ओडिशा के एक साधारण किसान परिवार में जन्मी बिस्मिता पाल ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर पारंपरिक हस्तकला के क्षेत्र में एक अलग पहचान स्थापित की है। जब वह महज 20 वर्ष की थीं, तब उन्होंने ताड़ के पत्तों पर ओडिशा की सदियों पुरानी पटचित्र कला को उकेरना शुरू किया था। शुरुआत में गांव और समाज के लोगों को उनका यह काम समझ नहीं आया और कई लोगों ने उनका उपहास भी उड़ाया। परिवार की पृष्ठभूमि खेती-किसानी से जुड़ी होने के कारण लोग यह मानते थे कि वह इस क्षेत्र में कोई खास मुकाम हासिल नहीं कर पाएंगी। तमाम सामाजिक संशयों और उपहास को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपनी कला साधना जारी रखी और अपने शिल्प को लगातार निखारती रहीं।
शुरुआती संघर्ष और कला को निखारने का सफर
पटचित्र निर्माण की यात्रा धैर्य और बारीक कारीगरी से भरी होती है। अपने शुरुआती दिनों में बिस्मिता को ताड़ के पत्तों पर एक एकल पटचित्र तैयार करने में 2 से 3 महीने का लंबा वक्त लग जाता था। इस जटिल माध्यम पर काम करने के लिए अत्यधिक एकाग्रता और समय की आवश्यकता होती थी। पिछले 10 वर्षों के निरंतर अभ्यास और गहरे अनुभव के बाद उन्होंने अपनी कार्यकुशलता में उल्लेखनीय सुधार किया है। अब वह एक सामान्य पटचित्र को मात्र 20 से 30 दिनों के भीतर पूरा कर लेती हैं। समय के साथ उनके काम की गति और गुणवत्ता दोनों में बड़ा बदलाव आया है।
ताड़ के पत्तों और टसर सिल्क पर प्राकृतिक रंगों का जादू
वर्तमान में 30 वर्ष की हो चुकीं बिस्मिता मुख्य रूप से दो प्रमुख माध्यमों पर पेंटिंग बनाती हैं, जिनमें सूखे ताड़ के पत्ते और टसर सिल्क शामिल हैं। उनकी इन कलाकृतियों में ओडिशा के आराध्य भगवान जगन्नाथ पुरी की छवियां और पारंपरिक धार्मिक कथाएं प्रमुखता से उकेरी जाती हैं। इन चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी प्रक्रिया पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है। इनमें किसी भी प्रकार के रासायनिक रंग का प्रयोग नहीं होता, बल्कि पूरी तरह से प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। कलाकृतियों में की जाने वाली महीन रेखाएं और बारीक नक्काशी ग्राहकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। उनके संग्रह में कुछ पेंटिंग्स 20 से 30 दिनों में बनती हैं, जबकि अधिक विस्तृत और बड़े आकार के चित्रों को पूरा करने में करीब 1 महीने का समय लगता है।
प्रदर्शनियों और ऑर्डर्स के दम पर 60 लाख का टर्नओवर
बिस्मिता की कलाकृतियों की शुरुआती कीमत 3,000 रुपये है, जबकि उनके अधिकांश उत्पाद 3,000 से 4,000 रुपये के मूल्य दायरे में बिकते हैं। भारत सरकार द्वारा देश भर में आयोजित होने वाले शिल्प मेलों और प्रदर्शनियों में उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए स्टॉल आवंटित किए जाते हैं। इन दिनों वह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सरकारी प्रदर्शनी में हिस्सा लेने पहुंची हुई हैं, जहां लोग उनकी कलाकृतियों को करीब से देखकर सराह रहे हैं। ग्राहकों की व्यापक मांग के चलते उनके कारोबार ने तेज गति पकड़ी है। पहले जहां उनका सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपये के आसपास था, वहीं अब वह दोगुना होकर 60 लाख रुपये तक पहुंच चुका है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से बढ़ती मांग
ओडिशा सहित देश भर से बिस्मिता को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही माध्यमों से कलाकृतियों के ऑर्डर प्राप्त होते हैं। गृह सज्जा के शौकीन लोग और कला प्रेमी इन पारंपरिक शिल्पों की बड़े पैमाने पर खरीदारी करते हैं। विशेष रूप से जब त्योहारों का सीजन आता है, तब घरों को सजाने और उपहार देने के लिए लोग उनके डिज़ाइनों को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी प्रदर्शनियों के मंच और डिजिटल माध्यम के संगम ने उनकी पारंपरिक कला को एक लाभदायक और आत्मनिर्भर उद्यम में तब्दील कर दिया है।



















