देश में जब कभी विशालकाय और आधुनिक स्काईस्क्रेपर्स का जिक्र होता है, तो आमतौर पर लोगों का ध्यान मुंबई की चकाचौंध भरी बहुमंजिला इमारतों या फिर दिल्ली और गुड़गांव के आधुनिक टॉवरों की ओर जाता है। बहुत से लोग यह मान बैठते हैं कि देश की पहली गगनचुंबी इमारत का निर्माण देश की आर्थिक राजधानी मुंबई या महानगर कोलकाता में हुआ होगा। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई को जाता है, जिसे पहले मद्रास के नाम से पुकारा जाता था। आज से करीब सात दशक पहले, जब स्वतंत्र भारत अपने शुरुआती निर्माण दौर से गुजर रहा था, तब मद्रास के प्रमुख अन्ना सलाई रोड पर देश का पहला 12 मंजिला टॉवर बनकर तैयार हुआ था, जिसे आज हर कोई एलआईसी बिल्डिंग के नाम से जानता है।
शुरुआत और राष्ट्रीयकरण का दौर
इस ऐतिहासिक इमारत के वजूद में आने की दास्तान भी काफी दिलचस्प रही है। दशक 1950 के शुरुआती सालों में भारत के अंदर बहुमंजिला इमारतों का कोई खास चलन नहीं था और ज्यादातर शहरों में एक या दो मंजिल के पारंपरिक मकान ही देखने को मिलते थे। उस वक्त दक्षिण भारत की जानी-मानी बीमा कंपनी यूनियन लाइफ इंश्योरेंस ने अपने कॉर्पोरेट दफ्तर के लिए एक भव्य इमारत तैयार करने की रूपरेखा बनाई। इस पूरे प्रोजेक्ट का नक्शा और डिजाइन मशहूर आर्किटेक्ट एलएम चितले ने तैयार किया था। हालांकि, निर्माण का काम चल ही रहा था कि वर्ष 1956 में भारत सरकार ने देश की तमाम निजी बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी का गठन हुआ। इस प्रशासनिक बदलाव के बाद निर्माणाधीन इमारत का मालिकाना हक एलआईसी के पास चला गया और तभी से इसे एलआईसी बिल्डिंग के रूप में पहचाना जाने लगा। इसके निर्माण की जिम्मेदारी उस समय की तेजी से उभरती हुई निर्माण कंपनी लार्सन एंड टुब्रो को सौंपी गई थी।
आधुनिक तकनीक और भव्य उद्घाटन
यह विशाल संरचना 18 अगस्त 1959 को पूरी तरह बनकर तैयार हुई और इसकी ऊंचाई करीब 177 फीट मापी गई थी। इस टॉवर का आधिकारिक उद्घाटन तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज द्वारा किया गया था। उस दौर में 12 मंजिलों का होना इतनी बड़ी बात थी कि मद्रास शहर के दूर-दराज के इलाकों से लोग इस आश्चर्यजनक इमारत को देखने के लिए पहुंचते थे। स्टील और कंक्रीट से बनी इस इमारत को न केवल मद्रास बल्कि पूरे देश की पहली आधिकारिक गगनचुंबी इमारत का दर्जा मिला। एलआईसी बिल्डिंग सिर्फ अपनी ऊंचाई के कारण ही चर्चा में नहीं थी, बल्कि इसमें शामिल आधुनिक इंजीनियरिंग ने भी लोगों को हैरान कर दिया था। उस जमाने में जब सामान्य इमारतों में आवाजाही के लिए सीढ़ियों पर निर्भर रहना पड़ता था, तब इस परिसर में उस वक्त की सबसे तेज रफ्तार से चलने वाली लिफ्ट्स और एक सेंट्रलाइज्ड एयर-कंडीशनिंग प्लांट लगाया गया था। रात के वक्त जब इस 12 मंजिला इमारत की लाइटें जगमगाती थीं, तो बंगाल की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों और नावों को मीलों दूर से ही इस रोशनी की चमक दिखाई दे जाती थी।
यह इमारत इस बात का जीवंत प्रमाण थी कि नया स्वतंत्र देश अत्याधुनिक निर्माण तकनीकों को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। एलआईसी बिल्डिंग के आ जाने से मद्रास का पूरा वास्तुकला परिदृश्य हमेशा के लिए बदल गया। जिस अन्ना सलाई रोड पर कभी इक्का-दुक्का वाहन और ट्राम ही नजर आते थे, वह इस टॉवर के बनने के बाद शहर का सबसे प्रमुख व्यापारिक और वित्तीय केंद्र बन गया। इस ऐतिहासिक सफलता को देखकर देश के अन्य महानगरों जैसे मुंबई और कोलकाता में भी ऊंची इमारतों के निर्माण की एक होड़ सी शुरू हो गई। एक प्रकार से देखा जाए तो चेन्नई की इसी एलआईसी बिल्डिंग ने भारत में आधुनिक रियल एस्टेट और स्काईस्क्रेपर्स की संस्कृति की नींव रखी थी। आज छह दशकों से अधिक का लंबा समय गुजर जाने के बावजूद यह 12 मंजिला इमारत चेन्नई की अन्ना सलाई रोड पर पूरी शान के साथ टिकी हुई है। हालांकि आज देश भर में सैकड़ों मीटर ऊंची और अनगिनत मंजिलों वाली आधुनिक इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन भारत में पहले स्काईस्क्रेपर की शुरुआत करने का गौरव हमेशा चेन्नई के इस ऐतिहासिक नाम के साथ जुड़ा रहेगा।



















