बिहार में पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने की मुहिम इन दिनों तेज हो चली है, और इसी बीच बेगूसराय जिले की एक कोठी एक बार फिर लोगों की जुबान पर है। दौलतपुर गांव में खड़ी यह इमारत करीब डेढ़ सौ साल पुरानी बताई जाती है, फिर भी इसकी दीवारें आज भी उतनी ही मजबूत और चमकदार दिखती हैं, जितनी शायद निर्माण के वक्त रही होंगी। इलाके के लोग और बाहर से आने वाले पर्यटक अक्सर इस कोठी को देखने पहुंचते हैं, और हर कोई इसकी बनावट, इसकी मजबूती और इसकी पुरानी शानो-शौकत देखकर हैरान रह जाता है।
100 बीघे में फैला है पूरा परिसर
बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों के शासन के दौरान इस कोठी में कई अंग्रेज अधिकारी रहा करते थे। देश आजाद होने के बाद से यह इमारत खाली पड़ी है, इसमें अब कोई नहीं रहता। लेकिन खाली पड़े रहने के बावजूद इसकी भव्यता में कोई कमी नहीं आई है। कोठी का दायरा भी छोटा नहीं है, यह सौ बीघे से ज्यादा जमीन में फैली हुई बताई जाती है। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी संपत्ति का फिलहाल कोई स्पष्ट मालिक सामने नहीं आया है, फिर भी यह जगह लोगों की उत्सुकता का केंद्र बनी हुई है और आसपास के गांवों में इसे लेकर तरह-तरह की बातें होती रहती हैं।
पहली बार आने वाले को नहीं मिलता मुख्य दरवाजा
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस कोठी का हर हिस्सा एक-दूसरे से अलग तरीके से बनाया गया है, हर कमरे और गलियारे की दिशा अलग है। इसकी बनावट इतनी उलझी और अनोखी है कि जो शख्स पहली बार यहां आता है, वह आसानी से मुख्य प्रवेश द्वार तक नहीं पहुंच पाता और रास्ता भटक जाता है। दौलतपुर पंचायत के मुखिया उमा कुमार चौधरी के मुताबिक, यह कोठी अंग्रेजों के दौर की धरोहर है और आसपास कहीं भी इस तरह की दूसरी इमारत नहीं मिलती। उन्होंने बताया कि करीब 150 साल पहले, जब आज जैसी मशीनें और आधुनिक तकनीक मौजूद नहीं थीं, तब इतनी विशाल, मजबूत और पेचीदा इमारत बनाना अपने आप में हैरान करने वाली बात है।
चिलचिलाती गर्मी में भी ठंडे रहते हैं कमरे
इस कोठी की एक और खासियत इसके अंदर बने कमरे हैं। स्थानीय निवासियों का दावा है कि सबसे तेज गर्मी वाले दिनों में भी इन कमरों के अंदर का तापमान काफी नीचे रहता है। कुछ देर बैठते ही एक प्राकृतिक ठंडक महसूस होने लगती है, मानो कोई पंखा या कूलर पहले से चल रहा हो। लोगों का मानना है कि उस दौर की निर्माण तकनीक इतनी बेहतरीन थी कि आज के आधुनिक एसी भी उसके सामने कम पड़ जाएं। यही वजह है कि यहां पहुंचने वाला हर व्यक्ति इसकी मजबूत दीवारों, अलग तरह की वास्तुकला और इस प्राकृतिक ठंडक की तारीफ किए बिना नहीं रहता, और लौटते वक्त इसकी तस्वीरें और कहानियां अपने साथ ले जाता है।
संरक्षण मिले तो बन सकती है बड़ा पर्यटन स्थल
इलाके के लोगों का कहना है कि अगर जिला प्रशासन और बिहार सरकार इस इमारत के रखरखाव और विकास पर ध्यान दें, तो दौलतपुर कोठी आने वाले समय में बेगूसराय की सबसे बड़ी पर्यटन पहचान बन सकती है। उनका तर्क है कि इससे न सिर्फ इस ऐतिहासिक इमारत को देशभर में पहचान मिलेगी, बल्कि आसपास के लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे, क्योंकि पर्यटन बढ़ने से छोटे-मोटे कारोबार, होटल, खानपान और परिवहन जैसी सेवाओं की मांग भी अपने आप बढ़ जाती है। फिलहाल यह कोठी बिना किसी सरकारी मदद के भी अपनी ऐतिहासिक विरासत, अनोखी निर्माण शैली और अपनी रहस्यमयी बनावट के दम पर लोगों को अपनी ओर खींच रही है।




















