उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित कैंची धाम से लेकर विदेशों तक परम पूज्य नीम करोली बाबा के नाम का डंका बजता है। उनके चमत्कारों, आध्यात्मिक दर्शन और सेवा भाव की गाथाएं पूरी दुनिया में सुनी और सुनाई जाती हैं। टेक जगत की महान हस्तियों से लेकर साधारण श्रद्धालु तक उनके आश्रम की चौखट पर माथा टेकने पहुंचते हैं। हालांकि, इस अपार ख्याति और वैश्विक पहचान के पीछे बाबा के लौकिक जीवन का एक ऐसा अध्याय भी मौजूद है, जिसके बारे में आम जनमानस में बहुत कम चर्चा होती है। अधिकांश लोग केवल उनके सिद्ध संत वाले रूप को जानते हैं, परंतु उनके संन्यास मार्ग पर निकलने से पूर्व का पारिवारिक जीवन और उनकी धर्मपत्नी का त्याग एक अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी प्रस्तुत करता है। जब महाराज जी ने अध्यात्म की राह पर चलते हुए गृहस्थ जीवन से दूरी बनाई, तब उनकी धर्मपत्नी ने गांव में रहकर न केवल परिवार की बागडोर संभाली बल्कि सादगी की एक अद्भुत मिसाल भी कायम की।
अकबरपुर में प्रारंभिक जीवन और बाल विवाह की सामाजिक परंपरा
नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के फिरोजाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले अकबरपुर नामक गांव में हुआ था। बचपन में उनका नाम लक्ष्मण दास शर्मा रखा गया था। बाल्यावस्था से ही उनके मन में ईश्वर भक्ति, जप-तप और साधना के प्रति गहरा आकर्षण विकसित होने लगा था। हालांकि, उस दौर की सामाजिक रीतियों और ग्रामीण मान्यताओं के अनुरूप, कम उम्र में ही उनका विवाह तय कर दिया गया। ऐतिहासिक अभिलेखों और आश्रम से जुड़े प्रामाणिक विवरणों के अनुसार, जब लक्ष्मण दास शर्मा का विवाह हुआ, तब उनकी आयु लगभग 11 से 12 वर्ष के आसपास रही होगी। विवाह के पश्चात उनकी पत्नी, जिनका नाम राम बेटी देवी था, उत्तर प्रदेश के ही एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से आकर अकबरपुर में रहने लगीं।
यद्यपि आगे चलकर लक्ष्मण दास शर्मा ने सांसारिक बंधनों को त्यागकर पूर्णतः वैराग्य मार्ग अपनाने का संकल्प लिया, परंतु उन्होंने कभी भी अपने वैवाहिक सत्य को छुपाने का प्रयास नहीं किया। वे अपने गृहस्थ जीवन के अतीत को सहज स्वीकार करते थे, भले ही उनका ध्यान सदैव सर्वोच्च चेतना और जनकल्याण की ओर ही केंद्रित रहा।
वैराग्य का मार्ग और राम बेटी देवी के कंधों पर जिम्मेदारियां
विवाह के कुछ वर्षों के पश्चात लक्ष्मण दास शर्मा का मन गृहस्थी के दैनिक कार्यों से विरक्त होने लगा और वे आध्यात्मिक खोज में अपना पैतृक गृह छोड़कर निकल पड़े। उन्होंने भारत वर्ष के विभिन्न तीर्थ स्थलों, वनों और गुफाओं में वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस देशाटन और कठिन साधना के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में श्रद्धालुओं ने उन्हें भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा। समय के साथ रेलवे लाइन पर हुए एक प्रसिद्ध वाकये और नीम करोली गांव में साधना के पश्चात वे जन-जन के बीच नीम करोली बाबा के पावन नाम से प्रसिद्ध हो गए।
एक तरफ जहां महाराज जी आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छू रहे थे और उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ अकबरपुर गांव में उनकी पत्नी राम बेटी देवी ने अत्यंत धैर्यपूर्वक गृहस्थ धर्म का पालन किया। अपने पति के घर छोड़ने के बाद उन्होंने परिवार की सारी जिम्मेदारियों को अकेले ही अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने न केवल खेती-बाड़ी और पशुपालन जैसे कठिन ग्रामीण कार्यों का प्रबंधन किया, बल्कि घर के बड़े-बुजुर्गों की सेवा करते हुए बच्चों का पालन-पोषण भी पूरे स्वाभिमान और संस्कार के साथ किया।
संत की जीवनसंगिनी का सादगीपूर्ण और विरक्त जीवन
राम बेटी देवी का पूरा जीवन किसी दिखावे या अहंकार से पूरी तरह मुक्त रहा। नीम करोली बाबा की प्रसिद्धि जब देश-विदेश में फैलने लगी, तब भी उनकी पत्नी ने कभी सार्वजनिक मंचों पर आने की इच्छा प्रकट नहीं की। उन्होंने स्वयं को आश्रमों की प्रबंध समितियों, धार्मिक आयोजनों या बाबा के शिष्य मंडल से पूरी तरह दूर रखा। गांव के बुजुर्ग और तत्कालीन निवासी राम बेटी देवी को एक बेहद शांत, दयालु और सहिष्णु महिला के रूप में स्मरण करते हैं।
