ब्रिटेन की राजधानी के मध्य में खड़ी लंदन सेंट्रल मस्जिद अपने अंदर दशकों पुराना अनोखा इतिहास समेटे हुए है। बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि इस विश्वविख्यात इबादतगाह की ऐतिहासिक जड़ें भारत में तत्कालीन हैदराबाद रियासत के शाही परिवार की आर्थिक मदद से जुड़ी हुई हैं।
केंसिंग्टन में शिलान्यास और शाही परिवार का सहयोग
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 4 जून 1937 को हुई थी, जब केंसिंग्टन स्थित मॉर्निंगटन एवेन्यू में लंदन निज़ामिया मस्जिद की नींव रखी गई। इस ऐतिहासिक शिलान्यास समारोह में हैदराबाद के प्रिंस ऑफ बेरार, नवाब मीर हिमायत अली खान यानी आज़म जाह बहादुर खुद उपस्थित रहे। उनके पिता तथा हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने इस धार्मिक स्थल के लिए 60,000 पाउंड की बहुत बड़ी आर्थिक सहायता दी थी। उस दौर में पूरे निर्माण कार्य का अनुमानित खर्च करीब 1,00,000 पाउंड आंका गया था।
ताज महल की तर्ज पर डिजाइन और विश्व युद्ध की बाधा
प्रारंभिक खाके के तहत इस धार्मिक इमारत को आगरा के ताज महल की स्थापत्य शैली पर तैयार करने का विचार था। मकसद यह था कि पश्चिमी मुल्क में इस्लामी वास्तुकला की एक नायाब मिसाल कायम की जा सके। हालांकि, जब काम शुरू होने की दिशा में कदम बढ़े, तभी 1939 में छिड़े द्वितीय विश्व युद्ध के संकट और अंतरराष्ट्रीय अफरातफरी ने इस पूरी योजना की रफ्तार को पूरी तरह रोक दिया।
रीजेंट्स पार्क में जमीन का आवंटन और नया मोड़
युद्धकाल के दौरान वर्ष 1940 में ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सल्तनत में मौजूद इस्लामी समुदाय और लंदन में एक विशाल इबादतगाह की अहमियत को स्वीकार किया। शासन स्तर पर रीजेंट्स पार्क के पास एक नया भूखंड इस काम के लिए तय किया गया। वक्त बीतने के साथ पुरानी निज़ामिया मस्जिद से जुड़े न्यास और उसके तमाम वित्तीय कोष को इसी नई योजना में समाहित कर दिया गया।
सर फ्रेडरिक गिबर्ड का नया स्वरूप और 1978 में पूर्णता
यद्यपि ताज महल जैसा दिखने वाला पुराना ढांचा तो हकीकत में तब्दील नहीं हो पाया, परंतु विख्यात ब्रिटिश वास्तुकार सर फ्रेडरिक गिबर्ड ने इसे समकालीन और भव्य स्थापत्य का रूप प्रदान किया। कई दशकों के लंबे सफर और निर्माण प्रक्रिया के बाद आखिरकार वर्ष 1978 में यह इमारत मुकम्मल हुई। वर्तमान समय में लंदन सेंट्रल मस्जिद तथा रीजेंट्स पार्क मस्जिद के तौर पर पहचानी जाने वाली यह जगह ब्रिटेन के मुसलमानों का सबसे अहम केंद्र है, जिसमें हैदराबाद रियासत का योगदान हमेशा याद किया जाता है।



















