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मैदान में पहाड़ी फल: गोंडा के युवा किसान सुशील निषाद का चेरी की खेती वाला अनोखा प्रयोग, सफल हुआ तो बदल जाएगी किसानों की किस्मतसक्सेस स्टोरी
15 जून 2026, 12:34 pm (47 दिन पहले)· 0

मैदान में पहाड़ी फल: गोंडा के युवा किसान सुशील निषाद का चेरी की खेती वाला अनोखा प्रयोग, सफल हुआ तो बदल जाएगी किसानों की किस्मत

गोंडा के हरिहरपुर गांव के सुशील निषाद ने ठंडे पहाड़ी इलाकों में होने वाली चेरी को मैदानी खेत में उगाने की कोशिश शुरू की है। प्रयोग सफल रहा तो यह क्षेत्र के किसानों के लिए मोटी कमाई का नया रास्ता खोल सकता है।

पहाड़ों और ठंडी जलवायु में पनपने वाली चेरी अब उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके में उगाने की कोशिश हो रही है। गोंडा जिले के वजीरगंज विकासखंड के हरिहरपुर गांव के एक युवा किसान सुशील निषाद ने अपने खेत में चेरी के पौधे रोपकर पूरे इलाके का ध्यान खींच लिया है। आमतौर पर इस फल की बागवानी पहाड़ी और शीतल क्षेत्रों तक सीमित मानी जाती है, ऐसे में गोंडा जैसे समतल मैदानी इलाके में इसका उगना अपने आप में चर्चा का विषय बन गया है।

नई सोच से शुरू हुआ प्रयोग

सुशील निषाद को खेती में कुछ नया आजमाने का शौक है, और यही शौक उन्हें चेरी तक ले आया। TrendKia से बातचीत में उन्होंने बताया कि सबसे पहले उन्होंने इस फसल के बारे में जानकारी जुटाई। इंटरनेट पर पढ़ाई की, कृषि विशेषज्ञों से राय ली और तमाम पहलुओं को समझने के बाद ही अपने खेत में पौधे लगाने का फैसला किया।

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उनका मानना है कि अगर किसान नई फसलों पर हाथ आजमाएं तो आने वाले समय में उन्हें बेहतर मौके मिल सकते हैं। हालांकि वे यह भी आगाह करते हैं कि किसी भी नई फसल को अपनाने से पहले उसकी जलवायु, मिट्टी और बाजार की मांग — तीनों के बारे में पूरी जानकारी होना बेहद जरूरी है, वरना मेहनत बेकार जा सकती है।

चेरी ही क्यों चुनी

सुशील के मुताबिक चेरी एक ऐसा फल है जिसकी मांग बाजार में कभी कम नहीं होती। स्वाद में बेहतरीन होने के साथ-साथ यह कई पोषक तत्वों से भी भरपूर होती है। बड़े शहरों में इसकी कीमत आम फलों के मुकाबले कहीं ज्यादा रहती है। यही वजह है कि अगर यह खेती सफल रही तो किसान को अच्छा-खासा मुनाफा मिलने की पूरी गुंजाइश है।

पौधों की खास देखभाल

चेरी के पौधों को स्वस्थ बनाए रखना आसान नहीं है, इन्हें खास निगरानी चाहिए। सुशील नियमित सिंचाई कर रहे हैं, समय पर खाद दे रहे हैं और पौधों को नुकसान से बचाने के इंतजाम भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि पौधों को अनुकूल माहौल देने के लिए हर जरूरी प्रबंधन किया जा रहा है। साथ ही लगातार नजर रखी जा रही है ताकि कोई दिक्कत आते ही उसका समय रहते हल निकाला जा सके।

तीन साल का इंतजार और धैर्य

यह प्रयोग आसपास के किसानों के बीच भी कौतूहल का विषय बना हुआ है। कई किसान खुद सुशील के खेत पहुंच रहे हैं, पौधों को देख रहे हैं और बारीकी से जानकारी ले रहे हैं। गांव वालों का कहना है कि अगर यह कोशिश रंग लाई तो इलाके के बाकी किसान भी चेरी की खेती के बारे में सोच सकते हैं। सुशील बताते हैं कि सही देखभाल मिले तो पौधे लगाने के करीब तीन साल बाद फल देना शुरू कर देते हैं। इसका मतलब है कि इसमें धैर्य और लगातार मेहनत — दोनों की जरूरत पड़ती है।

सिर्फ कमाई नहीं, जागरूकता का मकसद

सुशील का कहना है कि उनका इरादा केवल अपनी आमदनी बढ़ाने का नहीं है, बल्कि वे जिले के दूसरे किसानों को भी नई और फायदेमंद फसलों की ओर मोड़ना चाहते हैं। उनकी ख्वाहिश है कि किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ ऐसी फसलें भी अपनाएं जिनमें भविष्य की संभावनाएं छिपी हैं। वे कहते हैं कि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले दिनों में वे चेरी की बागवानी का दायरा और बढ़ाएंगे। उनका भरोसा है कि बाजार में इस फल की मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए यह किसानों के लिए कमाई का एक मजबूत जरिया बन सकता है।

सवाल-जवाब

सुशील निषाद कौन हैं और उन्होंने क्या किया है?
वे गोंडा जिले के वजीरगंज विकासखंड के हरिहरपुर गांव के एक युवा किसान हैं, जिन्होंने मैदानी इलाके में अपने खेत में चेरी के पौधे लगाए हैं।
चेरी की खेती मैदानी गोंडा में करना क्यों खास है?
चेरी की बागवानी आमतौर पर पहाड़ी और ठंडे इलाकों में होती है, इसलिए गोंडा जैसे समतल मैदानी क्षेत्र में इसका उगाया जाना असामान्य और चर्चा का विषय बन गया है।
चेरी के पौधे कब फल देना शुरू करते हैं?
सुशील के अनुसार, सही देखभाल मिलने पर पौधे लगाने के करीब तीन साल बाद फल देना शुरू कर देते हैं।
इस खेती से किसानों को कितना फायदा हो सकता है?
बड़े शहरों में चेरी की कीमत आम फलों से काफी ज्यादा होती है और मांग बनी रहती है, इसलिए खेती सफल रहने पर अच्छा मुनाफा मिल सकता है।
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