भारत को एक कृषि प्रधान देश माना जाता है, जहां अब किसान समय के साथ आधुनिक और उच्च तकनीक वाली कृषि पद्धतियों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इस बदलाव के तहत, औषधीय गुणों से भरपूर फसलों की ओर किसानों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। झारखंड के किसान भी अब केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने के बजाय बाजार की मांग को समझ रहे हैं। वे ऐसी फसलों का चुनाव कर रहे हैं जिनकी बाजार में कीमत अधिक हो और जिनमें कम लागत लगाकर बेहतर मुनाफा हासिल किया जा सके। पलामू जिले में काले धान की खेती इस बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुकी है, जिससे स्थानीय किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है।
पड़वा प्रखंड के झरी गांव में बदलाव की नई शुरुआत
झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 165 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पलामू जिला अपनी विषम मौसम परिस्थितियों के लिए जाना जाता है। यहां के किसानों को अक्सर सूखे और अनियमित मानसून जैसी गंभीर प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों के बीच भी यहां के किसानों ने हार मानने के बजाय कृषि तकनीकों में बदलाव करने का साहसिक फैसला लिया है। पलामू जिले के पड़वा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले झरी गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान ओंकारनाथ पिछले 6 वर्षों से लगातार काले धान की खेती कर रहे हैं। शुरुआत में उन्होंने परीक्षण के तौर पर बहुत ही छोटे भूभाग पर इस धान की बुवाई की थी। इसके बाद, पिछले पांच वर्षों में उन्होंने इस खेती का दायरा बढ़ाया। इस वैकल्पिक खेती से उन्हें न केवल बेहतर उपज मिल रही है, बल्कि सामान्य धान की तुलना में कई गुना अधिक दाम भी प्राप्त हो रहे हैं। इस समय उनके पास बिक्री के लिए लगभग 5 से 6 क्विंटल औषधीय गुणों वाला काला चावल उपलब्ध है, जिसे वे धीरे-धीरे बेच रहे हैं।
बाजार में काला सोना क्यों कहलाता है यह धान
ओंकारनाथ के अनुसार, काला धान अपने अनोखे गहरे रंग और समृद्ध पोषक तत्वों की वजह से आज के बाजार में चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है। कई क्षेत्रों में लोग इसे इसके उच्च मूल्य के कारण काला सोना भी कहकर पुकारते हैं। काले चावल में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी लाभ के लिए इसका नियमित सेवन शुरू करने से पहले किसी योग्य डॉक्टर या विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना बेहद जरूरी है। अपनी इसी विशेष गुणवत्ता और लगातार बढ़ती मांग के कारण बाजार में इसकी कीमत सामान्य चावल की तुलना में बहुत अधिक है। यह चावल मधुमेह यानी शुगर के मरीजों के लिए भी काफी उपयोगी और फायदेमंद माना जाता है।
काले धान की खेती का आर्थिक गणित और मुनाफा
इस विशिष्ट फसल के वित्तीय गणित को समझाते हुए किसान बताते हैं कि जहां आम तौर पर सामान्य चावल बाजार में केवल 30 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है, वहीं काले चावल की कीमत बाजार में 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम तक आसानी से मिल जाती है। ओंकारनाथ के व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, उन्होंने अपने पांच एकड़ के खेत में इस धान की खेती की थी, जिससे उन्हें कुल मिलाकर लगभग 50 क्विंटल की पैदावार हासिल हुई। अगर सीधे काले धान की बात की जाए, तो बाजार में इसकी कीमत तकरीबन 8 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिल जाती है। वर्तमान में वे सीधे धान बेचने के बजाय इसके चावल को तैयार कर बाजार में बेच रहे हैं, जिससे उन्हें और भी बेहतर मुनाफा हो रहा है।
खेती की प्रक्रिया, सिंचाई की जरूरत और फसल चक्र
काले धान की खेती की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सामान्य धान की फसलों की तुलना में बहुत कम सिंचाई या पानी की जरूरत होती है। पलामू जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्र के लिए यह विशेषता वरदान साबित हो रही है। इसके लिए किसानों को किसी विशेष प्रकार के जटिल कृषि प्रबंधन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। हालांकि, पारंपरिक धान की तुलना में इस फसल को पूरी तरह पककर तैयार होने में थोड़ा अधिक समय जरूर लगता है। सामान्य धान की अधिकांश किस्में जहां लगभग 90 से 110 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाती हैं, वहीं काले धान की फसल को पूरी तरह पकने में लगभग 125 दिनों का समय लगता है। काले धान की नर्सरी तैयार करने का काम सामान्य धान की तरह ही मई-जून के महीनों में किया जाता है, जिसके बाद जुलाई-अगस्त के महीनों में इसकी रोपाई की जाती है। पूरी फसल को पकने में लगभग चार महीने का समय लगता है। यदि क्षेत्र में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो, तो साल में दो बार इसकी खेती की संभावना भी जताई जा रही है।
अमेज़न के जरिए देश भर के बाजारों तक पहुंच
ओंकारनाथ अपनी फसल की बिक्री के लिए केवल स्थानीय मंडियों या बिचौलियों पर निर्भर नहीं हैं। वे अपने इस प्रीमियम उत्पाद को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेज़न के माध्यम से सीधे ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं। जैसे ही उन्हें इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऑर्डर मिलता है, वे देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले खरीदारों को सीधे काला चावल पैक करके भेज देते हैं। पलामू के इस प्रगतिशील किसान की यह अनूठी पहल अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी आधुनिक और बाजार उन्मुख खेती अपनाने की एक बड़ी प्रेरणा बन गई है।


















