भुवनेश्वर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने 'वंदे मातरम' के गायन पर चल रहे विवादों को लेकर अपनी बेबाक राय व्यक्त की। उन्होंने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के पूर्ण गायन का विरोध करने वालों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि इसमें हिंदू देवी-देवताओं के उल्लेख के आधार पर आपत्ति जताना पूरी तरह से बचकानी सोच को दर्शाता है। गीतांजलि अंगमो ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भाषा, साहित्य, कला और सांस्कृतिक धरोहरों को कभी भी धार्मिक पहचान के संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें राष्ट्र की साझा चेतना के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय गीत और धार्मिक नजरिए पर उठते सवाल
गीतांजलि अंगमो ने कहा कि वंदे मातरम को लेकर समाज और राजनीति में कई तरह की रुकावटें और भ्रांतियां पैदा की गई हैं। उन्होंने उन तर्कों का जिक्र किया जो अक्सर इस गीत के विरोध में खड़े किए जाते हैं। पहला तर्क यह दिया जाता है कि जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस रचना को लिखा था, उस समय भारत एक आधुनिक नेशन-स्टेट या राजनीतिक इकाई के रूप में अस्तित्व में नहीं था। ऐसे में यह सवाल उठाया जाता है कि यह गीत पूरे देश का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है।
इसके अलावा, विरोध का दूसरा प्रमुख आधार गीत के बाद वाले छंदों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ को बनाया जाता है। आलोचकों का मानना है कि इन छंदों में धार्मिक प्रतीक होने के कारण अन्य धर्मों के मानने वाले लोग इसे आसानी से नहीं गा सकते। गीतांजलि अंगमो ने इन दोनों तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय प्रतीकों और महान साहित्यिक कृतियों को देखने का यह तरीका बेहद सीमित और बचकाना है। साहित्य और राष्ट्रगान जैसी रचनाएं किसी एक वर्ग की न होकर संपूर्ण समाज की प्रेरणा स्रोत होती हैं।
भाषाई और सांस्कृतिक समृद्धता: सूफी शायरी, ओपेरा और संस्कृत की तुलना
अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए गीतांजलि अंगमो ने कई सांस्कृतिक और भाषाई उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति सूफी कविता पढ़ता है या गजल सीखता है, तो वह अनिवार्य रूप से उर्दू भाषा में ही सीखी और गाई जाती है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि यदि कोई हिंदू व्यक्ति सूफी कला या उर्दू गजल गाएगा तो उसका अपना धर्म भ्रष्ट हो जाएगा या उसकी आस्था कमजोर हो जाएगी।
उन्होंने पश्चिमी कला का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई इटालियन ओपेरा सीखता है, तो उसकी मूल प्रस्तुति लैटिन भाषा में होती है। उस कला को सीखने और उसका जश्न मनाने के लिए लैटिन भाषा का ही प्रयोग किया जाता है, न कि उसे धर्म के आधार पर खारिज किया जाता है। इसी तरह, भारत के प्राचीन वेद और उपनिषद 10 हजार साल पुराने ग्रंथ हैं, जो संस्कृत भाषा में रचे गए हैं। यदि कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का जाप करता है या योग अभ्यास के दौरान संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करता है, तो संस्कृत को सीधे तौर पर हिंदू धर्म या किसी विशेष राजनीतिक दल से जोड़ देना नितांत गलत है। संस्कृत एक बेहद प्राचीन और समृद्ध भाषा है, जिसके उच्च विचार और मंत्र हर मनुष्य को जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं।
वंदे मातरम की भावना और देवी दुर्गा व लक्ष्मी का प्रतीकात्मक अर्थ
गीतांजलि अंगमो ने यह तर्क भी दिया कि वंदे मातरम गाने का मतलब अन्य राष्ट्रीय या सामाजिक समस्याओं से ध्यान भटकाना नहीं है। अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि जब देश के सामने अन्य व्यावहारिक समस्याएं मौजूद हैं, तब वंदे मातरम पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम कोई ऐसा विचार नहीं है जो अन्य समस्याओं के खिलाफ खड़ा हो, बल्कि यह एक ऐसी ऊर्जा और राष्ट्रीय भावना है जो नागरिकों को उन तमाम चुनौतियों और कठिनाइयों से डटकर मुकाबला करने के लिए प्रेरित करती है।
गीत में मौजूद देवी-देवताओं के संदर्भों पर बात करते हुए उन्होंने समझाया कि इन्हें केवल धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देवी दुर्गा शक्ति और साहस की प्रतीक हैं, जबकि देवी लक्ष्मी समृद्धि, वैभव और संपन्नता की प्रतीक हैं। जब हम अपनी मातृभूमि की कल्पना करते हैं, तो उसे शक्ति और समृद्धि से परिपूर्ण देखना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम के समय गीत की अत्यधिक लंबाई के कारण इसके केवल शुरुआती दो छंदों को औपचारिक रूप से चुना गया था। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि बाकी छंदों को अस्वीकार कर दिया गया था। किसी भी महान कलाकृति को टुकड़ों में बांटना या काट छांट करना उचित नहीं है।
सभ्यतागत पहचान बनाम राजनीतिक भू-भाग: भारत की मौलिक अवधारणा
