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मशरूम के बीज की किल्लत ने मुजफ्फरपुर की मनोरमा सिंह को बना दिया लाखों की कमाई करने वाली उद्यमीसक्सेस स्टोरी
2 घंटे पहले· 3

मशरूम के बीज की किल्लत ने मुजफ्फरपुर की मनोरमा सिंह को बना दिया लाखों की कमाई करने वाली उद्यमी

मुजफ्फरपुर की मनोरमा सिंह कभी मशरूम का बीज खरीदने के लिए पूसा कृषि विश्वविद्यालय जाया करती थीं, आज खुद स्पॉन तैयार कर बिहार, कई राज्यों और नेपाल तक आपूर्ति कर रही हैं और हर महीने करीब पांच लाख रुपये कमा रही हैं।

रिया मेननरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता 2 मिनट पढ़ें AI के लिए
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मुजफ्फरपुर की मनोरमा सिंह को आज लोग मशरूम क्वीन के नाम से जानते हैं, लेकिन यह पहचान उन्हें आसानी से नहीं मिली। कभी उन्हें मशरूम का बीज यानी स्पॉन खरीदने के लिए करीब 50 किलोमीटर दूर समस्तीपुर स्थित पूसा कृषि विश्वविद्यालय तक जाना पड़ता था, और वह भी महीनों पहले ऑर्डर बुक कराकर और अग्रिम भुगतान करके। आज वही मनोरमा खुद अपनी लैब में स्पॉन तैयार करती हैं और रोजाना 200 से 400 किलोग्राम बीज बिहार के अलावा कई राज्यों और नेपाल तक भेज रही हैं।

बीज की किल्लत से मिली बिजनेस की प्रेरणा

मनोरमा बताती हैं कि मशरूम की खेती शुरू करने के शुरुआती दिनों में सबसे बड़ी दिक्कत गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता ही थी। पूसा कृषि विश्वविद्यालय के अलावा भरोसेमंद जरिया कोई और था नहीं, इसलिए हर बार वहीं जाना पड़ता था, ऑर्डर पहले से बुक कराना पड़ता था और पैसे भी एडवांस में चुकाने पड़ते थे। इसी परेशानी से निकलने के लिए मनोरमा ने खुद स्पॉन बनाने का प्रशिक्षण लिया और मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड स्थित अपने मायके, बखरा-अभीछपरा गांव में अपनी लैब शुरू की। यह लैब पिछले 12 वर्षों से लगातार चल रही है।

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बिहार से नेपाल तक पहुंच रहा मनोरमा का बीज

आज उनकी लैब में तैयार स्पॉन मुजफ्फरपुर के अलावा बिहार के अलग-अलग जिलों, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल तक भेजा जाता है। करीब 500 किसान सीधे उनसे जुड़े हैं, जो उनके तैयार किए गए बीज से मशरूम की खेती कर रहे हैं। इससे इन किसानों को वह भागदौड़ नहीं करनी पड़ती, जो कभी मनोरमा को खुद करनी पड़ी थी। उनकी लैब में बटन मशरूम, ऑयस्टर मशरूम, किंग ऑयस्टर मशरूम और पैडी स्ट्रॉ यानी पुआल मशरूम, इन सभी किस्मों का स्पॉन तैयार किया जाता है।

पूरी तरह वैज्ञानिक विधि से बनता है स्पॉन

मनोरमा के मुताबिक स्पॉन तैयार करने की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से होती है। सबसे पहले गेहूं को अच्छी तरह साफ करके उबाला जाता है, फिर उसे सुखाया जाता है। इसके बाद उसमें कैल्शियम कार्बोनेट और कैल्शियम सल्फेट मिलाकर पॉलीबैग में भर दिया जाता है। इन बैगों को ऑटोक्लेव मशीन में करीब दो घंटे 15 मिनट तक स्टरलाइज किया जाता है। ठंडा होने के बाद लेमिनार एयर फ्लो मशीन की मदद से इसमें मशरूम कल्चर डाला जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ऑयस्टर मशरूम का स्पॉन करीब सात दिनों में और बटन मशरूम का स्पॉन लगभग 15 दिनों में इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है।

हर महीने पांच लाख रुपये तक मुनाफा

मनोरमा बताती हैं कि सिर्फ स्पॉन बेचकर ही उन्हें हर महीने करीब पांच लाख रुपये तक का मुनाफा हो जाता है। उनका कहना है कि अगर किसान सही तकनीक अपनाएं और अच्छी गुणवत्ता का बीज इस्तेमाल करें तो मशरूम की खेती कम लागत में भी अच्छी कमाई का जरिया बन सकती है। एक समय बीज के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाली मनोरमा आज खुद सैकड़ों किसानों की जरूरत पूरी कर रही हैं, और उनकी यह कहानी बिहार के कई किसानों और महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: मशरूम की खेती में दिलचस्पी रखने वाले किसानों और महिलाओं के लिए मनोरमा सिंह की लैब गुणवत्तापूर्ण स्पॉन का एक भरोसेमंद स्रोत बन सकती है, जिससे लंबा इंतजार और महंगी दौड़भाग टल सकती है।
  • बिहार में: मुजफ्फरपुर और आसपास के करीब 500 किसान पहले से मनोरमा के बीज से जुड़कर खेती कर रहे हैं, जिससे उन्हें दूर पूसा कृषि विश्वविद्यालय जाने और एडवांस भुगतान की झंझट से राहत मिली है।

