जर्मनी के एक संग्रहालय में टंगी 160 साल पुरानी पेंटिंग ने कला प्रेमियों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है, जिससे टाइम ट्रैवल की रहस्यमयी थ्योरी पर नई चर्चा शुरू हो गई है। इस कलाकृति में एक युवती सुरम्य ग्रामीण रास्ते पर टहलती हुई दिखाई देती है, जिसकी निगाहें दोनों हाथों में पकड़ी एक छोटी आयताकार वस्तु पर टिकी हैं। आज के दर्शकों को उसका झुककर चलने का तरीका और अंगूठों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही लगती है, जैसे कोई इंसान मोबाइल फोन पर मैसेज टाइप कर रहा हो। हालांकि, ऐतिहासिक तथ्यों और संदर्भों की गहराई से जांच करने पर इस दृश्य के पीछे एक बेहद सामान्य और तार्किक वजह सामने आती है।
इंटरनेट पर वायरल हुई रहस्यमयी पेंटिंग
इस प्रसिद्ध पेंटिंग का शीर्षक द एक्सपेक्टेड वन है, जिसे ऑस्ट्रियाई कला विशेषज्ञ और चित्रकार फर्डिनेंड जॉर्ज वाल्डम्यूलर ने 19वीं सदी के मध्य में बनाया था। यह पेंटिंग वर्तमान में जर्मनी के म्यूनिख शहर में स्थित न्यू पिनाकोथेक म्यूजियम में प्रदर्शित की जाती है। कैनवास पर प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ियों और हरियाली से भरा एक ग्रामीण परिदृश्य उकेरा गया है। रास्ते पर आगे बढ़ती युवती से कुछ दूरी पर एक युवक झाड़ियों के पीछे छिपा हुआ है, जो हाथ में फूल लिए उसका इंतजार कर रहा है। इसके बावजूद, युवती अपने प्रेमी से बेखबर होकर पूरी तरह से अपने हाथ की वस्तु में लीन दिखती है।
साल 2017 के आसपास इस पेंटिंग की तस्वीर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई। तस्वीर देखने वाले लोगों ने महिला के हाथ पकड़ने की शैली पर ध्यान केंद्रित किया: सिर नीचे की तरफ झुका हुआ, कोहनियां शरीर के पास और अंगूठे वस्तु की सतह पर रखे हुए। यह स्थिति आज के स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं से इतनी मिलती-जुलती थी कि कई लोगों ने मजाकिया और हैरान करने वाले सवाल पूछने शुरू कर दिए कि क्या कलाकार ने भविष्य की तकनीक को अपने समय के कैनवास पर उकेर दिया था।
दृष्टिकोण का अंतर और विशेषज्ञ की व्याख्या
यह दिलचस्प मामला दर्शाता है कि समय और सांस्कृतिक परिवेश के साथ इंसान के सोचने का नजरिया कैसे बदल जाता है। ग्लासगो के पूर्व कर्मचारी पीटर रसेल ने इस भ्रम पर विस्तार से बात की और बताया कि किसी पेंटिंग को देखने वाले का नजरिया उसके दौर की तकनीकों से प्रभावित होता है। जब 21वीं सदी का कोई व्यक्ति इस चित्र को देखता है, तो उसका दिमाग तुरंत उसे मोबाइल फोन मान लेता है। इसके विपरीत, 1850 या 1860 के दशक में जब यह पेंटिंग बनी होगी, तब इसे देखने वाला हर व्यक्ति इसे एक छोटी प्रार्थना-पुस्तक या पॉकेट बुक समझता।
कला इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार, 19वीं सदी के यूरोप में ग्रामीण इलाकों में टहलते समय अपने साथ छोटी धार्मिक पुस्तकें या पॉकेट बुक ले जाना एक आम रिवाज था। चमड़े के आवरण वाली वह छोटी किताब उस दौर का एक साधारण निजी सामान थी, न कि भविष्य की कोई डिजिटल डिवाइस। वाल्डम्यूलर के इस दृश्य में युवती रास्ते पर चलते हुए अपनी प्रार्थना-पुस्तक पढ़ रही थी, और उसे इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि डेढ़ सदी बाद उसकी यह मुद्रा लोगों को उलझन में डाल देगी।
स्मार्टफोन का इतिहास और ऐतिहासिक समयरेखा
इस वायरल बहस ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्मार्टफोन के आविष्कार और इस पेंटिंग के बनने के बीच 150 से अधिक वर्षों का बड़ा फासला है। ऐपल कंपनी ने अपना पहला iPhone साल 2007 में लॉन्च किया था, जबकि नोकिया कंपनी का शुरुआती स्मार्ट उपकरण Nokia 9000 Communicator 1990 के दशक के उत्तरार्ध में आया था। फर्डिनेंड जॉर्ज वाल्डम्यूलर ने इस मास्टरपीस की रचना लगभग 160 साल पहले की थी, जो स्मार्टफोन तकनीक के आगमन से करीब डेढ़ सदी पुरानी बात है।
इतिहास में इस तरह की भ्रमित करने वाली घटनाएं पहले भी दर्ज की जा चुकी हैं। साल 2016 में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था जब ऐतिहासिक चित्रों में आधुनिक गैजेट्स जैसी वस्तुएं देखने का दावा किया गया था। विशेषज्ञ इसे आधुनिक मानसिकता का असर मानते हैं, जहां इंसान अपनी जानी-पहचानी वर्तमान वस्तुओं को पुरानी तस्वीरों में तलाशने लगता है। आखिरकार, वाल्डम्यूलर की यह कालजयी रचना न केवल बेहतरीन कला का नमूना है, बल्कि यह भी सिखाती है कि आधुनिक तकनीक किस प्रकार हमारे अतीत को देखने के नजरिए को बदल देती है।



















