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भीमताल की पूजा पडियार ने ऐपण कला को दी अंतरराष्ट्रीय पहचान, दीवारों पर उकेरी कुमाऊंनी संस्कृतिसक्सेस स्टोरी
27 अग॰ 2026, 1:14 pm (63 दिन पहले)· 4

भीमताल की पूजा पडियार ने ऐपण कला को दी अंतरराष्ट्रीय पहचान, दीवारों पर उकेरी कुमाऊंनी संस्कृति

नैनीताल जिले के भीमताल की रहने वाली ऐपण आर्टिस्ट पूजा पडियार पिछले 8 सालों से उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को नया आयाम दे रही हैं। अब वह देश और विदेश तक ऐपण उत्पाद पहुंचाने के साथ-साथ दीवारों पर मां नन्दा और सुनन्दा के भव्य चित्र उकेर कर अपनी संस्कृति को संवार रही हैं।

उत्तराखंड की देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक लोककला ऐपण अब घरों की चौखट और आंगन के पारंपरिक घेरे से निकलकर सात समंदर पार अपनी चमक बिखेर रही है। पहाड़ी अंचल की इस मनमोहक कला शैली को अंतरराष्ट्रीय पटल पर नई पहचान दिलाने में नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र की होनहार ऐपण आर्टिस्ट पूजा पडियार का अहम योगदान रहा है। पिछले करीब आठ वर्षों के निरंतर प्रयास और कलात्मक साधना से पूजा ने इस पारंपरिक कला रूप को एक आधुनिक और व्यावसायिक स्वरूप प्रदान किया है। उनके द्वारा तैयार किए गए ऐपण डिजाइन, कलाकृतियां और विभिन्न उत्पाद आज भारत के प्रमुख शहरों से लेकर विदेशों में बसे कला प्रेमियों के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

पारंपरिक ऐपण डिजाइनों के साथ-साथ पूजा पडियार अब विशाल वॉल पेंटिंग के माध्यम से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्थाओं और पौराणिक परंपराओं को दीवारों पर उकेरने का काम कर रही हैं। इन दिनों वह कुमाऊं अंचल की अधिष्ठात्री कुलदेवी मां नन्दा और देवी सुनन्दा के पावन स्वरूपों को अपनी तूलिका के जरिए जीवंत करने में जुटी हुई हैं। प्राकृतिक और पारंपरिक रंगों, पहाड़ी रेखाकृतियों और ऐपण की बारीकियों से तैयार की जा रही यह दीवार चित्रकारी स्थानीय निवासियों और नैनीताल पहुंचने वाले पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है।

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छठी कक्षा से शुरू हुआ कलात्मक रुझान और संघर्ष का दौर

अपनी कलात्मक यात्रा की शुरुआत को याद करते हुए पूजा पडियार बताती हैं कि जब वह छठी कक्षा में पढ़ाई कर रही थीं, तभी से उनका रुझान ऐपण कला की तरफ गहराने लगा था। स्कूली दिनों में ही उन्होंने परिवार के बुजुर्गों और स्थानीय परंपराओं से इस कला की बारीकियों को सीखना और गहराई से समझना प्रारंभ कर दिया। जैसे-जैसे समय बीता, कला के प्रति उनका समर्पण बढ़ता गया। 12वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते उन्होंने विभिन्न विद्यालयों और सामाजिक मंचों पर आयोजित होने वाली ऐपण प्रतियोगिताओं में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया।

इन प्रतियोगिताओं के दौरान पूजा ने एक महत्वपूर्ण बात महसूस की। उन्होंने देखा कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं और प्रदर्शनी मंचों पर बिहार की मधुबनी पेंटिंग और देश के अन्य राज्यों की प्रसिद्ध लोककलाओं को बहुत अधिक तवज्जो और सम्मान दिया जाता है। इसके विपरीत, उत्तराखंड की इतनी समृद्ध और ऐतिहासिक ऐपण कला को वह राष्ट्रीय पहचान और स्थान नहीं मिल पा रहा था, जिसकी वह हकदार थी। इसी अनुभव ने पूजा के मन में एक गहरा विचार रोपा और उनके भीतर अपनी मातृभूमि की कला के लिए कुछ बड़ा करने का संकल्प पैदा किया। उन्होंने ठान लिया कि वह ऐपण को सिर्फ एक पारंपरिक शौक तक सीमित नहीं रखेंगी, बल्कि इसे अपनी पहचान और आजीविका का मजबूत माध्यम बनाएंगी।

