परदेस की किसी फैक्ट्री में दिनभर खटने के बजाय अगर अपने ही खेत में चार घंटे की समझदारी भरी मेहनत डाली जाए, तो कमाई भी मोटी होती है और परिवार का साथ भी नहीं छूटता। बिहार के छपरा (सारण) जिले के एक किसान ने इस सोच को अपनी जिंदगी में उतारकर दिखा दिया है कि सही तकनीक के साथ खेती अब घाटे का नहीं, बल्कि दोगुने-तिगुने मुनाफे का सौदा बन सकती है।
संठा गांव का वह किसान जिसने खेती की परिभाषा बदल दी
हम बात कर रहे हैं छपरा जिले के गरखा प्रखंड के संठा गांव में रहने वाले छेदी प्रसाद यादव की। पारंपरिक खेती के ढर्रे को पीछे छोड़कर वे अब एक ही खेत में कई फसलें एक साथ उगाने यानी मल्टी-क्रॉपिंग पर भरोसा करते हैं। खास बात यह है कि उनकी पूरी खेती जैविक (ऑर्गेनिक) विधि से होती है, यानी रासायनिक खाद-दवा से दूरी।
उन्होंने अपने महज 10 कट्ठा के खेत में मचान विधि अपनाई है, जिसे मल्टी-लेयर फार्मिंग भी कहते हैं। इसी एक टुकड़े में वे ऊपर लौकी और नीचे कुंदरी की शानदार पैदावार ले रहे हैं। नतीजा यह कि इस छोटे-से खेत से ही एक सीजन में उन्हें ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई हो जाती है।
तीन दशक का अनुभव, गांव की मिसाल
छेदी यादव कोई नौसिखिए किसान नहीं हैं। बचपन से ही वे हरी सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं और इस काम में उन्हें 30 साल से ज्यादा का तजुर्बा है। खेती को लेकर उनके अनोखे आइडिया और तकनीक आसपास के किसानों को भी खूब भा रहे हैं। पारंपरिक फसलों के साथ-साथ वे सीजनल नकदी फसलें यानी सब्जियां लगाकर अच्छी आमदनी कमाते हैं।
उनकी देखादेखी और मार्गदर्शन में इलाके के कई दूसरे किसान भी बड़े पैमाने पर सब्जी की खेती की ओर मुड़े हैं। इससे वे आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण बेहतर ढंग से कर पा रहे हैं।
'घर पर 4 घंटे, परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारी'
छेदी यादव साफ कहते हैं कि उन्होंने कभी बाहर जाकर किसी फैक्ट्री में 8 घंटे बंधुआ मजदूरी करने के बारे में नहीं सोचा। उनका मानना है कि परदेस में 8 घंटे खटने और दूसरों की डांट सुनने से कहीं बेहतर है कि घर पर रहकर खेत में 4 घंटे मेहनत कर ली जाए। इससे परिवार और सगे-संबंधियों का साथ भी बना रहता है और कमाई भी शानदार होती है। यही वजह है कि वे अपनी जिंदगी से बेहद संतुष्ट और खुश हैं।
TrendKia से बातचीत में छेदी प्रसाद यादव ने बताया कि कमाने की चाह में वे कभी दिल्ली या पंजाब नहीं गए। बीते 25-30 वर्षों से वे अपने गांव में ही रहकर खेती कर रहे हैं और एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।
कुंदरी और लौकी की दोहरी पैदावार
अपनी खेती का गणित समझाते हुए वे बताते हैं कि एक बार में वे करीब 50 किलो तक कुंदरी तोड़ लेते हैं। कुंदरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार लगाने के बाद इससे लगभग 2 से 3 साल तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। इसी मचान के नीचे से वे रोजाना 70 से 80 पीस लौकी भी तोड़ते हैं। इन सब्जियों को हर हफ्ते छपरा बाजार समिति (मंडी) में ले जाकर बेच दिया जाता है, जिससे नियमित नकदी आती रहती है।
खुद की पढ़ाई छूटी, पर बच्चों को दिला रहे उच्च शिक्षा
बातचीत के दौरान छेदी यादव भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि पारिवारिक गरीबी के चलते वे खुद बिहार बोर्ड (मैट्रिक) से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। लेकिन आज इसी खेती की बदौलत वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उनके बेटे पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी में भी उनका हाथ बंटाते हैं।
छेदी यादव का दो टूक कहना है कि अगर सही तकनीक और सूझबूझ के साथ खेती की जाए, तो युवाओं को रोजगार की तलाश में अपना घर-गांव छोड़कर पलायन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।













