बारिश के मौसम में परिवार के साथ घूमने की योजना बना रहे हैं तो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से महज 16 किलोमीटर दूर बसा मऊ सहानिया गांव आपकी लिस्ट में होना चाहिए। यहां महाराजा छत्रसाल के दौर के महल, किले और स्मारक आज भी अपनी पुरानी वास्तुकला और शौर्य गाथाओं के साथ खड़े हैं, और इन्हें देखने में जेब पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ता।
कैसे पहुंचें मऊ सहानिया
अगर आप खजुराहो एयरपोर्ट या खजुराहो रेलवे स्टेशन से मऊ सहानिया जाना चाहते हैं तो सड़क मार्ग से करीब 1 घंटे में पहुंच जाएंगे। वहीं छतरपुर रेलवे स्टेशन से आने वालों के लिए यह दूरी और भी कम है, महज 20 किलोमीटर। जो लोग गांव की सभी ऐतिहासिक जगहों को एक साथ घूमना चाहते हैं, वे अपने खर्च पर निजी कार बुक करके आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। खास बात यह है कि ये सभी ऐतिहासिक इमारतें गांव के आसपास के जंगल और पहाड़ों के बीच बसी हैं, जिससे यहां का माहौल और भी खास लगता है।
मऊ सहानिया में घूमने लायक धरोहरों की लिस्ट लंबी है। इनमें महाराजा छत्रसाल की स्मारक, रानी कमलापति स्मारक, धुबेला महल, धुबेला संग्रहालय, मस्तानी महल, हृदय शाह महल और शीतल गढ़ी शामिल हैं। ये सभी इमारतें सैकड़ों साल पुराने इतिहास को आज भी जिंदा रखे हुए हैं।
धुबेला महल और उसका संग्रहालय
मऊ सहानिया गांव में बना धुबेला महल महाराजा छत्रसाल ने 18वीं शताब्दी ई. में बनवाया था। महल का प्रवेश द्वार भव्य और मेहराबदार है, जो उस दौर की शिल्पकारी की झलक देता है। इस महल की बनावट उत्तर मध्यकालीन क्षेत्रीय बुंदेली शैली में की गई है। इसी परिसर में धुबेला संग्रहालय भी मौजूद है, जहां महाराजा छत्रसाल के जमाने के अस्त्र-शस्त्र के साथ-साथ कई तरह की दुर्लभ ऐतिहासिक चीजें रखी गई हैं, जो इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं।
शीतल गढ़ी, जो आज के एयर कंडीशनर को भी देती है मात
मऊ सहानिया में मौजूद शीतल गढ़ी का निर्माण महाराजा छत्रसाल के नाती ने 17वीं शताब्दी में करवाया था। यह स्मारक समृद्ध बुंदेली कला का बेहतरीन नमूना माना जाता है। कहा जाता है कि इसकी बनावट ऐसी है कि यह आज के एयर कंडीशनर को भी फेल कर देती है। इस किले का निर्माण मुख्य रूप से आवासीय उद्देश्य से और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए करवाया गया था।
हृदय शाह महल, खंडहर होकर भी खींचता है पर्यटकों को
मऊ सहानिया में ही महाराजा छत्रसाल के बड़े पुत्र हृदय शाह का महल भी मौजूद है। समय के साथ यह महल आज खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आना नहीं छोड़ते। इसकी टूटी-फूटी दीवारें भी उस दौर की भव्यता की कहानी बयां करती हैं।
रानी कमलापति की याद में बना महल
रानी कमलापति महाराजा छत्रसाल की प्रथम रानी थीं। जब बड़ी रानी का निधन हुआ तो महाराजा छत्रसाल ने उनकी याद में यह महल बनवाया था। यह महल 2 मंजिला है, इसका प्रवेश द्वार मेहराबयुक्त है और इसमें कुल 7 गुंबद बने हैं, जो इसे बाकी इमारतों से अलग पहचान देते हैं।
महाराजा छत्रसाल स्मारक और उनके घोड़े की समाधि
मऊ सहानिया में महाराजा छत्रसाल का स्मारक भी बना हुआ है, और इसी परिसर में उनके घोड़े की समाधि भी मौजूद है। इस स्मारक का निर्माण बाजीराव पेशवा प्रथम ने करवाया था, और आज भी यह महाराजा की शौर्य गाथा को बयां करता है। यही वजह है कि यहां बने स्मारक और महल देखने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं।











