांव के स्कूल से शुरू हुआ सफर

विकास बताते हैं कि वे बाकी बच्चों की तरह सामान्य नहीं थे, लेकिन उनके परिवार, समाज और गांव ने उन्हें कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि वे कुछ नहीं कर सकते। पढ़ाई की शुरुआत गांव के पास के एक स्कूल से हुई। इसके बाद IIT की तैयारी के लिए उन्होंने पटना के एक निजी कोचिंग में दाखिला लिया। हर कदम पर उनके पिता साथ खड़े रहे। कोचिंग जाना हो या स्कूल, पिता उन्हें साइकिल पर बिठाकर ले जाते और वापस लाते थे। यह सिलसिला स्कूल के दिनों से ही चलता रहा। IIT की परीक्षा पास करने के बाद विकास कुछ समय के लिए दिल्ली गए और वहां सिविल सेवा की तैयारी में जुट गए।

नौकरी मिलने के 22वें दिन छिन गया मां का साया

विकास आगे बताते हैं, “कोरोना के दौरान मुझे घर लौटना पड़ा। इसके बाद मैं सरकारी नौकरी की तैयारी में लग गया। इसी बीच पटना उच्च न्यायालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर मेरी बहाली हो गई। अब नौकरी के साथ साथ सिविल सर्वेंट बनने का सपना भी पूरा करना था। मैं लगातार कोशिश करता रहा। दो बार साक्षात्कार में पिछड़ गया, फिर भी हार नहीं मानी। इस बार और कड़ी मेहनत की और बीपीएससी परीक्षा पास कर प्रखंड विकास पदाधिकारी बन गया। यह सब मेरे माता पिता, समाज और गांव के लोगों के सहयोग से ही संभव हुआ। जब मुझे पटना उच्च न्यायालय में नौकरी मिली, तो ठीक 22वें दिन मेरी मां इस दुनिया को छोड़कर चली गईं।”

पिता बोले, असली संघर्ष विकास का है

विकास के पिता राम उदय शर्मा कहते हैं, “यह उसकी अपनी कामयाबी है। हम लोगों ने तो बस साथ दिया, असली संघर्ष तो विकास का है। वह समाज के लिए दर्पण है और दूसरों को भी उससे सीखने की जरूरत है।”

बचपन से ही मेधावी रहा विकास

विकास के चाचा मुकेश कुमार बताते हैं कि विकास उनसे काफी छोटा है। वह दिव्यांग जरूर था, लेकिन घरवालों ने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया। खेलकूद हो या पढ़ाई लिखाई, हर मामले में उसके साथ बाकी बच्चों जैसा ही बर्ताव किया गया और इसी का नतीजा है कि उसने इतना बड़ा सम्मान हासिल किया। मुकेश के मुताबिक विकास शुरू से ही पढ़ाई में बहुत होशियार रहा है।

इसका आप पर असर

  • देशभर में: यह कहानी हर उस अभ्यर्थी के लिए हौसला है जो शारीरिक चुनौती या बार बार की असफलता से जूझ रहा है, नौकरी के साथ तैयारी कर अफसर बनना मुमकिन है।
  • बिहार में: जहानाबाद जैसे जिलों के दिव्यांग और ग्रामीण युवाओं के लिए विकास एक जीता जागता उदाहरण बन गए हैं कि सीमित संसाधनों में भी BPSC जैसी परीक्षा पास की जा सकती है।

प्रेरणा और सीख

  • असफलता को अंत न मानें: विकास दो बार साक्षात्कार में पिछड़े, फिर भी हार नहीं मानी और अगली बार और मेहनत कर सफलता पाई।
  • नौकरी और तैयारी साथ चलाएं: उन्होंने पटना उच्च न्यायालय की नौकरी करते हुए बचे हुए समय में पढ़ाई जारी रखी और बड़ा लक्ष्य हासिल किया।
  • परिवार का साथ ताकत बनता है: पिता का साइकिल पर बिठाकर स्कूल और कोचिंग ले जाना दिखाता है कि साथ खड़ा परिवार कमजोरी को मजबूती में बदल देता है।
  • कमी को बाधा न बनने दें: दिव्यांगता के बावजूद विकास को कभी कमतर महसूस नहीं कराया गया, और उन्होंने उसी सोच को अपनी ताकत बना लिया।

सवाल-जवाब

विकास कुमार कौन हैं?
विकास कुमार बिहार के जहानाबाद जिले के डेढ़सैया गांव के रहने वाले हैं, जो दोनों पैरों से दिव्यांग हैं और अब BPSC पास कर प्रखंड विकास पदाधिकारी बने हैं।
विकास ने कौन सी परीक्षा पास की और कौन सा पद पाया?
उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की परीक्षा पास की और प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) का पद हासिल किया।
इस कहानी में खास संयोग क्या है?
विकास को अफसर बनने की खबर ठीक उसी दिन मिली जिस दिन उनके घर मेहंदी की रस्म चल रही थी।
BPSC से पहले विकास क्या करते थे?
BPSC में सफलता से पहले वे पटना उच्च न्यायालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे।
विकास कितनी बार साक्षात्कार में असफल हुए?
वे दो बार साक्षात्कार में पिछड़ गए थे, लेकिन हार नहीं मानी और अगली बार मेहनत कर सफल हुए।
विकास की मां का निधन कब हुआ?
जब उन्हें पटना उच्च न्यायालय में नौकरी मिली, तो ठीक 22वें दिन उनकी मां का निधन हो गया।
विकास की पढ़ाई का सफर कैसा रहा?
उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के पास के स्कूल से हुई, फिर पटना में IIT की कोचिंग की और बाद में दिल्ली में सिविल सेवा की तैयारी की।
विकास के पिता का क्या नाम है और उन्होंने क्या कहा?
उनके पिता का नाम राम उदय शर्मा है, जिन्होंने कहा कि यह विकास की अपनी कामयाबी और संघर्ष है तथा वह समाज के लिए दर्पण है।
#सक्सेस स्टोरी#विकासकुमार#BPSC#जहानाबाद#दिव्यांगसफलता#BDO#बिहार#सफलताकीकहानी

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