झारखंड की राजधानी रांची से सटे बीरडिह गांव में मानसून के आगमन के साथ ही एक विशेष प्रकार की खेती ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति संवारने का काम करती है। यहां रहने वाली सुनीता देवी अपने घर परिसर में मान पत्ता उगाकर हर दिन बेहतरीन आमदनी हासिल कर रही हैं। इस पौधे की खासियत यह है कि इसके विशालकाय पत्ते लगभग 4 फीट तक बड़े होते हैं और इसके हर हिस्से को खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे बरसाती सब्जी के नाम से जाना जाता है और इसकी मांग बाजार में काफी अधिक बनी रहती है।
कमाई का अनूठा जरिया और बाजार भाव
गांव के लगभग हर घर में मान पत्ता उगाया जाता है। सुनीता देवी बताती हैं कि इस पौधे की एक डाली और एक पत्ते की बिक्री से प्रतिदिन 200 रुपये तक की कमाई आसानी से हो जाती है। बाजार में इसके अलग-अलग हिस्सों की दरें भी तय हैं। मान का पत्ता 20 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकता है, जबकि इसकी डाली 50 रुपये प्रति किलो में बिकती है। जमीन के नीचे उगने वाली इसकी मुख्य सब्जी का भाव 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक रहता है। इस तरह पूरे पौधे का व्यापार करके ग्रामीण अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं।
विभिन्न व्यंजनों में उपयोग और स्वाद
मान पौधे के प्रत्येक भाग से अलग-अलग प्रकार के व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इसके बड़े पत्तों से स्वादिष्ट बचका या पकौड़ी बनाई जाती है, जबकि इसकी हरी डाली का उपयोग भुजिया बनाने के लिए होता है। जमीन के भीतर तैयार होने वाले इसके कंद की सब्जी को लोग बहुत पसंद करते हैं। इसका स्वाद और बनावट पारंपरिक ओल की सब्जी जैसी होती है। खाने में बेहद स्वादिष्ट होने के कारण बाजार में ग्राहक इसे हाथों-हाथ खरीदते हैं।
पकाने की पारम्परिक विधि
मान सब्जी को तैयार करने के लिए एक विशेष पारम्परिक तरीका अपनाया जाता है। सबसे पहले सामान्य मसालों को अच्छे से पीसा जाता है। इसके बाद चार से पांच प्याज काटकर कढ़ाई में तब तक भुने जाते हैं जब तक कि वे सुनहरे न हो जाएं। प्याज के सही तरीके से फ्राई होने के बाद उसमें पिसे हुए मसाले और मान सब्जी के टुकड़े मिलाए जाते हैं। इस मिश्रण को धीमी आंच पर 15 से 20 मिनट तक अच्छी तरह से पकाया जाता है, जिससे सब्जी में सभी मसालों का स्वाद गहराई से उतर जाता है।
सीमित उपलब्धता और भारी मांग
मान पत्ता वर्ष भर उपलब्ध नहीं रहता। यह केवल मानसून के मुख्य महीनों यानी जुलाई और अगस्त में ही मिलता है जब क्षेत्र में भारी वर्षा होती है। यह पौधा घरों के आंगन में प्राकृतिक रूप से उग आता है या फिर इसे बीज डालकर लगाया जाता है। इन दो महीनों के बीत जाने के बाद यह पौधा समाप्त हो जाता है। अपनी दुर्लभता और बेहतरीन स्वाद की वजह से मानसून के दौरान स्थानीय हाट-बाजारों में इसकी जबरदस्त मांग रहती है।



















