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मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट में पढ़ने वाले बच्चे अब कूची से बना रहे हैं अपनी पहचानसक्सेस स्टोरी
6 जुल॰ 2026, 12:47 am (116 दिन पहले)· 2

मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट में पढ़ने वाले बच्चे अब कूची से बना रहे हैं अपनी पहचान

बिहार के मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट परिसर में चलने वाली अपन पाठशाला के 28 बच्चे पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग सीख रहे हैं और अपनी बनाई तस्वीरें बेचकर कमाई भी कर रहे हैं।

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक श्मशान घाट परिसर में चलने वाला स्कूल इन दिनों एक अलग वजह से चर्चा में है। यहां चलने वाली अपन पाठशाला में बच्चे सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रंग और कूची से मिथिला पेंटिंग बनाना सीख रहे हैं और अपनी बनाई तस्वीरें बेचकर कमाई भी कर रहे हैं।

श्मशान घाट में शिक्षा के साथ हुनर की क्लास

अपन पाठशाला मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट परिसर में चलती है। इसमें पढ़ने वाले 28 बच्चे रोज की पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग की बारीकियां भी सीख रहे हैं। इन बच्चों के बनाए चित्र स्थानीय बाजार में बिक भी रहे हैं, जिससे उन्हें थोड़ी कमाई के साथ अपने काम पर भरोसा भी बढ़ रहा है।

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छठ पूजा से लेकर राधा-कृष्ण तक, कैनवास पर उतर रही परंपरा

इन दिनों बच्चों की कूची से लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की थीम पर पेंटिंग निकल रही हैं। इसके अलावा राधा-कृष्ण, मछली, मोर, तरह-तरह के पक्षी और धार्मिक स्थलों की तस्वीरें भी पारंपरिक मिथिला शैली में कागज पर उतारी जा रही हैं। चटख रंगों और पुरानी परंपरागत आकृतियों से सजी ये पेंटिंग आसपास के लोगों को खूब भा रही हैं।

माही बोलीं, कला से जुड़ रही है अपनी जड़ों से पहचान

अपन पाठशाला में पढ़ने वाली छात्रा माही का कहना है कि मिथिला पेंटिंग बिहार की पुरानी और मशहूर लोक कला है। उनके मुताबिक, पढ़ाई के साथ-साथ इस कला को सीखना उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव है और इसी बहाने उन्हें अपनी संस्कृति को करीब से जानने का मौका भी मिल रहा है।

सुमित कुमार बोले, मकसद सिर्फ किताबी पढ़ाई नहीं

अपन पाठशाला चलाने वाले सुमित कुमार के मुताबिक, इस संस्था को शुरू करने का इरादा बच्चों को सिर्फ स्कूली शिक्षा देना नहीं था। उनका कहना है कि बच्चों को ऐसा हुनर सिखाना भी जरूरी है, जिसके सहारे वे आगे चलकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इसी सोच के साथ बच्चों को मिथिला पेंटिंग की ट्रेनिंग दी जा रही है।

100 से 150 रुपये में बिक रही मेहनत, अंगवस्त्र के साथ भी मिल रहा उपहार

सुमित कुमार बताते हैं कि बच्चों की बनाई हर पेंटिंग की कीमत 100 से 150 रुपये के बीच रखी जाती है। आसपास के लोग ये पेंटिंग खरीदते हैं, तो कुछ लोग किसी को सम्मानित करते वक्त अंगवस्त्र के साथ उपहार के तौर पर भी इन्हें भेंट करते हैं। इस तरह बच्चों को थोड़ी आर्थिक मदद मिल जाती है, जो उनके लिए बड़े प्रोत्साहन का काम करती है।

मेहनत को मिल रहा सम्मान, तो बढ़ रहा है हौसला

सुमित कुमार के मुताबिक, जब बच्चों को उनकी मेहनत की कद्र मिलती है और उसकी सही कीमत भी मिलती है, तो उनका मनोबल अपने आप बढ़ जाता है। इसी हौसले के दम पर वे पढ़ाई के साथ-साथ अपनी कला को और निखारने में जुट जाते हैं। श्मशान घाट जैसी जगह पर शुरू हुई यह छोटी सी पहल अब कई बच्चों की जिंदगी में नई उम्मीद जगा रही है, जहां पढ़ाई के साथ हुनर और आत्मनिर्भरता का सबक भी दिया जा रहा है।

सवाल-जवाब

अपन पाठशाला कहां चलती है?
यह बिहार के मुजफ्फरपुर के एक श्मशान घाट परिसर में चलती है।
इस पाठशाला में कितने बच्चे पढ़ते हैं?
यहां 28 बच्चे नियमित पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग सीख रहे हैं।
बच्चे किन विषयों पर पेंटिंग बना रहे हैं?
फिलहाल वे छठ पूजा की थीम पर पेंटिंग बना रहे हैं, साथ ही राधा-कृष्ण, मछली, मोर, पक्षियों और धार्मिक स्थलों की तस्वीरें भी बना रहे हैं।
बच्चों की पेंटिंग की कीमत क्या रखी गई है?
हर पेंटिंग की कीमत 100 से 150 रुपये के बीच रखी जाती है।
अपन पाठशाला कौन चलाता है?
इसे सुमित कुमार चलाते हैं, जिनका मकसद बच्चों को शिक्षा के साथ हुनर भी सिखाना है।
पेंटिंग बिकने से बच्चों को क्या फायदा हो रहा है?
इससे बच्चों को थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
क्या ये पेंटिंग सिर्फ बेची ही जाती हैं?
नहीं, कई बार लोग किसी को सम्मानित करते समय अंगवस्त्र के साथ इन्हें उपहार के तौर पर भी देते हैं।
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