उन्होंने कभी भी खुद को एक महान संत की पत्नी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया और न ही किसी विशेष अधिकार का दावा किया। एक आम ग्रामीण महिला की तरह सुबह से शाम तक घर के चूल्हे-चौके, खेत-खलिहान और पारिवारिक कर्तव्यों में लीन रहना ही उनकी दैनिक दिनचर्या थी। उनका यह शांत समर्पण दिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले महापुरुषों के पीछे उनके परिजनों का कितना मौन त्याग छिपा होता है।
पारिवारिक संपर्क और अकबरपुर से बाबा का जुड़ाव
अक्सर जनमानस में यह सवाल उठता है कि क्या नीम करोली बाबा ने वैराग्य धारण करने के बाद अपने परिवार से सारे रिश्ते पूरी तरह समाप्त कर लिए थे? आश्रम के प्राचीन संस्मरणों और जीवनीकारों के अनुसार, बाबा ने परिवार का पूरी तरह त्याग करने के बावजूद अपने मानवीय संबंधों में कटुता नहीं आने दी थी। वे साधना और देशाटन के बीच समय-समय पर अकबरपुर गांव आते रहते थे। जब भी वे गांव पहुंचते, अपने परिजनों और बच्चों से भेंट करते थे।
हालांकि, इन मुलाकातों के दौरान भी उनका मुख्य समय गांव के पास साधना, श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन देने और ईश्वर चर्चा में ही व्यतीत होता था। उनका पारिवारिक जीवन उनके व्यापक आध्यात्मिक क्षितिज का केवल एक अत्यंत निजी और सीमित हिस्सा था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नीम करोली बाबा और राम बेटी देवी की दो संतानें थीं। उनके सुपुत्र अरविंद शर्मा ने अपने जीवन का लंबा समय अकबरपुर गांव में ही रहकर बिताया। आज भी उनका परिवार बाबा के शुरुआती जीवन से जुड़े स्मृतियों और पैतृक स्थानों की देखभाल पूरी निष्ठा के साथ करता है।
जीवन के अंतिम क्षण और सादगी की अमिट छाप
राम बेटी देवी ने अपने जीवन का अधिकांश कालखंड उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद स्थित अकबरपुर गांव की पावन माटी में ही व्यतीत किया। नैनीताल जिले के कैंची धाम आश्रम या उत्तर प्रदेश के वृंदावन आश्रम जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों में उनकी उपस्थिति न के बराबर ही देखी गई। जब कभी दूर-दराज से आए श्रद्धालु नीम करोली बाबा के शुरुआती जीवन के बारे में जानने के लिए अकबरपुर पहुंचते थे, तो वे बाबा के पैतृक आवास और परिवार के सदस्यों के दर्शन करके स्वयं को धन्य मानते थे।
विभिन्न प्रामाणिक पारिवारिक स्रोतों और स्थानीय अभिलेखों के अनुसार, राम बेटी देवी का देहावसान वर्ष 2004 में हुआ था। उन्होंने अंतिम सांस तक उसी अकबरपुर गांव में रहकर अपना जीवन पूर्ण किया जहां वे विवाह के बाद आई थीं। यद्यपि विभिन्न दस्तावेजों में उनकी मृत्यु की सटीक तिथि को लेकर थोड़े भिन्न विवरण मिलते हैं, परंतु वर्ष 2004 को ही सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है। उनके जाने के बाद भी अकबरपुर के लोग उन्हें धैर्य, तपस्या और सादगी की एक अप्रतिम मिसाल मानते हैं।
कैंची धाम की बढ़ती ख्याति और पारिवारिक इतिहास में श्रद्धालुओं की रुचि
वर्तमान समय में कैंची धाम की ख्याति अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच चुकी है। हर वर्ष लाखों की संख्या में देश और दुनिया भर से भक्त महाराज जी के आशीर्वाद की आस में उत्तराखंड पहुंचते हैं। जैसे-जैसे नीम करोली बाबा के प्रति दुनिया भर में श्रद्धा बढ़ रही है, वैसे-वैसे लोग उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को जानने के लिए भी उत्सुक हो रहे हैं। श्रद्धालु यह समझने का प्रयास करते हैं कि जिस संत ने संपूर्ण मानवता को प्रेम, सेवा और समरसता का संदेश दिया, उनका अपना पारिवारिक पृष्ठभूमि कैसा था।
राम बेटी देवी का जीवन इसी जिज्ञासा का एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक उत्तर प्रदान करता है। उनकी कहानी यह सिखाती है कि प्रचार-प्रसार और प्रसिद्धि की चकाचौंध से दूर रहकर भी किस प्रकार अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन किया जा सकता है। नीम करोली बाबा के आध्यात्मिक तेज के पीछे उनकी पत्नी का यह मौन तप आज भी भारतीय संस्कृति की गृहस्थ गरिमा को रेखांकित करता है।



















