बिहार जैसे भीषण गर्मी वाले राज्य में सेब की खेती की कल्पना करना मुश्किल लगता है, लेकिन पश्चिम चंपारण जिले के कुछ किसानों ने यह मुमकिन कर दिखाया है। जिले में तापमान के 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद यहां के बगीचों में सेब के पेड़ फल-फूल रहे हैं। इसके पीछे HRMN 99 किस्म की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है, जिसे खासतौर पर गर्म इलाकों के लिए तैयार किया गया है।
बनकट मुसहरी के रविकांत पांडे की पहल
जिले के मझौलिया प्रखंड अंतर्गत आने वाले बनकट मुसहरी गांव के किसान रविकांत पांडे बीते करीब तीन वर्षों से सेब की बागवानी कर रहे हैं। वे बिहार के उन गिने-चुने किसानों में शामिल हैं जिन्होंने राज्य में सबसे पहले सेब की सफल खेती शुरू करने का साहस दिखाया। दिलचस्प बात यह है कि रविकांत ने खेत के अलावा अपने घर की छत पर रखे गमले में भी सेब उगाकर यह साबित कर दिया कि सही तकनीक और सही किस्म के चयन से सीमित जगह में भी यह फल उगाया जा सकता है।
नौतन के शिशिर दूबे का बड़ा सपना
जिले के नौतन प्रखंड स्थित बैकुंठवा गांव के किसान शिशिर दूबे ने भी सेब की बागवानी में महारत हासिल कर ली है। उन्होंने करीब 3 एकड़ में फैले अपने बगीचे में सेब के सैकड़ों पौधे लगाए हैं और इस बार इन पौधों में जबरदस्त फलन हुआ है। शिशिर का कहना है कि वे बिहार में सेब की खेती को व्यावसायिक रूप देना चाहते हैं और खुद को इसके निर्यातक के तौर पर स्थापित करने की योजना बना रहे हैं।
बेतिया के मेराजुल हक भी इस राह पर
जिला मुख्यालय बेतिया के रहने वाले मेराजुल हक ने भी सेब की बागवानी की ओर कदम बढ़ाया है। उन्होंने तीन साल पहले सेब के पौधे लगाकर उनकी देखभाल शुरू की थी और अब इस साल उनके बगीचे में भी फलन शुरू हो गया है। हरे और लाल रंग के बड़े आकार वाले मीठे सेब देखकर मेराजुल भी उत्साहित हैं और उन्होंने इसे कमर्शियल स्तर पर उगाने का फैसला किया है। जिले में इन तीनों किसानों के अलावा भी कई और लोग सेब की बागवानी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
गर्म इलाकों के लिए क्यों खास है HRMN 99 किस्म
किसानों के मुताबिक बिहार समेत देश के दूसरे गर्म राज्यों में सेब की सफल बागवानी के लिए HRMN 99 किस्म का चुनाव ही सबसे कारगर तरीका है। उद्यान वैज्ञानिकों ने खासतौर पर इसी किस्म को गर्म प्रदेशों की जलवायु के अनुकूल बनाकर तैयार किया है। यही वजह है कि यह किस्म 45 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी में भी आसानी से विकसित हो जाती है और तय समय पर फलन की स्थिति में पहुंच जाती है। पश्चिम चंपारण के किसानों की यह मेहनत साबित करती है कि सही किस्म और सही तकनीक के साथ पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़ा जा सकता है।













