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दृष्टि खोने के बाद भी नहीं डिगा हौसला, कंप्यूटर साइंस में रिसर्च की तैयारी कर रहे बिहार के मोहित कुमारसक्सेस स्टोरी
22 अग॰ 2026, 6:28 am (68 दिन पहले)· 4

दृष्टि खोने के बाद भी नहीं डिगा हौसला, कंप्यूटर साइंस में रिसर्च की तैयारी कर रहे बिहार के मोहित कुमार

मस्तिष्क के ट्यूमर की सर्जरी और कीमोथेरेपी के बाद दोनों आंखों की रोशनी गंवाने वाले बिहार के मोहित कुमार ने हार नहीं मानी है. यूजीसी नेट और जेआरएफ पास कर चुके मोहित अब देहरादून में प्रशिक्षण लेकर कंप्यूटर साइंस में रिसर्च की तैयारी कर रहे हैं.

बिहार के एक साधारण ग्रामीण परिवार से निकलकर शिक्षा के क्षेत्र में उच्च मुकाम हासिल करने वाले मोहित कुमार की कहानी अटूट इच्छाशक्ति की मिसाल है. बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान में पहचान बनाने की चाह रखने वाले मोहित ने कठिन स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करते हुए भी अपने लक्ष्य को ओझल नहीं होने दिया. उच्च शिक्षा प्राप्त करने और देश की प्रतिष्ठित शैक्षणिक परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने के बाद जब जीवन में एक गंभीर बीमारी ने अचानक अंधकार भर दिया, तब भी उन्होंने अपनी शैक्षणिक यात्रा को थमने नहीं दिया. आज वे अत्याधुनिक तकनीक और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से कंप्यूटर शिक्षण और शोध के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

प्रारंभिक संघर्ष, कंप्यूटर शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता

बिहार के एक छोटे से गांव में रहने वाले एक मूंगफली विक्रेता के घर जन्मे मोहित कुमार ने अपनी प्रारंभिक बाधाओं को कभी अपनी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया. उनकी रुचि बचपन से ही सूचना प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर की दुनिया में गहराई से थी. इस विषय के प्रति उनके जुड़ाव ने उन्हें स्नातक स्तर पर कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई चुनने के लिए प्रेरित किया. अपनी स्नातक की डिग्री सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद उन्होंने एमएससी-आईटी में प्रवेश लिया और इस विषय की जटिलताओं को समझकर इसमें स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की.

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अपनी पढ़ाई के दौरान मोहित का मुख्य लक्ष्य एक उत्कृष्ट शोधकर्ता और शिक्षक बनना था. इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कठिन परीक्षाओं की तैयारी शुरू की. दिन-रात की कड़ी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने यूजीसी नेट और जेआरएफ जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं. इन सफलताओं ने उनके लिए एक उज्ज्वल भविष्य और शोध के नए रास्ते खोल दिए थे, जहां वे एक प्राध्यापक के रूप में छात्रों का मार्गदर्शन करने का सपना देख रहे थे.

दिमाग में ट्यूमर का निदान और शल्य चिकित्सा का गंभीर जोखिम

जब मोहित का करियर एक नई ऊंचाई की ओर बढ़ रहा था, तभी अचानक उनके स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. सिरदर्द और अन्य शारीरिक समस्याओं के कारण जब उनकी विस्तृत चिकित्सीय जांच कराई गई, तब डॉक्टरों ने उनके मस्तिष्क में ट्यूमर होने की पुष्टि की. इस खबर ने उनके परिवार को गहरे संकट में डाल दिया. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पटना और बेंगलुरु के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने तुरंत शल्य चिकित्सा कराने का परामर्श दिया.

चिकित्सकों ने ऑपरेशन से जुड़े भारी जोखिमों के प्रति मोहित और उनके स्वजनों को पहले ही सचेत कर दिया था. डॉक्टरों का स्पष्ट कहना था कि शल्य चिकित्सा के पश्चात रोगी कोमा में जा सकता है, शरीर में पैरालिसिस का खतरा हो सकता है, किसी एक ज्ञानेंद्रिय की कार्यक्षमता पूरी तरह समाप्त हो सकती है या जान भी जा सकती है. जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए मोहित ने इस अत्यधिक जोखिम भरे ऑपरेशन को कराने का साहस दिखाया. शल्य चिकित्सा तथा उसके बाद चले कीमोथेरेपी के उपचार से उनका जीवन तो बच गया, लेकिन इस प्रक्रिया के दुष्परिणामस्वरूप उनकी दोनों आंखों की दृष्टि हमेशा के लिए चली गई.

देहरादून स्थित संस्थान में नया मोड़ और समायोजन प्रशिक्षण

अपनी आंखों की रोशनी खो देने के बाद भी मोहित ने निराशा के आगे घुटने नहीं टेके. जिस उम्र में युवा अपने स्थापित करियर को गति देते हैं, वहां अचानक आए इस मोड़ ने उनकी जीवन शैली को पूरी तरह बदल दिया. स्वयं को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हुए उन्होंने अपनी दृष्टिहीनता को अपनी सीमाओं का कारण नहीं बनने दिया. जब उन्हें उत्तराखंड के देहरादून में स्थित राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (NIEPVD) के बारे में जानकारी मिली, तो वे बिना कोई समय गंवाए वहां पहुंच गए.

इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान में मोहित ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए चलाए जाने वाले विशेष एडजस्टमेंट ट्रेनिंग कार्यक्रम में प्रवेश लिया. इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य दृष्टिहीनता के बाद दैनिक जीवन की गतिविधियों, गतिशीलता और नई तकनीकों को अपनाकर आत्मनिर्भर बनना है. देहरादून में प्रशिक्षण के दौरान वे पूरी निष्ठा, सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास के साथ अपनी नई परिस्थितियों के अनुकूल ढल रहे हैं.

कंप्यूटर शोध और दृष्टिबाधितों के सशक्तिकरण का भावी संकल्प

प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे मोहित की शैक्षणिक महत्वाकांक्षाएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं. अपने इस नए सफर के बारे में विचार साझा करते हुए मोहित कुमार ने कहा, "दृष्टि जाने से मेरे कदम थमे जरूर हैं, लेकिन रुके नहीं हैं." वे इस विशेष प्रशिक्षण को पूरा करने के तुरंत बाद कंप्यूटर साइंस के विषय पर अपना शोध पत्र लिखने की विस्तृत योजना बना रहे हैं.

पूर्व में जिस कंप्यूटर स्क्रीन को वे देखकर काम किया करते थे, अब सहायक तकनीक, स्क्रीन रीडर और विशेष सॉफ्टवेयर के माध्यम से उसे समझकर वे उसी क्षेत्र में एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं देना चाहते हैं. इसके साथ ही, अपनी व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर वे अपने जैसे अन्य दृष्टिबाधित लोगों के जीवन में शिक्षा और उम्मीद का प्रकाश फैलाने के लिए समर्पित हैं. उनका यह अनुकरणीय जीवन सफर यह साबित करता है कि अटूट संकल्प और हौसले के सामने शारीरिक सीमाएं कभी बाधा नहीं बन सकती हैं.

सवाल-जवाब

मोहित कुमार कौन हैं और उनकी शैक्षणिक उपलब्धि क्या है?
मोहित कुमार बिहार के एक गांव के रहने वाले हैं, जिन्होंने कंप्यूटर साइंस में स्नातक और एमएससी-आईटी करने के बाद यूजीसी नेट और जेआरएफ परीक्षाएं उत्तीर्ण की हैं.
मोहित कुमार की आंखों की रोशनी किस कारण से चली गई?
पढ़ाई के दौरान मस्तिष्क में ट्यूमर का पता चलने के बाद हुई शल्य चिकित्सा और कीमोथेरेपी के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी स्थायी रूप से चली गई.
डॉक्टरों ने सर्जरी से पहले क्या चेतावनी दी थी?
पटना और बेंगलुरु के डॉक्टरों ने चेतावनी दी थी कि ऑपरेशन के बाद कोमा, पैरालिसिस, मृत्यु या किसी ज्ञानेंद्रिय के खो जाने का भारी खतरा था.
दृष्टि खोने के बाद मोहित देहरादून क्यों गए?
वे देहरादून स्थित राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (NIEPVD) में एडजस्टमेंट ट्रेनिंग लेकर खुद को नए माहौल और सहायक तकनीक के अनुकूल ढालने के लिए गए.
मोहित कुमार का आगे का क्या लक्ष्य है?
वे सहायक तकनीक की मदद से कंप्यूटर साइंस में अपना रिसर्च पेपर लिखना चाहते हैं और इस क्षेत्र में शिक्षक बनकर सेवा देने के साथ दृष्टिबाधित लोगों की मदद करना चाहते हैं.
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