झारखंड के रामगढ़ में चल रही होमगार्ड भर्ती प्रक्रिया के दौरान एक तस्वीर ने सोशल मीडिया से लेकर देश भर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यहां दो बच्चों की मां कविता महतो ने बिना जूते पहने और पारंपरिक साड़ी में ही 1600 मीटर लंबी दौड़ पूरी करके हर किसी को अचंभित कर दिया। पति के निधन के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ चुकी है। हालांकि आगे की शारीरिक बाधाओं या ऊंची कूद की प्रक्रिया में सफल न होने के कारण वह अंतिम चयन से चूक गईं, लेकिन उनका यह अडिग साहस आज देश के कोने-कोने में लाखों लोगों के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन चुका है। इस तरह के अनगिनत संघर्ष और जज्बे की कहानियां महिलाओं के लिए हमेशा से एक मजबूत नजीर पेश करती आई हैं।
केरल की एसपी आनी का नींबू पानी बेचने से पुलिस अधिकारी बनने तक का सफर
केरल के वर्कला शहर की रहने वाली एसपी आनी की जिंदगी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। अपने पति से अलगाव के बाद उन्होंने अकेले ही अपने बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाई। इस दौरान उनके सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़े हो गए, जिनसे पार पाने के लिए उन्होंने वर्कला में नींबू पानी बेचने का काम शुरू किया। तमाम वित्तीय चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई को कभी नहीं छोड़ा और साल 2016 में आखिरकार सिविल पुलिस अधिकारी बनने में सफलता हासिल की। अपनी लगन के दम पर उन्होंने आगे चलकर उपनिरीक्षक पद की परीक्षा भी पास कर ली।
बिहार की बबली कुमारी ने गर्भावस्था के दौरान भी जारी रखी तैयारी
बिहार की रहने वाली बबली कुमारी ने साल 2015 में पुलिस कांस्टेबल के रूप में अपनी नौकरी की शुरुआत की थी, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं यहीं तक सीमित नहीं थीं। नौकरी की लंबी और थका देने वाली ड्यूटी के साथ-साथ परिवार की देखरेख करते हुए भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। जब वह गर्भवती थीं, तब भी उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से अपना ध्यान नहीं हटाया। तमाम विषम परिस्थितियों और मुश्किल हालातों का डटकर मुकाबला करते हुए उन्होंने आखिरकार पुलिस उपाधीक्षक के पद तक का सफर तय किया। उनकी यह यात्रा साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी रास्ता कठिन नहीं रहता।
अंजू यादव का घरेलू दायरे से निकलकर पुलिस की वर्दी तक का सफर
ग्रामीण परिवेश के बीच पली-बढ़ी अंजू यादव को जीवन में कई तरह की सामाजिक बंदिशों और व्यक्तिगत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। विवाह के पश्चात उनकी राह में तमाम तरह की चुनौतियां खड़ी हो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के कठिन रास्ते को चुना। घर-गृहस्थी के कामों तक सीमित रहने वाली जिंदगी को पीछे छोड़कर पुलिस की वर्दी पहनने तक का उनका यह सफर लोगों के बीच काफी चर्चित रहा। साल 2025 के दौरान उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी इस संघर्ष गाथा को सार्वजनिक किया था।
महाराष्ट्र के बीड जिले की मीना घोडके की प्रेरणादायक कहानी
महाराष्ट्र के बीड जिले से ताल्लुक रखने वाली मीना घोडके ने एक ऐसा इलाका देखा जहां खेती करना और पानी की भारी किल्लत से जूझना आम बात थी। अपनी पढ़ाई के दिनों में उन्हें गुजारे के लिए खेतों में भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वह यह अच्छी तरह जानती थीं कि अगर उन्होंने कदम नहीं उठाए, तो उनका जीवन सिर्फ मजदूरी और बाल विवाह तक ही सिमट कर रह जाएगा। इसी सोच के साथ उन्होंने पुलिस बल में शामिल होने का लक्ष्य तय किया और अपनी मेहनत के दम पर कांस्टेबल बनीं। उनके गांव में उनकी इस कामयाबी ने अन्य महिलाओं के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं।
दो रुपये किराए के लिए संघर्ष करने वाली सविता प्रधान बनीं आईएएस
मध्य प्रदेश की सविता प्रधान का शुरुआती जीवन एक गरीब आदिवासी परिवार में बीता। बचपन के दिनों में उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि बस का महज दो रुपये का किराया जुटा पाना भी बहुत बड़ा काम था। शादी के बाद उन्हें घरेलू हिंसा जैसी बेहद दर्दनाक परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ा। इन सब के बीच वह अपने दो बच्चों को साथ लेकर घर से बाहर निकल आईं। एक ब्यूटी पार्लर में नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और अंततः सिविल सेवा परीक्षा पास करके प्रशासनिक अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया।
























