उम्र केवल एक संख्या होती है और सीखने की कोई सीमा नहीं होती, इस पुरानी कहावत को 64 वर्ष के एक प्रशासनिक अधिकारी ने अपने दृढ संकल्प से पूरी तरह सही साबित कर दिखाया है। उत्तर प्रदेश में नगर निगमों की देखरेख करने वाली नियामक संस्था में डिप्टी सीईओ के पद पर कार्यरत इस वरिष्ठ अधिकारी ने हाल ही में मास्टर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमटेक की उच्च शिक्षा सफलतापूर्वक पूरी की है। सबसे विशेष बात यह रही कि उन्होंने अपनी कक्षा के मेधावी छात्रों के बीच शीर्ष 10 स्थान में जगह बनाई, जबकि उनकी कक्षा में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थियों की आयु उनसे आधी थी। इस असाधारण उपलब्धि की जानकारी उनके बेटे शशांक श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर साझा की, जिसके बाद यह कहानी देश भर में लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
काम के भारी दबाव और व्यस्त दिनचर्या के बीच हासिल की सफलता
बहुत से लोग यह मान सकते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद खाली समय मिलने पर किसी इंसान ने पढ़ाई पूरी की होगी, लेकिन यह मामला पूरी तरह अलग है। शशांक श्रीवास्तव के अनुसार, उनके पिता साल 2022 में अपनी नियमित सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद ही उन्हें उत्तर प्रदेश में सभी नगर निकायों और नगर निगमों के कामकाज पर नजर रखने वाले नियामक निकाय में डिप्टी सीईओ की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। इस पद पर रहते हुए उन पर प्रशासनिक कार्यों का बेहद भारी दबाव रहता है और प्रतिदिन कई तरह की बैठकों व व्यवस्थाओं को संभालना पड़ता है। इसके बावजूद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा की इच्छा को दबने नहीं दिया और काम के साथ-साथ पढ़ाई का संतुलन बनाए रखा।
हर हफ्ते 1000 किलोमीटर का सफर और चलती कार में पढ़ाई
इस उम्र में अध्ययन को जारी रखना कितना चुनौतीपूर्ण था, इसका अंदाजा उनकी साप्ताहिक कार्यप्रणाली से लगाया जा सकता है। अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्हें हर सप्ताह उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों का व्यापक दौरा करना पड़ता है। जमीन पर चल रहे विकास कार्यों और नागरिक व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने के लिए वे हर हफ्ते लगभग 1000 किलोमीटर की यात्रा कार से तय करते हैं। इस कठिन और थका देने वाले सफर के दौरान जब भी उन्हें थोड़ा समय मिलता, वे कार की पिछली सीट पर बैठकर ही पढ़ाई करते थे और अपने हस्तलिखित नोट्स तैयार करते थे।
अपनी मेहनत और अनुशासित दिनचर्या के बल पर उन्होंने परीक्षा की ऐसी तैयारी की, जो नियमित रूप से कॉलेज जाने वाले युवाओं को भी पीछे छोड़ दे। उनके बेटे ने बताया कि उनके पिता उन युवा सहपाठियों से भी बेहतर तैयारी के साथ परीक्षा कक्ष में जाते थे, जिनका जन्म उनके पिता को मिले पहले पदोन्नति आदेश के कई वर्षों बाद हुआ था। निरंतर अध्ययन की इसी आदत ने उन्हें एमटेक की अंतिम परीक्षा में बेहतरीन अंक दिलाए और पूरी श्रेणी में शीर्ष 10 स्थान में शामिल कराया।
जीवन की आपाधापी में सीखने का अंतर कभी नहीं बनने दिया
आमतौर पर देखा जाता है कि लोग 40 या 50 की उम्र पार करते ही नई तकनीक और नई विद्याएं सीखने से पीछे हटने लगते हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों और करियर की आपाधापी में खुद को अद्यतन रखना प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे चला जाता है। जब तक किसी व्यक्ति को अपनी इस कमी का अहसास होता है, तब तक काफी समय बीत चुका होता है। हालांकि, 64 वर्ष के इस अधिकारी ने अपने जीवन में कभी ऐसा अंतराल नहीं आने दिया। उन्होंने 40 वर्ष की आयु में, 60 वर्ष की आयु में या आज भी कभी समय के साथ चलने की अपनी गति को धीमा नहीं होने दिया। वे हर दौर में आधुनिक ज्ञान और तकनीक से खुद को जोड़ते रहे।
एमटेक के बाद अब आईआईएम लखनऊ में दाखिले का नया लक्ष्य
एमटेक की डिग्री हासिल करने के बाद भी इस बुजुर्ग शिक्षार्थी का सफर रुका नहीं है। अपनी इस बड़ी कामयाबी के बाद अब उन्होंने अपने जीवन के अगले शैक्षणिक लक्ष्य पर नजरें टिका दी हैं। वे अब प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंध संस्थान लखनऊ यानी आईआईएम लखनऊ के एक्जीक्यूटिव एजुकेशन प्रोग्राम में प्रवेश लेने के लिए अपना आवेदन फॉर्म भर रहे हैं। जिस पड़ाव पर पहुंचकर अधिकांश लोग नए लक्ष्य निर्धारित करना बंद कर देते हैं, उस उम्र में आईआईएम लखनऊ में पढ़ाई का इरादा उन लाखों लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो बढ़ती उम्र को अपनी निष्क्रियता या असफलता का बहाना बना लेते हैं।
बेटे के लिए बने जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक
अपने पिता की इस अटूट कार्यशैली और ज्ञान के प्रति लगन को देखकर शशांक श्रीवास्तव बेहद गर्व और सुकून महसूस करते हैं। उनका कहना है कि जब उनके पिता के विचार और संस्कार उनके साथ हैं, तो उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी बाहरी प्रेरणा की कभी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उनके पिता ने पिछले महीने अपना एमटेक पूरा किया है। यह प्रेरक प्रसंग संदेश देता है कि यदि मन में नया सीखने का जुनून हो, तो उम्र कभी भी किसी व्यक्ति की प्रगति में बाधक नहीं बन सकती।



















