झारखंड के पलामू जिले में कृषि के क्षेत्र में पारंपरिक ढर्रे से हटकर काम कर रहीं सुनीता देवी ने यह साबित कर दिया है कि सही तकनीक और कड़ी मेहनत से खेती को बेहद मुनाफेदार व्यवसाय बनाया जा सकता है। चैनपुर प्रखंड के चेडावार गांव की रहने वाली सुनीता देवी पिछले करीब 30 वर्षों से लगातार खेती से जुड़ी हुई हैं। शादी के बाद जब वे अपने ससुराल आईं, तभी से उन्होंने सब्जी उत्पादन को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया। शुरुआत में वे पारंपरिक रूप से मुख्य रूप से बैंगन उगाती थीं। हालांकि, समय बीतने के साथ उन्होंने अपनी कृषि पद्धतियों में बदलाव किया और अब सालभर अलग-अलग मौसमों में कई तरह की सब्जियों की सफल खेती कर रही हैं।
पारंपरिक बैंगन की खेती से विविध सब्जी उत्पादन का सफर
सुनीता देवी ने बाजार की मांग और जलवायु अनुकूलता को समझते हुए खेती के स्वरूप में बड़ा बदलाव किया। पिछले करीब 3 वर्षों से वे विविध प्रकार की सब्जियों के उत्पादन पर विशेष ध्यान दे रही हैं। आज उनके खेतों में सालभर नेनुआ, भिंडी, करेला, कद्दू और टमाटर समेत विभिन्न सब्जियों की पैदावार होती है। वे भूमि के अलग-अलग हिस्सों में योजनाबद्ध तरीके से फसलों का चुनाव करती हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने करीब 5 कट्ठे में नेनुआ, 1 कट्ठे में करेला और 1 कट्ठे में टमाटर लगा रखा है, जिसके साथ अन्य मौसमी सब्जियों का भी उत्पादन नियमित रूप से किया जा रहा है।
मचान तकनीक, मल्चिंग और जैविक खाद का प्रभावी इस्तेमाल
सब्जी उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाने और फसलों को नुकसान से बचाने के लिए सुनीता देवी ने आधुनिक कृषि तकनीकों का सहारा लिया है। वे बेलदार सब्जियों के लिए मुख्य रूप से मचान विधि का उपयोग करती हैं। इस तकनीक के तहत बांस और मजबूत रस्सियों के सहारे एक ढांचा तैयार किया जाता है, जिस पर सब्जियों की बेलों को चढ़ाया जाता है। मचान पर फल लगने से वे सीधे जमीन और नमी के संपर्क में नहीं आते, जिससे सब्जियों के सड़ने और खराब होने की आशंका नाममात्र रह जाती है। इस नवाचार से फसल की चमक, आकार और कुल पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इसके अतिरिक्त, वे नमी बनाए रखने और खरपतवार पर नियंत्रण के लिए कुछ फसलों में मल्चिंग तकनीक का प्रयोग करती हैं। मिट्टी की सेहत और उर्वरता बनाए रखने के लिए वे रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक खाद का बहुतायत से इस्तेमाल करती हैं।
मेदिनीनगर के बाजार में सीधी बिक्री और रोजाना की मेहनत
सुनीता देवी के लिए खेती केवल दैनिक खर्च चलाने का जरिया नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का एक सशक्त माध्यम है। वे प्रतिदिन खेतों में खुद पसीना बहाती हैं। सुबह और शाम मिलाकर वे रोज करीब 2 से 4 घंटे अपने खेतों की देखभाल और प्रबंधन में लगाती हैं। सुबह-सुबह वे खेतों से ताजी सब्जियां तोड़ती हैं और बिना किसी बिचौलिए के सीधे मेदिनीनगर शहर के बाजार में बेचने के लिए ले जाती हैं। खुद बाजार में जाकर सब्जियां बेचने के कारण उन्हें अपनी उपज का सही और पूरा मूल्य मिलता है। इस डायरेक्ट मार्केटिंग व्यवस्था से वे रोजाना करीब 2,500 से 3,000 रुपये तक की नकदी अर्जित कर लेती हैं।
हर महीने 50 से 60 हजार रुपये की कमाई और सामाजिक प्रेरणा
आधुनिक तकनीकों के समावेश और सीधे बाजार संपर्क के बल पर सुनीता देवी अब हर महीने 50,000 से 60,000 रुपये तक की शानदार आमदनी कर रही हैं। सब्जी की बिक्री से होने वाली इस स्थिर आय से वे अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और घर के तमाम जरूरी खर्चों को बिना किसी वित्तीय तनाव के आसानी से पूरा कर पा रही हैं। सुनीता देवी का मानना है कि यदि लगन, सटीक तकनीक और सीधे बाजार से जुड़कर काम किया जाए, तो खेती में अपार मुनाफा संभव है। पलामू के ग्रामीण इलाकों में उनकी यह सफलता की कहानी उन सभी महिलाओं के लिए एक मिसाल और प्रेरणा बन चुकी है जो कृषि के माध्यम से स्वावलंबी बनना चाहती हैं।



















