नाथू ला में चीनी सेना की घुसपैठ का दावा निकला गलत, भारतीय सेना ने बताई सच्चाईराहु के प्रभाव में आ रहे बुध, 3 नवंबर से 6 राशियों के जीवन में होगा बड़ा बदलावचंद्रमा का राशि परिवर्तन: इन तीन राशियों की बढ़ेंगी मुश्किलें, बैंक बैलेंस पर आ सकता है संकटमिथुन राशि में चंद्रमा का बड़ा गोचर आज रात, जीवन में सकारात्मकता लाने के लिए अपनाएं ये 5 अचूक उपायजमशेदपुर की केमिस्ट्री शिक्षिका ने त्वचा की एलर्जी से तंग आकर शुरू किया अपना ब्रांड, अब 12 लोगों को दे रही हैं रोजगारचंद्रमा का आर्द्रा नक्षत्र गोचर: 30 अक्टूबर 2026 से इन 5 राशियों की चमकेगी किस्मतसिंह राशि में देवगुरु बृहस्पति का गोचर: इन 6 राशियों पर बरसेगा धन, 4 राशियां बरतें विशेष सावधानीहम रूस को अमेरिका से बेहतर समझते हैं, वोलोदिमिर जेलेंस्की के बयान से मची हलचलरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फिलीपींस में गुरुद्वारा साहिब के किए दर्शन, प्रवासी भारतीयों से की खास बातचीतजालंधर में हरभजन सिंह के खिलाफ आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं का फूटा गुस्सा, घर की दीवार पर लिखा गया गद्दार
बिहार के किसान लालबाबू सिंह ने शून्य बजट खाद से बदली खेती, 20 एकड़ में भारी बचतसक्सेस स्टोरी
16 अक्तू॰ 2026, 1:13 am (14 दिन पहले)· 6

बिहार के किसान लालबाबू सिंह ने शून्य बजट खाद से बदली खेती, 20 एकड़ में भारी बचत

रोहतास के किसान लालबाबू सिंह ने रासायनिक उर्वरकों का खर्च खत्म कर घर पर घन जीवामृत तैयार किया और 20 एकड़ में खेती की लागत घटाकर बड़ा मुनाफा कमाया।

खेती में लगातार बढ़ते खर्च और रसायनों की ऊंची कीमतों के बीच बिहार के एक किसान ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। रोहतास जिले के मोथा गांव में रहने वाले लालबाबू सिंह ने बाजार से महंगी खाद खरीदने की मजबूरी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। वह अपनी 20 एकड़ कृषि भूमि पर घर में तैयार किए गए प्राकृतिक उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी बनाकर उन्होंने न सिर्फ अपनी खेती की लागत को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है, बल्कि अपनी आमदनी को सुरक्षित करने का एक टिकाऊ रास्ता भी खोज निकाला है। कृषि क्षेत्र में किए गए इस अनूठे बदलाव के लिए उन्हें अब तक 15 अलग-अलग पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

बढ़ती लागत और मुनाफे का संकट

कुछ साल पहले तक लालबाबू सिंह भी अन्य किसानों की तरह पूरी तरह रासायनिक खेती पर निर्भर थे। बीस एकड़ जमीन की जोत होने के कारण हर बुवाई के समय उन पर आर्थिक दबाव काफी अधिक रहता था। रासायनिक खाद के रूप में केवल डीएपी पर ही प्रति एकड़ लगभग 2,000 रुपये का खर्च आ जाता था। इस दर से पूरी 20 एकड़ जमीन पर सिर्फ एक बार की फसल के लिए 40,000 रुपये केवल डीएपी खरीदने में लग जाते थे। इसके बाद अन्य रासायनिक उर्वरकों, बार-बार छिड़के जाने वाले महंगे कीटनाशकों और खेत में खाद डालने के लिए मजदूरों की मजदूरी का खर्च अलग से जुड़ जाता था। फसलों की पैदावार मिलने के बावजूद इस भारी लागत के चलते हाथ में बचने वाला शुद्ध मुनाफा लगातार घट रहा था, जिससे खेती घाटे का सौदा लगने लगी थी।