आठ वर्षों की कड़ी मेहनत से कला को बनाया आजीविका का साधन

पिछले आठ वर्षों के दौरान पूजा पडियार ने ऐपण को केवल एक कला रूप तक सीमित न रखकर एक समृद्ध प्रोफेशन और बिजनेस मॉडल के रूप में स्थापित कर दिखाया है। उनके द्वारा निर्मित ऐपण उत्पाद अब देश के कोने-कोने में ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से भेजे जा रहे हैं। विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय और विदेशी नागरिक भी इन हस्तनिर्मित पहाड़ी कलाकृतियों को बेहद पसंद कर रहे हैं। इससे पूजा को न केवल सम्मानजनक आजीविका मिल रही है, बल्कि उन्हें कुमाऊं की समृद्ध संस्कृति, मान्यताओं और परंपराओं को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने का सुनहरा अवसर भी प्राप्त हुआ है।

पूजा के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऐपण के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया है। आज स्थिति यह है कि हर सप्ताह राज्य के विभिन्न हिस्सों में ऐपण प्रतियोगिताओं और कार्यशालाओं का आयोजन हो रहा है। इससे पहाड़ी युवाओं के बीच इस प्राचीन लोककला को सीखने और अपनाने की जबरदस्त ललक देखने को मिल रही है। इतना ही नहीं, पूजा बताती हैं कि कई युवा अब कॉर्पोरेट नौकरियां छोड़कर ऐपण कला के क्षेत्र में पूर्णकालिक काम कर रहे हैं और इसे एक सफल स्टार्टअप और व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।

जी20 शिखर सम्मेलन, राजभवन और धार्मिक महोत्सवों में छाप

ऐपण उत्पादों और कैनवास वर्क के अलावा पूजा पडियार ने उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों, मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों में विशाल वॉल पेंटिंग का काम किया है। उनके कलात्मक कौशल की बदौलत उन्हें भारत की अध्यक्षता के दौरान आयोजित G20 सम्मेलनों से जुड़े प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट्स में अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कई प्रमुख सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के साथ-साथ उत्तराखंड के गवर्नर हाउस (राजभवन) की दीवारों पर भी अपनी खूबसूरत कलाकृतियां उकेरी हैं।

वर्तमान समय में मां नन्दा-सुनन्दा के प्रसिद्ध महोत्सव के शुभारंभ को ध्यान में रखते हुए पूजा ने बड़े पैमाने पर वॉल पेंटिंग का बीड़ा उठाया है। उन्होंने सबसे पहले भवाली क्षेत्र में और अब नैनीताल शहर में मां नन्दा और मां सुनन्दा की आकर्षक और भव्य पेंटिंग्स तैयार करने का कार्य शुरू किया है। इन कलाकृतियों के माध्यम से वह जन-जन की धार्मिक आस्था को सम्मान देने के साथ-साथ कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान को पर्यटन और राष्ट्रीय पटल पर उजागर कर रही हैं।

सवाल-जवाब

ऐपण कला क्या है और इसका संबंध किस क्षेत्र से है?
ऐपण उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की एक पारंपरिक लोककला है, जिसे मुख्य रूप से गेरू और चावल के घोल से धार्मिक व मांगलिक अवसरों पर बनाया जाता है।
पूजा पडियार कौन हैं?
पूजा पडियार उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भीमताल की रहने वाली एक प्रसिद्ध ऐपण कलाकार हैं, जो पिछले 8 वर्षों से इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट कर रही हैं।
पूजा पडियार ने ऐपण कला में क्या नया प्रयोग किया है?
उन्होंने ऐपण को केवल आंगन तक सीमित न रखकर इसे आधुनिक उत्पादों, कैनवास और बड़ी वॉल पेंटिंग्स के रूप में विकसित किया है।
पूजा पडियार ने किन प्रमुख प्रोजेक्ट्स में काम किया है?
उन्होंने G20 से जुड़े प्रोजेक्ट्स, गवर्नर हाउस (राजभवन), उत्तराखंड के प्रमुख मंदिरों और मां नन्दा-सुनन्दा महोत्सव की वॉल पेंटिंग्स में अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
क्या ऐपण कला से रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं?
हां, ऐपण अब एक व्यावसायिक मॉडल बन चुका है। कई युवा अपनी नियमित नौकरियां छोड़कर इस लोककला को एक सफल व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं।
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