यूरोपीय देशों और भारत के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए गीतांजलि अंगमो ने कहा कि भारतीय राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी देशों से पूरी तरह भिन्न है। 1600 के दशक के बाद दुनिया भर में कई नए देश एक सीमांकित राजनीतिक इकाई के रूप में बने। लेकिन उससे बहुत पहले से भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा, कोई राजनीतिक सीमा या भौगोलिक इकाई मात्र नहीं था। भारत हजारों वर्षों से एक निरंतर प्रवाहमान सभ्यतागत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान रहा है।
उन्होंने कहा कि उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व से पश्चिम तक हर दौर में भारत के लोग एक ही मौलिक आध्यात्मिक प्रश्न का उत्तर तलाशते रहे हैं कि अंतिम सत्य क्या है। यही आध्यात्मिक जिज्ञासा और दर्शन भारत की वास्तविक पहचान रही है। भारत को 'माता' के रूप में देखना इसी सभ्यतागत सोच का हिस्सा है। वंदे मातरम हमें अपनी इस मातृभूमि रूपी मां से गहराई से जोड़ने का काम करता है। जिस प्रकार हमारा जन्म और पालन-पोषण हमारी भौतिक मां के जरिए होता है, उसी प्रकार यह धरती भी हमारी पालक है।
श्री अरबिंदो की दृष्टि, बंकिम चंद्र का आनंदमठ और 80 वर्षों का विलंब
गीतांजलि अंगमो ने महान विचारक श्री अरबिंदो के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया कि जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में वंदे मातरम की रचना की थी, तब वे केवल एक साधारण उपन्यासकार नहीं थे। श्री अरबिंदो के शब्दों में, बंकिम चंद्र एक द्रष्टा और ऋषि थे। ऋषियों में वह दृष्टि होती है जो आम लोगों की पहुंच से परे देख सकती है। उन्होंने इस पावन भूमि को केवल एक भौतिक या भौगोलिक नक्शे के रूप में नहीं, बल्कि 'शक्ति' और एक सजीव चैतन्य सत्ता के रूप में देखा था।
उन्होंने अफसोस जताया कि इस सजीव सत्ता के साथ आत्मिक रिश्ता बनाने और इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में पूरे सम्मान के साथ लाल किले से गाए जाने में 80 साल का लंबा समय लग गया। उन्होंने कहा कि आजादी के दिन लाल किले से इसे पुनः गाए जाने की शुरुआत एक अत्यंत सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है। यदि देशवासियों में इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप की समझ पहले ही विकसित हो गई होती, तो शायद 1947 में भारत के विभाजन की त्रासदी का सामना देश को नहीं करना पड़ता।
राजनीतिक एजेंडा बनाम आम नागरिकों का सामाजिक सद्भाव
वंदे मातरम को लेकर चल रही बहस पर अपना दृष्टिकोण रखते हुए गीतांजलि अंगमो ने कहा कि इस विषय पर आम नागरिकों के बीच कोई वास्तविक विवाद या असहमति नहीं है। जो मतभेद या तनाव दिखाई देता है, वह अधिकांशतः राजनीतिक चर्चाओं और एजेंडों का परिणाम है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार राजनीतिक दल और नेता अपने संकीर्ण स्वार्थों और एजेंडे को साधने के लिए समाज में बंटवारे वाली सोच को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज्बा भरने वाला एक अजेय नारा बन गया था क्योंकि इसने करोड़ों लोगों को एकजुट और प्रेरित किया था। केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण या वैचारिक मतभेदों के आधार पर इतने पवित्र और प्रेरणादायी गीत को नकारा नहीं जा सकता। संपूर्ण समाज को बिना किसी हिचकिचाहट के इसकी मूल भावना को स्वीकार करना चाहिए और इसे संकीर्ण राजनीति से दूर रखना चाहिए।
समावेशी इतिहास और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का प्रेरक उदाहरण
भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महानता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास हमेशा से विभिन्न संस्कृतियों, विचारों और बाहरी प्रभावों को अपनाने और अपने भीतर समाहित करने का रहा है। चाहे मुगल काल का सांस्कृतिक प्रभाव हो या अन्य विदेशी परंपराएं, भारत ने अपनी मूल आत्मा को गंवाए बिना इन सभी को आत्मसात किया है। लेकिन दूसरों को जगह देने या समावेशी बनने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम अपनी उस महान संस्कृति और परंपरा को भूल जाएं या उसे व्यक्त करने में शर्म महसूस करें जो 10 हजार साल पहले से मौजूद है। हमें दूसरों को स्वीकार करने के लिए स्वयं को छोटा या कमजोर करने की आवश्यकता नहीं है।
इस संदर्भ में उन्होंने भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की मिसाल दी। उन्होंने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भारतीय दर्शन की विविध धाराओं को गहराई से समझते और उनका आदर करते थे। वे उपनिषद, श्रीमद्भागवत गीता और श्री अरबिंदो के साहित्य का नियमित अध्ययन करते थे। गीतांजलि अंगमो ने स्वयं का उदाहरण देते हुए कहा कि वे स्वयं सूफी कविताओं का अध्ययन करती हैं और उनका आनंद लेती हैं। किसी दूसरी परंपरा या साहित्य को जानने-समझने से किसी व्यक्ति का धर्म दूषित नहीं होता। यदि कोई हिंदू उर्दू भाषा बोलता है या कोई मुस्लिम संस्कृत के श्लोक पढ़ता है, तो इससे उनकी अपनी धार्मिक निष्ठा पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगता।



















