यूएसएआईडी में कागजी कार्रवाई के बिना ही फैसले लेते रहे जेरेमी लेविन, एचआर रिकॉर्ड में नहीं था नामबेंगलुरु में डीआरडीओ से जुड़ी एजेंसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक की संदिग्ध मौत, काम के तनाव का आरोपलखनऊ ट्रिपल मर्डर मामला: एलडीए ने आरोपी के घर पर चलाया बुलडोजर, अवैध निर्माण बताकर किया सीलकेरल कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश पर पोस्ट विवाद के बाद मांगी माफी, उठाया कड़ा कदम15 दिसंबर से शुरू होगा फॉग सीजन, उड़ानों में देरी पर यात्रियों की परेशानी कम करने के लिए सरकार ने बनाई खास रणनीतितुला राशि में वक्री शुक्र का वैवाहिक जीवन पर असर, करवाचौथ से पहले 28 अक्टूबर को उदय होंगेखरगे की टिप्पणी पर गरमाई राजनीति, सर्वे में 72 प्रतिशत लोगों ने माना संस्कारों पर सीधा प्रहारअरुणाचल प्रदेश में सुईंग प्रोजेक्ट पर मंत्री ओजिंग तासिंग ने प्रभावित लोगों से की चर्चाझालावाड़ में दम्पति का विवाद सुलझाना पड़ा भारी, बीच-बचाव करने गए दो युवकों पर चाकू से हमलाजोधपुर में भारतमाला एक्सप्रेस-वे पर केमिकल टैंकर में लगी भीषण आग, दमकल की गाड़ियों ने पाया काबू
बीकानेर का ऐतिहासिक लक्ष्मी निवास पैलेस, राजशाही शिकार की परंपरा और वन्यजीवों के दुर्लभ अवशेषों से पर्यटकों को कर रहा है हैरानयात्रा
27 जुल॰ 2026, 1:14 pm (92 दिन पहले)· 2

बीकानेर का ऐतिहासिक लक्ष्मी निवास पैलेस, राजशाही शिकार की परंपरा और वन्यजीवों के दुर्लभ अवशेषों से पर्यटकों को कर रहा है हैरान

बीकानेर का ऐतिहासिक लक्ष्मी निवास पैलेस अपनी भव्य वास्तुकला और प्राचीन राजसी परंपराओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस महल की दीवारों पर सजे वन्यजीवों के अवशेष रियासतकाल के उस दौर की गवाही देते हैं जब राजा-महाराजाओं के लिए शिकार शौर्य और प्रतिष्ठा का प्रतीक हुआ करता था।

अपनी अद्भुत वास्तुकला, शाही शान और समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के लिए दुनिया भर में अलग पहचान रखने वाला बीकानेर का लक्ष्मी निवास पैलेस पर्यटकों के बीच हमेशा से आकर्षण का बड़ा केंद्र रहा है। इस भव्य महल के भीतर कदम रखते ही इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद पलटने लगते हैं और एक ऐसा अनोखा दौर सामने आता है जो देखने वालों को पूरी तरह से अचंभित कर देता है। महल के अंदरूनी हिस्सों और विभिन्न कक्षों में आज भी रियासतकाल की यादें सुरक्षित रखी गई हैं, जिन्हें देखने के लिए देश के कोने-कोने से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में सैलानी बीकानेर पहुंचते हैं।

महल के कमरों और दीर्घाओं में प्रवेश करते ही दीवारों पर टंगी मगरमच्छ तथा भालू की विशाल खालें आगंतुकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। इसके अलावा हिरण, बारहसिंगा, काले हिरण और जंगली भैंसे के संरक्षित सिर भी यहां की दीवारों पर करीने से सजाए गए हैं। ये तमाम दुर्लभ अवशेष उस दौर की शाही शिकार परंपरा की पूरी कहानी बेहद स्पष्ट रूप से बयां करते नजर आते हैं। जब भी देशी या विदेशी पर्यटक इन अवशेषों को अपनी आंखों के सामने देखते हैं, तो वे अछंभे में पड़ जाते हैं और इस अनूठी विरासत की तस्वीरें तथा वीडियो अपने कैमरों में कैद करने से नहीं चूकते हैं।

ये भी पढ़ें

रियासतकाल में प्रतिष्ठा का प्रतीक था शिकार

इतिहासकारों के अनुसार, पुराने रियासतकाल के दौरान वन्यजीवों का शिकार करना केवल मनोरंजन का साधन भर नहीं माना जाता था, बल्कि यह राजाओं की वीरता, उनकी असीम शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा का बहुत बड़ा प्रतीक हुआ करता था। रियासत के राजा जब किसी विशेष शिकार अभियान से वापस लौटते थे, तो वन्यजीवों की खाल और उनके अंगों को विशेष रूप से संरक्षित कर महलों की दीवारों पर सजाया जाता था। उस कालखंड में इसे शाही वैभव और शानो-शौकत का अनिवार्य हिस्सा माना जाता था, और देश के कई अन्य शाही महलों में भी इस तरह की शिकार ट्रॉफियां देखने को मिल जाती हैं।

कानून और समाज की सोच में आया बड़ा बदलाव

हालांकि वक्त के साथ देश की सामाजिक सोच और कानूनी व्यवस्था दोनों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुके हैं। आज के समय में भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 पूरी सख्ती के साथ लागू है, जिसके प्रावधानों के तहत अधिकांश वन्यजीवों का शिकार करना कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। लक्ष्मी निवास पैलेस के भीतर मौजूद ये पुरानी ट्रॉफियां आज भी इतिहास के उस कालखंड की याद दिलाती हैं जब शिकार राजसी संस्कृति का एक सामान्य अंग हुआ करता था। वहीं दूसरी तरफ, इन्हें देखकर आज के दौर में वन्यजीवों की रक्षा और उनके संरक्षण के महत्व का भी गहरा अहसास होता है। इतिहास और आधुनिक समय के बीच एक पुल की तरह खड़ा यह ऐतिहासिक महल न केवल बीकानेर की शाही धरोहर को संजोए हुए है, बल्कि वक्त के साथ समाज की सोच और प्राथमिकताओं में आए बड़े बदलाव का भी जीवंत प्रमाण पेश करता है।

सवाल-जवाब

बीकानेर में कौन सा ऐतिहासिक महल पर्यटकों को आकर्षित करता है?
बीकानेर का ऐतिहासिक लक्ष्मी निवास पैलेस अपनी भव्य वास्तुकला और प्राचीन अवशेषों के लिए पर्यटकों को आकर्षित करता है।
महल की दीवारों पर कौन से वन्यजीवों के अवशेष सजे हैं?
महल के अंदर मगरमच्छ, भालू की खाल के अलावा हिरण, बारहसिंगा, काले हिरण और जंगली भैंसे के संरक्षित सिर सजे हुए हैं।
रियासतकाल में शिकार को क्या माना जाता था?
रियासतकाल में शिकार केवल मनोरंजन नहीं बल्कि राजाओं की वीरता, शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था।
भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम कब लागू किया गया था?
भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 लागू है जिसके तहत अधिकांश वन्यजीवों का शिकार प्रतिबंधित है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp