उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में महिलाएं अब अपनी रूढ़िवादी सोच और बंदिशों को तोड़कर नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। जिले की गौरीगंज तहसील में रहने वाली सुधा ने यह साबित कर दिया है कि यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। एक समय ऐसा था जब सुधा का दैनिक जीवन केवल घर की रसोई और घरेलू कामों तक सिमट कर रह गया था, लेकिन उन्होंने इस दायरे को लांघकर अपनी अलग पहचान बनाने का बीड़ा उठाया।
शिक्षा और शुरुआती अनुभव
सुधा ने परास्नातक स्तर तक अपनी पढ़ाई पूरी की है। शिक्षा हासिल करने के बाद, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में कौशल विकास मिशन के अंतर्गत बड़ौदा स्वरोजगार संस्थान में एक मास्टर ट्रेनर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। इसके अलावा, उन्होंने कुछ समय तक विभिन्न निजी कंपनियों में भी कर्मचारी के रूप में काम किया। इन अलग-अलग स्थानों पर काम करने के दौरान उन्होंने जो अनुभव प्राप्त किया, उसने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि वह इससे कहीं अधिक करने की क्षमता रखती हैं। अपने परिवार के पूर्ण समर्थन के साथ, सुधा ने अपने सपनों को साकार करने के लिए कदम आगे बढ़ाए।
मुख्यमंत्री युवा उद्यमी अभियान से मिली ताकत
सुधा के जीवन में एक बड़ा सकारात्मक मोड़ तब आया जब वह मुख्यमंत्री युवा उद्यमी अभियान से जुड़ीं। लगभग 2 साल पहले उन्होंने इस सरकारी योजना के तहत 4 लाख रुपये का ऋण प्राप्त किया। अपनी खुद की जमा पूंजी को मिलाकर उन्होंने गारमेंट यानी कपड़ों के निर्माण का व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत में उनके पास काम करने के लिए मात्र दो मशीनें थीं, लेकिन अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने इसे बढ़ाया। आज उनके पास सात से भी अधिक सिलाई मशीनें हैं। सुधा के इस उद्यम ने न केवल उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि वह खुद के साथ-साथ तीन से चार अन्य लोगों को भी प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध करा रही हैं।
सफलता का मूल मंत्र: कड़ी मेहनत
सुधा मिश्रा का मानना है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता; इसके लिए निरंतर संघर्ष जरूरी है। वह याद करती हैं कि कैसे एक समय पर वह निजी कंपनियों की नौकरियों के लिए दर-दर भटकती थीं। लेकिन सरकारी सहायता और अनुदान ने उनकी स्थिति पूरी तरह बदल दी। आज वह अपने घर से ही काम का संचालन करती हैं और हर महीने 40 से 50 हजार रुपये की कमाई कर लेती हैं। वह कहती हैं कि स्वाभिमान का यह काम उन्हें वह पहचान और सम्मान दिला रहा है, जिसकी कमी उन्हें पहले खली थी। अब उन्हें अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी और का मुंह नहीं ताकना पड़ता।
दूसरों की आत्मनिर्भरता का जरिया
सुधा की इस पहल का असर उनके आसपास की अन्य महिलाओं पर भी पड़ा है। उनके साथ काम करने वाली अनामिका बताती हैं कि सिलाई का काम सीखने के बाद उन्हें अब काम की तलाश में कहीं दूर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। सुधा की फैक्ट्री ने उन्हें स्थानीय स्तर पर ही स्वावलंबी बनने का अवसर दिया है। एक और कर्मचारी शहनाज बानो भी इसी तरह के अनुभव साझा करती हैं। वह बताती हैं कि पहले उन्हें काम के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ती थी, लेकिन सुधा की फैक्ट्री में अवसर मिलने के बाद अब वह घर के करीब रहकर ही अच्छा कमा रही हैं और सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रही हैं।











