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मध्य प्रदेश की 1500 साल पुरानी बाघ गुफाएं: सिर्फ 25 रुपए में गुप्तकालीन कला और शांत पहाड़ी सफर का मौकायात्रा
13 जून 2026, 8:42 am (46 दिन पहले)· 1

मध्य प्रदेश की 1500 साल पुरानी बाघ गुफाएं: सिर्फ 25 रुपए में गुप्तकालीन कला और शांत पहाड़ी सफर का मौका

धार जिले के बाघ कस्बे में विंध्य की ढलानों पर बनी ये चट्टान-कटी बौद्ध गुफाएं गुप्तकालीन चित्रकारी और इतिहास का खजाना हैं, और बेहद कम बजट में घूमी जा सकती हैं।

मध्य प्रदेश के धार जिले में बसे बाघ कस्बे के पास, विंध्य पर्वतमाला की दक्षिणी ढलानों पर, पत्थर को तराशकर बनाई गई गुफाओं का एक समूह सदियों से खड़ा है। इन्हें बाघ गुफाओं के नाम से जाना जाता है। कुल मिलाकर यहां 9 बौद्ध गुफाएं हैं, हालांकि समय की मार झेलने के बाद आज इनमें से सिर्फ 5 ही ठीक हालत में बची हैं। इतिहासकार मानते हैं कि इनका निर्माण गुप्त काल में, यानी लगभग 5वीं से 7वीं शताब्दी के बीच हुआ। अपनी अनूठी बनावट और भीतर की पुरानी चित्रकारी की वजह से ये गुफाएं देश ही नहीं, दुनियाभर में जानी जाती हैं।

पहाड़ों के बीच का सुकून

गुफाओं तक पहुंचते ही पहाड़ियों के बीच फैला शांत माहौल हर आने वाले को अपनी ओर खींच लेता है। बारिश के दिनों में तो यह पूरा इलाका और भी हरा-भरा और खूबसूरत हो जाता है। परिवार के साथ पहुंचने वाले लोग अक्सर घंटों यहां की नक्काशी और प्राचीन कला को निहारते रह जाते हैं।

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बौद्ध भिक्षुओं का बसेरा

इन गुफाओं का गहरा नाता बौद्ध धर्म से रहा है। यहां भिक्षुओं के रहने के लिए कमरे बनाए गए थे, साथ में बड़े बरामदे और प्रार्थना के लिए अलग स्थान भी। गुफाओं के अंदर मौजूद स्तूप और पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां आज भी उस दौर की कहानी सुनाती हैं। कई दीवारों पर भगवान बुद्ध और बोधिसत्व के चित्रों के निशान आज भी पहचाने जा सकते हैं।

रंगमहल — सबसे बड़ी और सबसे मशहूर गुफा

गुफा नंबर 4 को रंगमहल कहा जाता है और यही पूरे समूह की सबसे बड़ी तथा सबसे प्रसिद्ध गुफा है। इसके भीतर की प्राचीन चित्रकारी देखकर लोग दंग रह जाते हैं। दीवारों पर नृत्य करती युवतियां, संगीत बजाते कलाकार और राजदरबार के दृश्य उकेरे गए हैं। इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यही गुफा सबसे बड़ा आकर्षण है।

हर गुफा का अपना नाम और अजंता से समानता

बाकी गुफाओं के भी अपने-अपने नाम हैं। गुफा नंबर 2 को पांडव गुफा कहते हैं, गुफा नंबर 3 हाथीखाना के नाम से मशहूर है, जबकि गुफा नंबर 5 को पाठशाला कहा जाता है। इनकी बनावट अजंता की गुफाओं से काफी मिलती-जुलती है। बताया जाता है कि यहां बने चित्रों में फूल, पक्षी, पशु और राजसी जीवन को बड़ी बारीकी और खूबसूरती से दिखाया गया था।

कैसे पड़ा इस इलाके का नाम 'बाघ'

इतिहासकारों के अनुसार आधुनिक दौर में इन गुफाओं को पहली बार वर्ष 1818 में डेंजर फील्ड ने खोजा था। उससे पहले लंबे समय तक यह जगह घने जंगलों के बीच छिपी पड़ी रही। मान्यता है कि बौद्ध धर्म के पतन के बाद यहां लोगों का आना-जाना घट गया और आसपास के जंगलों में बाघ बसने लगे। इसी वजह से इस पूरे क्षेत्र का नाम बाघ पड़ गया।

वीकेंड के लिए परफेक्ट और जेब पर हल्का

एक छोटी छुट्टी या वीकेंड ट्रिप के लिहाज से यह जगह बेहद शानदार मानी जाती है। परिवार या दोस्तों के साथ यहां पूरा दिन आराम से बिताया जा सकता है — पहाड़ियों के बीच घूमना, सदियों पुराने इतिहास को करीब से देखना और प्राकृतिक नजारों का मजा लेना एक अलग ही अनुभव देता है। खर्च की बात करें तो यहां घूमना ज्यादा महंगा नहीं पड़ता। भारतीय पर्यटकों के लिए प्रवेश शुल्क करीब 25 रुपए प्रति व्यक्ति है। खाने-पीने और यात्रा को मिलाकर एक व्यक्ति का एक दिन का खर्च आसानी से लगभग 1000 से 1500 रुपए तक आ जाता है। अगर परिवार या दोस्तों के साथ निजी वाहन से जाएं, तो यह खर्च और भी कम हो सकता है।

कैसे पहुंचें बाघ गुफाओं तक

यहां पहुंचना भी मुश्किल नहीं है। बाघ गुफाएं इंदौर से करीब 160 किलोमीटर और खरगोन से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर हैं, और सड़क मार्ग से आसानी से जुड़ी हुई हैं। सबसे नजदीकी बड़ा शहर कुक्षी है, जहां से टैक्सी और निजी वाहन बिना दिक्कत मिल जाते हैं। इंदौर से बस और कार के जरिए भी यहां सीधे पहुंचा जा सकता है।

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