ये भी पढ़ें

प्राकृतिक खेती की ओर कदम और घन जीवामृत

लागत के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए लालबाबू सिंह ने जैविक और प्राकृतिक खेती के विकल्पों को समझना शुरू किया। उन्होंने इसके बारे में जरूरी जानकारियां जुटाईं और इस पद्धति का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने रसायनों का उपयोग चरणबद्ध तरीके से बंद किया और देसी गाय के अवशेषों से घर पर ही जैविक खाद तैयार करने की तकनीक अपनाई।

खेतों में पोषण की जरूरत पूरी करने के लिए वह मुख्य रूप से घन जीवामृत और अन्य तरल प्राकृतिक मिश्रणों का उपयोग करते हैं। यह खाद पूरी तरह घरेलू और आसपास उपलब्ध चीजों से बनती है, जिससे बाजार पर उनकी निर्भरता शून्य हो गई है। आज वह रासायनिक खादों पर होने वाले हजारों रुपये की सीधी बचत कर रहे हैं।

घर पर घन जीवामृत तैयार करने की सटीक विधि

लालबाबू सिंह घन जीवामृत बनाने की अपनी प्रमाणित विधि को अन्य किसानों के साथ भी साझा करते हैं। इस जैविक खाद को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद सरल और सुलभ है

  • देसी गाय का गोबर: सबसे पहले 100 किलोग्राम ताजा देसी गाय का गोबर लिया जाता है, जो इस खाद का मुख्य आधार है।
  • गोमूत्र की मात्रा: गोबर में लगभग तीन से चार किलोग्राम गोमूत्र मिलाया जाता है, जिससे सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है।
  • गुड़ और बेसन का मिश्रण: इसमें दो किलोग्राम पुराना गुड़ और दो किलोग्राम बेसन डाला जाता है। यह मिश्रण जीवाणुओं के लिए ऊर्जा और प्रोटीन का स्रोत बनता है।
  • जीवाणु युक्त मिट्टी: इसके बाद किसी पेड़ के नीचे या खेत की मेड़ से एक किलोग्राम ऐसी मिट्टी मिलाई जाती है, जहां कभी रासायनिक खाद या कीटनाशक न डाला गया हो।
  • छाया में सुखाना: इन सभी सामग्रियों को एक साथ अच्छी तरह मिलाकर गूंथ लिया जाता है। इसके बाद इस पूरे मिश्रण को 15 दिनों तक धूप से बचाकर केवल छायादार जगह पर रखा जाता है।

पंद्रह दिनों की अवधि पूरी होने के बाद यह घन जीवामृत पूरी तरह सक्रिय हो जाता है और फसलों में रासायनिक खाद के एक असरदार विकल्प के तौर पर इस्तेमाल के लिए तैयार रहता है।

लागत में गिरावट से बढ़ी किसानों की बचत

प्राकृतिक खेती को अपनाने के कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ हैं। सबसे बड़ी राहत यह मिलती है कि किसान को खाद और बीज उपचार के लिए किसी उर्वरक दुकान पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। गाय के गोबर और गोमूत्र जैसी सुलभ चीजों से खाद बन जाने से नकदी का बहाव रुक जाता है। इसके अलावा फसलों में प्राकृतिक कीट प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से कीटनाशकों का खर्च भी बच जाता है। रसायनों की तरह इसे बार-बार खेत में डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे खेत में लगने वाली मजदूरी का खर्च भी काफी कम हो जाता है। कुल मिलाकर उत्पादन लागत कम होने से फसल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश पैसा किसान की शुद्ध बचत बन जाता है।

