झुमरी तिलैया के गुरुद्वारा रोड के निवासी सगलदीप सिंह ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट डॉक्टर के पद पर कमीशन प्राप्त किया है। उन्होंने अपनी चिकित्सा शिक्षा देश के प्रतिष्ठित आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज, पुणे से पूरी की है। हाल ही में आयोजित एक भव्य पासिंग आउट परेड के दौरान उन्हें आधिकारिक तौर पर भारतीय सेना के मेडिकल अधिकारी के रूप में शामिल किया गया। अपनी ट्रेनिंग और कमीशनिंग के बाद, अब सगलदीप अंबाला कैंट में एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करेंगे, जिसके बाद वे भारतीय सेना में एक डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं देना शुरू कर देंगे।
पिता का अधूरा सपना और संघर्ष का दौर
सगलदीप सिंह के माता-पिता अशोक सलूजा और कमलेश सलूजा थे। उनके चाचा यशपाल सिंह गोल्डन ने साझा किया कि अशोक सलूजा की गहरी इच्छा थी कि उनका बेटा डॉक्टर बने और राष्ट्र की सेवा करे। सगलदीप ने अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत सेक्रेड हार्ट स्कूल से की और बाद में ग्रिजली विद्यालय, तिलैया डैम से 12वीं की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने घर पर रहकर पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ नीट परीक्षा की तैयारी शुरू की। हालांकि, वर्ष 2018 में उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया जब उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया। उस समय वे अपने जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे थे, लेकिन उन्होंने विचलित होने के बजाय उस दुख को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया और पढ़ाई जारी रखी।
साक्षात्कार में जज्बे ने जीता सबका दिल
पिता के गुजर जाने के बाद सगलदीप ने ठान लिया था कि वे उनके सपने को पूरा करके ही रहेंगे। उन्होंने दिन-रात मेहनत की और वर्ष 2021 की नीट परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य स्तर पर 34वाँ स्थान हासिल किया। इस रैंक के कारण उन्हें आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज, पुणे में प्रवेश का मौका मिला। चयन प्रक्रिया के दौरान साक्षात्कार में उनसे पूछा गया कि एक बेहतर रैंक होने के बावजूद उन्होंने अन्य सरकारी या निजी मेडिकल कॉलेज के बजाय सेना को ही क्यों चुना।
सगलदीप का उत्तर बेहद प्रभावशाली था। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य एमबीबीएस करना पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों की देखभाल करना है जो देश की रक्षा करते हैं। वे अपने चिकित्सा कौशल से उन सैनिकों की सेवा करना चाहते थे जो सीमा पर अपनी जान जोखिम में डालकर देश की हिफाजत करते हैं। उनके इस जज्बे ने इंटरव्यू बोर्ड के अधिकारियों को गहराई से प्रभावित किया। 10 जुलाई को जब उन्होंने पासिंग आउट परेड में शपथ ली, तो उनके परिवार के लिए वह पल गौरव और भावनाओं से भरा हुआ था। अंततः, उन्होंने अपने पिता के सपने को हकीकत में बदल दिया।











