सफलता की गाथाएं अक्सर विपरीत परिस्थितियों से शुरू होकर बुलंदियों पर खत्म होती हैं। छत्तीसगढ़ के बालोद में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे डॉ खूबीराम साहू (डॉ केआर साहू) की जीवनी इसी सत्य को सिद्ध करती है। धमतरी जिले के कुरूद ब्लॉक के एक छोटे से गांव, छोटीगांव से निकलकर कृषि अनुसंधान के शिखर तक पहुंचने का उनका सफर किसी प्रेरणा से कम नहीं है। यह कहानी हमें सिखाती है कि गांव की पगडंडियों से उठकर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
शिक्षा की राह में चुनौतियां और परिवार का समर्थन
डॉ साहू ने बताया कि उनके शुरुआती दिन काफी चुनौतीपूर्ण थे। गांव में शिक्षा के संसाधन बेहद सीमित थे और स्कूल जाने के लिए उन्हें अक्सर नालों को पार करना पड़ता था और कच्ची रास्तों से होकर गुजरना पड़ता था। उनका परिवार पूरी तरह से खेती पर निर्भर था। पिता की इच्छा थी कि 12वीं कक्षा के बाद खूबीराम केवल घर की खेती संभाले, क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति उच्च शिक्षा का खर्च उठाने में सक्षम नहीं थी। ऐसे में पढ़ाई छोड़ने का विचार उनके मन में आने लगा था। हालांकि, उनकी बुआ ने परिवार को उनकी प्रतिभा के बारे में समझाया और पढ़ाई जारी रखने पर जोर दिया। उसी दौर में गांव आए कबीरपंथ के गुरु अभिलाष साहेब ने भी उनके पिता को सलाह दी कि बच्चे को पढ़ने का अवसर देना चाहिए। यह मार्गदर्शन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया।
दोस्तों के सहयोग से बदली किस्मत
डॉ साहू साझा करते हैं कि 12वीं के बाद का समय काफी असमंजस भरा था। स्थिति इतनी नाजुक थी कि अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं तक उनके पास अध्ययन के लिए किताबें भी उपलब्ध नहीं थीं। ऐसे में उनके मित्रों ने आगे आकर अपनी किताबें उन्हें पढ़ने के लिए दीं। इतना ही नहीं, उनके दोस्तों ने ही उनके लिए पीएटी (प्री एग्रीकल्चर टेस्ट) का फॉर्म भर दिया। कोचिंग और तैयारी के लिए भी वे अपने दोस्तों के साथ ही सफर करते थे। जब परीक्षा के परिणाम आए, तो उनमें से केवल खूबीराम साहू का ही चयन हो पाया। इसी छोटी सी घटना ने उनके भविष्य की दिशा तय कर दी और वह कृषि विज्ञान के क्षेत्र में शामिल हो गए।
अनुसंधान की ओर बढ़ते कदम
अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें मुंबई में क्रॉप कंजर्वेटर की नौकरी का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। इसके बाद, पीजी की पढ़ाई के दौरान उन्हें दिल्ली में भी अवसर मिला, लेकिन उन्होंने नौकरी के बजाय उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी। अंततः इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के एक प्रोजेक्ट के जरिए उन्हें संविदा पर काम करने का मौका मिला और उनकी पहली नियुक्ति जगदलपुर में हुई। यह वह दौर था जब उन्होंने आदिवासी अंचलों के चुनौतीपूर्ण इलाकों में जाकर किसानों की जमीनी समस्याओं को बहुत करीब से महसूस किया।
छत्तीसगढ़ गठन और वैज्ञानिक करियर
प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद, रोजगार की अनिश्चितता ने उन्हें घेर लिया और कुछ समय के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दीं। हालांकि, साल 2000 में जब छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ, तो सरकारी सेवाओं के दरवाजे खुले। उस समय कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद उन्होंने जूनियर साइंटिस्ट के पद पर अपनी जगह बनाई। डॉ साहू ने अपनी मेहनत से पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार पदोन्नति प्राप्त करते हुए आज बालोद के कृषि विज्ञान केंद्र की कमान संभाल रहे हैं।
किसानों के लिए नई उम्मीदें
डॉ साहू का मूल उद्देश्य कृषि को किसानों के लिए अधिक लाभकारी बनाना है। वह धान, दलहन और तिलहन की गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और फसल की किस्मों को सुधारने पर लगातार शोध कर रहे हैं। बालोद जिले में धान के अवशेष (पैरे) का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से वे किसानों को पैरे से मशरूम उगाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का एक नया स्रोत मिल रहा है। आज उनका जीवन उन युवाओं के लिए एक मशाल की तरह है जो अभावों के बावजूद अपने सपनों को सच करना चाहते हैं।