उत्पादन घटने के भ्रम को किया दूर

अक्सर किसानों के बीच यह भ्रम फैला रहता है कि रासायनिक खाद छोड़ते ही पैदावार में भारी गिरावट आ जाएगी। लालबाबू सिंह का व्यावहारिक अनुभव इस सोच को गलत साबित करता है। उनका स्पष्ट मानना है कि अगर सही प्रशिक्षण, संतुलित अनुपात और उचित समय पर प्राकृतिक खाद का प्रयोग किया जाए, तो उत्पादन रासायनिक खेती के बराबर ही मिलता है। वह किसानों को यह भी समझाते हैं कि केवल उत्पादन के कुल आंकड़ों को देखने के बजाय लागत और मुनाफे के गणित को समझना चाहिए। यदि लागत 40,000 रुपये कम हो जाती है और उत्पादन स्थिर रहता है, तो किसान की आर्थिक स्थिति खुद-ब-खुद मजबूत हो जाती है।

सवाल-जवाब

लालबाबू सिंह कहां के रहने वाले हैं और उनके पास कितनी जमीन है?
लालबाबू सिंह बिहार के रोहतास जिले के मोथा गांव के रहने वाले हैं और वह लगभग 20 एकड़ कृषि भूमि पर खेती करते हैं।
रासायनिक खेती के दौरान उनका डीएपी खाद पर कितना खर्च होता था?
एक एकड़ में डीएपी पर लगभग 2,000 रुपये खर्च होते थे, जिससे पूरी 20 एकड़ जमीन पर एक फसल के लिए 40,000 रुपये लग जाते थे।
घन जीवामृत बनाने के लिए किन-किन सामग्रियों की आवश्यकता होती है?
इसके लिए 100 किलो देसी गाय का गोबर, 3-4 किलो गोमूत्र, 2 किलो गुड़, 2 किलो बेसन और रसायन-मुक्त जगह की 1 किलो मिट्टी चाहिए होती है।
घन जीवामृत को तैयार होने में कितना समय लगता है?
सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाने के बाद मिश्रण को 15 दिनों तक छायादार स्थान में रखा जाता है, जिसके बाद यह उपयोग के लिए तैयार हो जाता है।
लालबाबू सिंह को प्राकृतिक खेती के लिए कितने पुरस्कार मिल चुके हैं?
उन्हें प्राकृतिक खेती में उनके उत्कृष्ट प्रयासों और नवाचार के लिए अब तक 15 पुरस्कार मिल चुके हैं।
क्या प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल से फसलों की पैदावार कम हो जाती है?
लालबाबू सिंह के अनुसार सही प्रशिक्षण और उचित तरीके से प्राकृतिक खेती करने पर पैदावार सामान्य रहती है और लागत घटने से कुल बचत बढ़ जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·13 दिन पहले

बिहार के रोहतास में जब मैंने लालबाबू जी के खेत देखे थे, तब समझ आया कि देसी गाय के गोबर से कैसे बीस एकड़ की लागत शून्य हो सकती है।

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·13 दिन पहले

रासायनिक खाद के खर्चे से परेशान किसानों के लिए यह सचमुच राहत की बात है। घर पर ही कम लागत में इतनी बड़ी ज़मीन पर खेती करना वाकई कमाल का उदाहरण है।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·13 दिन पहले

पूजा जी, बात बिल्कुल सही है। जैसे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में आत्मनिर्भरता ज़रूरी होती है, वैसे ही किसानों का महंगे केमिकल से बचना उनकी अपनी इकॉनमी के लिए बहुत बड़ा कदम है।

Meera Joshi@meera-joshi·13 दिन पहले

खेती का खर्च कम करने का यह तरीका वाकई गजब है, सुकून भी मिलता है।

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·13 दिन पहले

मीरा जी, बिल्कुल! प्रकृति से जुड़ने से न सिर्फ लागत घटती है, बल्कि मन को भी शांति मिलती है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp