झारखंड की राजधानी रांची के पास इटकी में रहने वाले किसान सूरज सिंह ने खेती में एक ऐसा प्रयोग किया है जिसकी चर्चा अब दूर-दूर तक हो रही है। उन्होंने अपने खेत की समस्याओं का हल ढूंढने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल चैट जीपीटी का सहारा लिया, और नतीजा यह निकला कि आज वे अपने तीन एकड़ खेत में सिर्फ खीरे की खेती से सालाना करीब ₹8 लाख कमा रहे हैं। खास बात यह है कि सूरज का खीरा सिर्फ स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत समेत देश के कई अन्य राज्यों में सीधे सप्लाई होता है।
ChatGPT से मिला वर्टिकल फार्मिंग का आइडिया
सूरज बताते हैं कि उनके बेटे पढ़े-लिखे हैं और उन्होंने ही चैट जीपीटी से यह सवाल पूछा था कि बेहतरीन और बिना कड़वाहट वाला खीरा कैसे उगाया जाए। आमतौर पर खीरे की बेलें जमीन पर फैलती हैं, जिससे फलों पर दाग-धब्बे पड़ जाते हैं और उनकी क्वालिटी खराब हो जाती है। एआई की सलाह पर सूरज ने अपने खेत के दोनों छोर पर बांस गाड़े और उनके बीच धागे की कई परतें बांधकर एक तरह की वर्टिकल संरचना तैयार की। इस ढांचे की मदद से खीरे की बेलें जमीन पर फैलने के बजाय ऊपर की ओर चढ़ती हैं। इससे खीरा कभी मिट्टी को नहीं छूता, फल पर कोई दाग नहीं लगता और उपज की क्वालिटी शानदार बनी रहती है।
कड़वाहट दूर करने का जवाब भी एआई ने दिया
खीरे में जो कड़वापन आता है, वह ज्यादातर कम पानी मिलने की वजह से होता है। यह बात भी सूरज को चैट जीपीटी से ही पता चली। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में दिन में कम से कम तीन बार सिंचाई करना शुरू कर दिया। पर्याप्त पानी मिलने से उनका एक भी खीरा कड़वा नहीं निकलता, और सूरज इस बात की पूरी गारंटी के साथ खुला चैलेंज भी देते हैं।
हर दूसरे दिन निकलता है एक टन खीरा, दूसरे राज्यों से आते हैं व्यापारी
क्वालिटी इतनी बेहतरीन है कि बाहरी राज्यों के व्यापारी सीधे सूरज से संपर्क करते हैं। उनके खेत से हर दूसरे दिन करीब एक टन यानी 1000 किलो खीरा आसानी से निकल जाता है। बेदाग और मीठा होने की वजह से यह खीरा बाजार में हाथों-हाथ बिक जाता है और अच्छी कीमत भी दिलाता है।
जैविक खाद है सफलता की असली जड़
सूरज अपनी खेती में किसी रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि पूरी तरह जैविक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने और पौधों को जरूरी पोषक तत्व देने के लिए वे खुद एक खास जैविक मिक्सचर तैयार करते हैं। वे सड़े हुए गोबर की खाद में जैविक दवाइयां मिलाते हैं। इसके साथ ही घर के रसोई कचरे, केंचुआ खाद यानी वर्मीकंपोस्ट और अजोला को भी इसी मिश्रण में मिलाया जाता है। यह पूरा मिश्रण करीब 15 दिनों तक सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, और उसके बाद ही इसे खेत में डाला जाता है।
बेटों और ChatGPT को दिया सफलता का श्रेय
सूरज इस पूरी सफलता का श्रेय अपने बेटों और चैट जीपीटी को देते हैं। उनका कहना है, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर क्षेत्र में काम कर रहा है, तो खेती में क्यों नहीं? मेरे बेटे पढ़े-लिखे हैं, वे चैट जीपीटी चलाकर मुझे खेती के नए-नए नुस्खे देते हैं और सबसे अच्छी बात यह है कि ये सारे नुस्खे खेत में 100% काम कर रहे हैं।













