बलिया जिले के बांसडीह तहसील स्थित मिरीगिरी गांव में रहने वाले किसान जयप्रकाश पांडेय ने नींबू की बागवानी, मधुमक्खी पालन और गोपालन को आपस में जोड़कर खेती का ऐसा मॉडल खड़ा किया है, जिससे उन्हें सालाना लाखों रुपये की कमाई हो रही है. उनकी शुरुआत नींबू के बाग और मधुमक्खी पालन से हुई थी, लेकिन एक घटना ने उनकी पूरी खेती का तरीका ही बदल दिया.
मधुमक्खियों की मौत ने बदली दिशा
जब जयप्रकाश पांडेय ने मधुमक्खी पालन शुरू किया, तो उन्हें एहसास हुआ कि खेत में छिड़की जाने वाली रासायनिक दवाएं मधुमक्खियों की जान ले रही हैं. इस अनुभव ने उन्हें गहरे तक झकझोर दिया और उन्होंने रासायनिक खेती को पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती अपनाने का फैसला किया. यही फैसला आगे चलकर उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया.
पहली गाय लक्ष्मी से शुरू हुआ गोपालन
जैविक खेती के लिए जयप्रकाश को नियमित रूप से गोबर और गोमूत्र की जरूरत पड़ती थी, क्योंकि वे बाजार में मिलने वाली किसी भी खाद का इस्तेमाल नहीं करते. साथ ही घर में भी रोजाना 7 से 8 किलो दूध की जरूरत रहती थी. बेटे की सलाह पर उन्होंने अपनी पहली गाय खरीदी और उसका नाम प्यार से लक्ष्मी रखा. यहीं से उनकी असली कमाई की कहानी शुरू हुई. धीरे धीरे उनका गोपालन बढ़ता गया और राजभवन से उन्हें गिर नस्ल की 2 गायें भी मिलीं. आज उनकी गौशाला में गिर और साहीवाल नस्ल की करीब 14 गायें हैं. उन्होंने अपने यहां बछड़े भी तैयार किए हैं, ताकि आने वाले समय में उन्हें कृत्रिम गर्भाधान पर निर्भर न रहना पड़े.
20 गायों के लिए खास नाद, मच्छरदानी से सुरक्षा
जयप्रकाश की गौशाला आधुनिक तकनीक की मिसाल है. यहां एक साथ 20 गायों के चारा खाने के लिए खास नाद बनवाई गई है. गायों के नीचे काउ मैट बिछाई गई है, जो उन्हें आराम देती है और साथ ही गोमूत्र को भी एक जगह इकट्ठा कर देती है. पूरे शेड को मच्छरदानी से ढका गया है, ताकि पशु बीमार न पड़ें. गायों को नहलाने के बाद जो पानी निकलता है, वह बर्बाद नहीं होता बल्कि सीधे नींबू के बाग में पहुंचकर सिंचाई का काम करता है, जिससे पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है. मधुमक्खियों से परागण बेहतर होने के चलते नींबू के बाग की पैदावार भी दोगुनी हो चुकी है.
शहद, घी, मट्ठा और खाद, एक दूसरे को मजबूत बनाता मॉडल
यानी एक ही खेत पर शहद, घी, मट्ठा, जैविक खाद, गोमूत्र और बागवानी, ये सारी चीजें एक दूसरे को मजबूत बना रही हैं. जयप्रकाश पांडेय ने अपनी जमीन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है. राज्यपाल ने खुद उन्हें सम्मानित किया है और इसी राज्यपाल ने उनकी गौशाला का उद्घाटन भी किया था. इस पूरे काम से उन्होंने 6 लोगों को रोजगार भी दिया है.
दूध बेचने के बजाय घी बनाने का फैसला क्यों सही निकला
एक लीटर दूध तैयार करने में करीब 72 से 73 रुपये की लागत आती है, जबकि बाजार में दूध सिर्फ 40 से 50 रुपये प्रति लीटर के भाव बिकता है. इस घाटे को भांपते हुए जयप्रकाश ने दूध सीधे बेचने के बजाय मूल्य संवर्धन का रास्ता चुना. उन्होंने दूध और दही से पारंपरिक बिलौना विधि से मक्खन निकालना शुरू किया और फिर उसी मक्खन से शुद्ध देसी घी तैयार करने लगे. उनका यह घी करीब 3,000 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकता है.
सालाना 11 लाख का टर्नओवर, कमाई के कई जरिए
हर महीने करीब 30 किलो घी बिकता है, यानी सिर्फ घी से ही करीब 90 हजार रुपये का मासिक टर्नओवर बन जाता है. साल भर में यह आंकड़ा 10 से 11 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. इसके अलावा वे मट्ठा भी 25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं, जिससे अलग से मुनाफा होता है. नींबू की बागवानी और मधुमक्खी पालन से होने वाली कमाई भी इससे अलग है. यानी एक ही खेत से जयप्रकाश पांडेय के पास आय के कई जरिए बन गए हैं.











