15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारतवर्ष स्वाधीनता का उत्सव मना रहा था, तब नवगठित राष्ट्र के समक्ष 500 से अधिक देशी रियासतों को एक सूत्र में पिरोने का अत्यंत कठिन कार्य था। इन सभी रियासतों में हैदराबाद सबसे अधिक समृद्ध और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता था। इतिहासकार डॉ. एहसान खान के अनुसार, दकन की इस विशाल रियासत की अधिकांश आबादी गैर-मुस्लिम थी, जबकि शासन की बागडोर निज़ाम मीर उस्मान अली खान के हाथों में केंद्रित थी। देश के विभाजन के दौरान कुछ तत्वों ने धर्म के आधार पर हैदराबाद को पाकिस्तान में मिलाए जाने का सुझाव दिया था। निज़ाम ने इस मांग को पूरी तरह खारिज तो कर दिया, परंतु वे तत्काल भारतीय संघ में शामिल होने के लिए भी सहमत नहीं हुए। इसके परिणामस्वरूप, देश की आजादी के बाद भी हैदराबाद पर निज़ाम का स्वतंत्र शासन कायम रहा।
कूटनीतिक प्रयासों से लेकर सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन पोलो तक
हैदराबाद को भारतीय संघ का अभिन्न अंग बनाने के लिए तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने व्यापक कूटनीतिक संवाद आयोजित किए। जब दीर्घकालिक वार्ताओं के माध्यम से कोई मार्ग प्रस्तुत नहीं हुआ, तब स्वाधीनता के लगभग 13 महीने बीत जाने के बाद 13 सितंबर 1948 को 'ऑपरेशन पोलो' नामक सैन्य अभियान प्रारंभ किया गया। यह रणनीतिक सैन्य कार्रवाई करीब 5 दिनों तक जारी रही। अंततः 17 सितंबर 1948 को निज़ाम की सेना ने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया और हैदराबाद रियासत का भारत संघ में पूर्ण विलय संपन्न हुआ। भारत सरकार के साथ हुए समझौते के तहत शुरुआती चरण में निज़ाम को हैदराबाद राज्य का राजप्रमुख नियुक्त किया गया था।
संविधान का प्रवर्तन और भाषाई आधार पर रियासत का पुनर्गठन
26 जनवरी 1950 को जब स्वतंत्र भारत का संविधान प्रभावी हुआ, तब हैदराबाद पूरी तरह से भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्यधारा में समाहित हो गया। कालांतर में इस विशाल रियासत का भाषाई प्राथमिकताओं के आधार पर पुनर्गठन किया गया। इसके तहत मराठी भाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र में सम्मिलित किया गया, जबकि कन्नड़ भाषी भूभाग कर्नाटक का हिस्सा बने। इसी प्रकार, तेलुगु और उर्दू भाषी क्षेत्रों को आंध्र प्रदेश के साथ जोड़ा गया, जो वर्तमान समय में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों के रूप में पहचान रखते हैं।
विश्व के सबसे धनी व्यक्ति और 1962 के युद्ध में स्वर्ण दान
हैदराबाद के निज़ाम की अगाध संपत्ति और वैभव की गाथाएं वैश्विक स्तर पर चर्चित थीं। 22 फरवरी 1937 को प्रसिद्ध 'टाइम मैगज़ीन' ने अपने मुख्य पृष्ठ पर उन्हें धरती का सबसे अमीर इंसान घोषित किया था। रियासत का भारत में विलय हो जाने के उपरांत भी राष्ट्र के प्रति उनका दायित्व बना रहा। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश की सीमाओं की सुरक्षा हेतु 'राष्ट्रीय रक्षा कोष' का आह्वान किया, तब निज़ाम ने देशहित में लगभग 425 किलोग्राम सोना दान देकर ऐतिहासिक सहयोग प्रदान किया था। आज जब देश स्वतंत्रता का पर्व मनाता है, तब हैदराबाद के विलय की यह ऐतिहासिक यात्रा अखंड भारत के निर्माण का महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।



