प्रेरणा और सीख

  • समस्या को मौका बनाएं: बीज की किल्लत से परेशान होने की बजाय मनोरमा ने खुद प्रशिक्षण लेकर उसी समस्या का समाधान अपना व्यवसाय बना लिया।
  • सही प्रशिक्षण जरूरी है: उन्होंने स्पॉन उत्पादन की वैज्ञानिक विधि सीखी, जिससे गुणवत्ता बनी रही और भरोसा बढ़ा।
  • अपने आसपास से शुरुआत करें: उन्होंने अपने मायके के गांव में ही लैब शुरू की और धीरे-धीरे उसे 12 साल में बड़े नेटवर्क में बदल दिया।
  • किसानों का नेटवर्क बनाएं: करीब 500 किसानों को सीधे अपने साथ जोड़कर उन्होंने अपनी पहुंच और आय दोनों बढ़ाई।
  • विविधता अपनाएं: बटन, ऑयस्टर, किंग ऑयस्टर और पुआल मशरूम, कई किस्मों का स्पॉन तैयार कर उन्होंने अपने व्यवसाय को व्यापक बनाया।

सवाल-जवाब

मनोरमा सिंह कौन हैं और उन्हें मशरूम क्वीन क्यों कहा जाता है?
मनोरमा सिंह मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं जो मशरूम का स्पॉन तैयार कर बड़े पैमाने पर आपूर्ति करती हैं, इसी उपलब्धि के कारण उन्हें मशरूम क्वीन कहा जाता है।
मनोरमा सिंह की स्पॉन लैब कहां स्थित है?
उनकी लैब मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड के बखरा-अभीछपरा गांव स्थित उनके मायके में है, जो पिछले 12 वर्षों से चल रही है।
पहले उन्हें मशरूम का बीज लेने के लिए कहां जाना पड़ता था?
पहले उन्हें करीब 50 किलोमीटर दूर समस्तीपुर के पूसा कृषि विश्वविद्यालय जाना पड़ता था और महीनों पहले ऑर्डर व अग्रिम भुगतान करना होता था।
मनोरमा सिंह की लैब से रोजाना कितना स्पॉन तैयार होता है?
उनकी लैब से रोजाना 200 से 400 किलोग्राम मशरूम स्पॉन तैयार होता है।
उनका स्पॉन कहां-कहां भेजा जाता है?
स्पॉन मुजफ्फरपुर के अलावा बिहार के विभिन्न जिलों, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल तक भेजा जाता है।
उनकी लैब से कितने किसान जुड़े हुए हैं?
करीब 500 किसान सीधे उनसे जुड़े हैं जो उनके तैयार बीज से मशरूम की खेती करते हैं।
मनोरमा सिंह हर महीने कितना मुनाफा कमाती हैं?
वह सिर्फ स्पॉन बेचकर ही हर महीने करीब पांच लाख रुपये तक का मुनाफा कमा लेती हैं।
मशरूम का स्पॉन तैयार होने में कितना समय लगता है?
ऑयस्टर मशरूम का स्पॉन करीब सात दिनों में और बटन मशरूम का स्पॉन लगभग 15 दिनों में तैयार हो जाता है।
रिया मेनन
लेखक के बारे मेंरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता अमृतसर
विशेषज्ञताफूड लेखन, रेसिपी, पाककला रुझान, कुकिंग टिप्स, रेस्तराँ रिव्यू, वैश्विक व्यंजन, घरेलू खाना, फूड संस्कृति, लाइफस्टाइल फूड कंटेंट, पाकशास्त्र

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला के रुझानों, रेसिपी, रेस्तराँ संस्कृति, फूड रिव्यू और खाना बनाने की टिप्स को कवर करती हैं। वे फूड प्रेमियों और घरेलू रसोइयों के लिए दिलचस्प सामग्री साझा करती हैं।

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला पत्रकारिता, रेसिपी विकास, फूड संस्कृति, रेस्तराँ रुझानों और लाइफस्टाइल कुकिंग कंटेंट में विशेषज्ञता रखती हैं। वे रोज़मर्रा के घरेलू खाने के विचारों और पारंपरिक रेसिपी से लेकर आधुनिक फ़्यूज़न व्यंजनों, फूड नवाचारों और डाइनिंग अनुभवों तक — सब कुछ कवर करती हैं। सहज और दिलचस्प कहानी कहने पर ज़ोर देते हुए रिया वैश्विक व्यंजनों, मौसमी रेसिपी, खाना बनाने की तकनीकों और फूड से जुड़े लाइफस्टाइल रुझानों की पड़ताल करती हैं। उनका काम पाठकों को नए व्यंजन खोजने, अपनी कुकिंग बेहतर बनाने और फूड व पाकशास्त्र की बदलती दुनिया से अपडेट रहने में मदद करता है।

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